आपकी कलम
इंडिया ब्लॉक किधर : राजेंद्र शर्मा
paliwalwani
आलेख : राजेंद्र शर्मा
विपक्षी इंडिया ब्लॉक की 6 जून 2026 को प्रस्तावित बैठक पर, विपक्ष के हमदर्दों की ही नहीं, सत्ता पक्ष के हमदर्दों की भी नजरें रहेंगी और खुद को तटस्थ मानने वालों की भी। पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मुश्किल से महीने भर बाद इस बैठक का बुलाया जाना, बेशक अपने आप में एक संदेश है। यह संदेश, जो अपने आप में महत्वपूर्ण है, यही हो सकता है कि विपक्ष न हारा है और न मैदान से भागा है। विपक्ष अब भी मैदान में बना हुआ और एकजुट है।
बेशक, विपक्ष की एकजुटता के पहलू से इस बैठक को लेकर कुछेक सवाल भी हैं, जिनके उत्तर इस बैठक में पूरी तरह से मिल ही जाएंगे, यह कहना मुश्किल है। एक ओर जहां यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि प. बंगाल में सत्ता खोने के बाद, नयी-नयी सत्ता पर काबिज हुई भाजपा की हिंसा से लेकर, व्यवस्थित सांगठनिक तोड़-फोड़ तथा निचले स्तर पर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं के दलबदल के संकटों का सामना कर रही तृणमूल कांग्रेस, इस बैठक में बढ़-चढ़कर हिस्सा ही नहीं लेगी, वास्तव में चुनावों के बाद जल्दी ही इस बैठक के बुलाए जाने के पीछे उसके आग्रह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। दूसरी ओर, अब तक इंडिया ब्लाक में महत्वपूर्ण तथा भरोसेमंद घटक की भूमिका अदा करती आयी, डीएमके क्या रुख अपनाती है, यह देखना दिलचस्प होगा।
याद रहे कि तमिलनाडु में इस विधानसभा चुनाव में डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन ने, एक सिने सितारे, विजय की पार्टी, टीवीके के हाथों उसी तरह सत्ता ही नहीं गंवायी, जैसे बंगाल में टीएमसी ने गंवायी है, चुनाव बाद के घटनाक्रम में यह गठबंधन भी बिखरता नजर आया। हालांकि, राज्य की जनता का फैसला टीवीके के पक्ष में ही था, इसमें संदेह की गुंजाइश नहीं थी, फिर भी टीवीके पूर्ण बहुमत से करीब दस सीटें पीछे रह गयी थी।
इस पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने फौरन डीएमके के नेतृत्व वाले गठबंधन से नाता तोड़कर, टीवीके को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने और उसकी सरकार में शामिल होने का ऐलान कर दिया। इस पर डीएमके की काफी नाराजगी देखने को मिली। यहां तक कि उसकी ओर से लोकसभा स्पीकर को पत्र लिखकर, डीएमके सांसदों के लिए इंडिया ब्लाक से अलग बैठने की व्यवस्था करने की मांग भी कर दी गयी। इस पृष्ठभूमि में डीएमके इंडिया गठबंधन से दूरी बनाती है या फौरी नाराजगी के बाद धीरे-धीरे वापसी करती है, इस पर राजनीतिक प्रेक्षकों की खास नजर रहेगी।
कहने की जरूरत नहीं है कि विपक्ष के मैदान में बने होने और एकजुट होने के संदेश की, विधानसभा चुनावों के हाल के चक्र के बाद जरूरत और भी बढ़ गयी है। हालांकि, इस चक्र में जिन पांच विधानसभाओं के चुनाव हुए हैं, उनमें से केरल में भाजपा अपनी सारी कोशिशों के बावजूद, मुख्य मुकाबले से बाहर ही रही है और इस तरह, इंडिया ब्लाक से संबद्घ दो मोर्चों के बीच ही सत्ता का बदलाव हुआ है।
जहां केरल में इसके बावजूद, भाजपा तीन सीटें जीतकर विधानसभा में प्रवेश पाने के अलावा भी अपना चुनावी प्रभाव बढ़ाने में कामयाब रही है, वहीं तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक के नेतृत्ववाले गठजोड़ के हिस्से के तौर पर, उसकी सीटों तथा मत फीसद, दोनों में कमी ही हुई है।
तीसरी दक्षिणी विधानसभा, पुड्डुचेरी में एनआर कांग्रेस का पल्लू पकड़कर भाजपा, दोबारा सत्ता तक पहुंचने में कामयाब रही है। जहां इस बार उनका बहुमत घटा है, वहीं इस बार भाजपा की सीटों तथा मत फीसद, दोनों में 2021 के चुनाव के मुकाबले गौर करने लायक गिरावट हुई है।
दूसरी ओर, पूर्वी राज्य असम में भाजपा (अपने गठजोड़ के साथ) न सिर्फ तीसरी बार सत्ता में लौटी है, बल्कि 2021 के चुनाव के मुकाबले सीटों तथा मत फीसद, दोनों में उल्लेखनीय रूप से बढ़ी हुई ताकत के साथ सत्ता में लौटी है। इस तरह, विधानसभा चुनाव के इस चक्र में देश की सत्ता पर काबिज भाजपा ने कुल मिलाकर, देश की राजनीति और शासन पर, अपनी गिरफ्त को और मजबूत कर लिया है।
यह 2024 के आम चुनाव में भाजपा को लगे अप्रत्याशित धक्के के बाद से, जिसमें भाजपा पूर्ण बहुमत से काफी पीछे, 240 के आंकड़े पर सिमट गयी थी और वह सरकार बनाने के लिए बिहार तथा आंध्र प्रदेश के अपने सहयोगियों पर निर्भर होकर रह गयी थी, एक के बाद एक विधानसभा चुनावों में जीत अपने नाम कर के, भाजपा द्वारा 2024 के जनता के फैसले के एक प्रकार से पलटे जाने के ही सिलसिले के जारी रहने को दिखाता है।
बहरहाल, यह तो अपने आप में सिर्फ इतना ही इशारा करता है कि विपक्ष के लिए, भाजपा को चुनाव में हराना 2024 के मुकाबले और मुश्किल हो गया है। और इसलिए, विपक्षी ताकतों का एकजुट होना अब पहले से भी जरूरी हो जाता है। और विपक्षी एकजुटता में कोई भी दरार या कमजोरी, इस काम को और भी मुश्किल बना देगी। लेकिन, यह भी सिर्फ आधी सच्चाई है।
बाकी आधी सच्चाई इसमें निहित है कि उक्त अप्रत्याशित धक्के के बाद से सत्ताधारी भाजपा की तिकड़मों ने, चुनावी हार-जीत के मानी ही बदल दिए हैं। उसने, चुनाव में बेहिसाब धन झोंकने तथा सरकारी मशीनरी समेत हर प्रकार के संसाधनों को अपने पक्ष में जोतने को ही अकल्पनीय ऊंचाइयों पर पहुंचाकर, चुनावी मैदान को पूरी तरह से नाबराबरी का ही नहीं किया है, चुनाव आयोग पर अपने पूर्ण नियंत्रण के जरिए, हर प्रकार के नियम-कायदों के अंकुश से भी पूरी तरह से छूट हासिल कर ली है।
यहां तक कि उसने खुल्लमखुल्ला सांप्रदायिक प्रचार करने तथा धर्म के नाम पर वोट मांगने की भी खुली छूट हासिल कर ली है, जिसकी देश का चुनाव कानून सख्ती से मनाही करता है। चुनाव के इसी चक्र में, खास तौर पर बंगाल तथा असम में, तथाकथित 'घुसपैठियों' से हिंदुओं के लिए खतरे की दुहाई का खुल्लमखुल्ला और नीचे से लेकर प्रधानमंत्री के स्तर तक इस्तेमाल, इसी का सबूत था। जाहिर है कि यह चुनाव को एक जनतांत्रिक चुनाव के बजाए, एक धार्मिक होड़ में ही बदलना है।
लेकिन, दुर्भाग्य से झूठी चुनावी जीत गढ़ने का यह किस्सा, इतने पर ही खत्म नहीं हो जाता है। चुुनाव आयोग की मिलीभगत से पहले हरियाणा में, और फिर महाराष्ट्र में और दिल्ली में, मतदाता सूचियों में बड़ी संख्या में संदिग्ध नामों को जोड़ने और संभावित रूप से भाजपा-विरोधी नामों को काटने का खेल हुआ, जिसके संबंध में बाद में अनेक बड़े खुलासे भी हुए। इसके साथ ही, 2024 के आम चुनाव के साथ हुए ओडिशा तथा आंध्र प्रदेश में विधानसभा चुनावों में, भाजपा और उसके सहयोगियों को इकतरफा जीत दिलाने के खेल के संबंध में भी अनेक खुलासे हुए। वास्तव में खुद 2024 के लोकसभा चुनाव में, मतदान के कई-कई दिनों बाद तक चुनाव आयोग के मत फीसद के आंकड़े बढ़ाते रहने को लेकर भी अनेक सवाल उठे, जिनके जवाब अब तक नहीं मिले हैं।
और इस सब के बाद, बिहार के चुनाव की पूर्व-संध्या से शुरू हुआ, मतदाता सूचियों के विशेष सघन पुनरीक्षण के नाम पर, मतदाता सूचियों में और बड़े पैमाने पर काट-छांट का खेल। अब जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इस सरासर असंवैधानिक तथा जनविरोधी खेल पर वैधता की मोहर लगा दी है, देश भर में इस प्रक्रिया के पूरे होने पर, करीब दस करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने का अनुमान है।

चूंकि इसकी संकल्पना के मूल में 'घुसपैठियों' के खतरे का संघ-भाजपा का झूठा सांप्रदायिक प्रचार है और इसकी पूरी संरचना गरीब-कमजोर तबका विरोधी है, इसका असली मकसद मुसलमानों और दलितों, महिलाओं, प्रवासियों समेत अन्य कमजोर हैसियत के लोगों की मतदाता सूचियों से छंटनी करना है, ताकि मताधिकार को और इसलिए चुनाव को ही आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक ताकतवरों का विशेषाधिकार बनाया जा सके।
इसके साथ, प्रस्तावित परिसीमन को और जोड़ लीजिए, जिसकी तलवार महिला आरक्षण लागू करने का रास्ता खोलने के नाम पर, देश के सिर पर पहले ही लटकायी जा चुकी है। परिसीमन के लिए संघ-भाजपा की आतुरता का मुख्य मकसद तो जाहिर है कि इसके रास्ते, संघ-भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से अनुकूल उत्तरी तथा पश्चिमी राज्यों का आनुपातिक वजन बढ़ाना और अब भी उसके प्रतिकूल दक्षिणी राज्यों का वजन घटाना है। लेकिन, इसी पर बस नहीं होगी।
असम और जम्मू-कश्मीर में हुए परिसीमन का उदाहरण हमारे सामने है, जहां विधानसभा सीटों की भाजपा के मनमाफिक कटाई-छंटाई की गयी है। हैरानी की बात नहीं है कि जनतंत्र की चिंता करने वाले बहुत से लोगों ने तो यह कहना भी शुरू कर दिया है कि एसआईआर के जरिए भाजपा ने, 2029 में अपना दोबारा आना पक्का कर लिया है और परिसीमन के बाद तो 2047 तक उसी का रहना पक्का हो जाएगा!
दूसरे शब्दों में, न्यायपालिका से लेकर चुनाव आयोग तक, विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे के जरिए, मोदीशाही ने यह लगभग सुनिश्चित कर लिया है कि सामान्य रूप से चुनाव के जरिए, हर बार उसी की जीत हो। दूसरी ओर, देश के और आम जनता के वास्तविक हितों का तकाजा है कि इस राज से जल्दी से जल्दी मुक्ति मिले।
जाहिर है कि ऐसे हालात में विपक्ष की सारी ताकतों को एकजुट कर के ही किसी सफलता की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन, यह कहना जितना आसान है, करना उतना ही मुश्किल। इसकी एक वस्तुगत वजह यह भी है कि भारतीय राजनीति और इसलिए विपक्षी राजनीति भी, बहुलतापूर्ण है।
भारतीय संघीय व्यवस्था में, विपक्षी दलों की राज्यों स्तर पर आपसी होड़ एक सच्चाई है, जिससे आंखें नहीं मूंदी जा सकती हैं। फिर भी, संघीय स्तर पर एकता और राज्यों के स्तर पर होड़ की द्वंद्वात्मकता को इंडिया गठबंधन ने एक हद तक तो अब तक साधा भी है।
लेकिन, राज्यों के स्तर पर होड़ को इस प्रकार अनुशासित करने की आपसी समझदारी का अब भी अभाव है कि यह होड़ अखिल भारतीय स्तर पर एकता के दायरे में बनी रहे। विपक्ष की सबसे बड़ी ताकत होने के नाते कांग्रेस की इस तरह की समझदारी के विकास में सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती है।
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लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साप्ताहिक पत्रिका 'लोकलहर' के संपादक हैं.





