आपकी कलम
कोई तो सच बताए ना—क्या कुछ कमियाँ हैं मुझमें...?
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कोई तो सच बताए ना —
क्या कुछ कमियाँ हैं मुझमें?
वैसे तो सच यह है कि
हम सब जानते हैं
हम कितने ग़लत हैं,
कितने कमज़ोर हैं,
कितने अधूरे हैं।
हमें यह भी पता होता है
कि हमने जीवन में क्या-क्या ऐसा किया है
जिसे समाज से,
अपनों से,
और कभी-कभी खुद से भी छुपाना पड़ता है।
लेकिन अजीब बात देखिए —
जो अच्छा किया होता है,
जिसमें थोड़ा भी उजाला होता है,
उसे हम सबसे पहले
दुनिया के सामने सजा देते हैं। बता देते है ।
सम्मान ले लेते हैं,
तारीफ़ ले लेते हैं,
और धीरे-धीरे
एक “अच्छे आदमी” का सुंदर सा चेहरा बना लेते हैं।
पर भीतर कहीं
झूठ भी होता है,
क्रोध भी,
अहंकार भी,
लोभ भी,
और कई बार
दयालुता का भी
एक सजाया हुआ मुखौटा। ख़ुद अपना, अपने द्वारा ।
सच तो यह है कि
कोई भी इंसान
अपनी अँधेरी परछाई पर
बात करना ही नहीं चाहता कभी ।
हम आईना तो देखते हैं,
पर उस आईने में
अपने बुरे किरदार को
देखने की हिम्मत
बहुत कम लोग करते हैं या नहीं करते है ।
इसलिए आज
मैं अपने क़रीबी मित्रों से
एक विनती करता हूँ —
अगर मेरे चेहरे पर
“भले आदमी” का कोई मुखौटा है,
तो उसे नोच कर
फेंक दीजिए ।
ताकि मुझे भी पता चले
कि मेरी सच्चाई क्या है हकीकत में ।
क्योंकि दुनिया में
सबसे ख़तरनाक चीज़
बुरा इंसान होना नहीं है…
सबसे ख़तरनाक है —
अच्छा होने का अभिनय करते रहना। जब सच का साथ देना तो मौन रहना और झूठे का समर्थन कर देना बिना ग़लत साबित हुए ।
शायद
अपने दोषों को स्वीकार करना ही
मनुष्य होने की
पहली सच्ची शुरुआत है पर जब ये भी एक ट्रिक हो, नाटक भला मानुस दिखने का तो इंसान के चरित्र को समझ पाना ओर भी कठिन ओर रहस्यमयी हो जाता है ।
-
लक्ष्मण पार्वती पटेल





