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राजस्थान की राजनीति : क्या अब मुद्दों से नहीं, गालियों से चलेगी?

📅 30 May 2026, 10:49 AM • ✍️ paliwalwani • ⏱️ 7 मिनट में पढ़ें
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राजस्थान की राजनीति : क्या अब मुद्दों से नहीं, गालियों से चलेगी?
राजस्थान की राजनीति : क्या अब मुद्दों से नहीं, गालियों से चलेगी?

अनिल सक्सेना 'ललकार'

राजस्थान की राजनीति इन दिनों विकास, रोजगार, किसानों और जनता के असली मुद्दों से ज्यादा बयानबाज़ी, वायरल क्लिप्स और अमर्यादित भाषा को लेकर चर्चा में है। सवाल सिर्फ किसी एक नेता का नहीं है। सवाल पूरी राजनीति के गिरते स्तर का है।

हाल ही में हनुमान बेनीवाल द्वारा मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए “मूर्खाधिराज” जैसे शब्द इस्तेमाल किए जाने का विवाद सामने आया। कई मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया वीडियो में यह बयान चर्चा का विषय बना। भाजपा नेताओं ने इसे लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ बताया, जबकि बेनीवाल समर्थकों का कहना है कि यह जनता के गुस्से की सीधी अभिव्यक्ति है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र में विरोध का मतलब अब व्यक्तिगत अपमान हो गया है? अगर मामला सिर्फ यहीं तक होता तो इसे एक राजनीतिक बयान मानकर आगे बढ़ा जा सकता था। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा युवा मोर्चा राजस्थान के नए प्रदेश अध्यक्ष से जुड़ा कथित वायरल ऑडियो विवाद भी सोशल मीडिया पर चर्चा में रहा, जिसमें एक आरएलपी कार्यकर्ता से कथित गाली-गलौज की बातें सामने आईं। वायरल ऑडियो और वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह विवाद राजनीतिक चर्चा का हिस्सा बना हुआ है।

यहीं नहीं, राजस्थान सरकार के सहकारिता मंत्री गौतम कुमार दक से जुड़ा कथित ऑडियो विवाद और पुलिसकर्मियों से अभद्र भाषा के आरोपों को लेकर प्राथमिकी दर्ज होने की खबरों ने भी राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। मंत्री की ओर से इन आरोपों पर सफाई भी दी गई है। अब बड़ा सवाल यह है कि अगर विपक्ष मुख्यमंत्री के लिए अपमानजनक शब्द इस्तेमाल करेगा, सत्ता पक्ष के नेताओं पर भी गाली-गलौज के आरोप लगेंगे, और राजनीतिक संवाद लगातार नीचे जाएगा… तो फिर जनता किससे मर्यादा की उम्मीद करे?

लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार से कठोर सवाल पूछना है। सत्ता की आलोचना लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन मुख्यमंत्री सिर्फ किसी पार्टी का नेता नहीं होता। वह पूरे राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। उसी तरह विपक्ष भी सिर्फ विरोध करने के लिए नहीं होता, बल्कि जनता की आवाज़ और वैकल्पिक राजनीति का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए दोनों पक्षों से राजनीतिक परिपक्वता और संयम की अपेक्षा रहती है।

लोकतंत्र में शब्द सिर्फ बयान नहीं होते, वे राजनीतिक संस्कृति तय करते हैं। आज राजनीति में एक खतरनाक बदलाव दिखाई दे रहा है। संयम को कमजोरी और आक्रामकता को वायरलिटी माना जा रहा है। सोशल मीडिया के दौर में जितना तीखा बयान, उतनी ज्यादा सुर्खियाँ। लेकिन क्या यही लोकतंत्र की दिशा होनी चाहिए? राजस्थान का युवा नौकरी के फॉर्म भर रहा है। किसान मौसम, लागत और कर्ज से लड़ रहा है। व्यापारी बाजार की मंदी से जूझ रहा है। आम आदमी महंगाई, पानी, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य की समस्याओं से परेशान है। जनता जवाब चाहती है। लेकिन राजनीतिक मंचों पर बहस अब इस बात पर हो रही है कि किसने किसे क्या कहा।

जनता टैक्स इसलिए नहीं देती कि नेता एक-दूसरे को गालियाँ दें। जनता इसलिए वोट देती है कि उसके जीवन की समस्याओं का समाधान निकले। यह भी सच है कि आज की राजनीति में सोशल मीडिया ने नेताओं को अधिक आक्रामक बना दिया है। अब कई बार मुद्दों से ज्यादा वायरल क्लिप्स की राजनीति हो रही है। जो जितना तीखा बोलेगा, वह उतना ज्यादा ट्रेंड करेगा। लेकिन लोकतंत्र सिर्फ ट्रेंड और वायरलिटी से नहीं चलता। लोकतंत्र संवाद, संवेदनशीलता, जवाबदेही और संस्थाओं की गरिमा से चलता है।

  • राजनीति में तीखापन हो सकता है। कठोर आलोचना भी हो सकती है। लेकिन यदि लोकतांत्रिक संवाद व्यक्तिगत अपमान, वायरल गालियों और कटाक्ष की राजनीति तक सीमित हो जाएगा, तो अंततः नुकसान पूरे लोकतंत्र की गरिमा का होगा।
  • जब राजनीति मुद्दों से भटकती है, तब लोकतंत्र कमजोर होता है।
  • और जब भाषा गिरती है, तब सिर्फ नेता नहीं… पूरी राजनीतिक संस्कृति हारती है।
  • कुर्सियाँ बदलती रहेंगी। दल बदलते रहेंगे। बयान भी आते-जाते रहेंगे। लेकिन अगर भाषा गिरती रही, तो लोकतंत्र हार जाएगा।
  • और आज राजस्थान की जनता से सबसे बड़ा सवाल यही है…
  • क्या राजनीति अब विचारों से चलेगी… या सिर्फ वायरल अपमान से?
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    ललकार पूछता है… क्या राजस्थान आने वाली पीढ़ी को विचारों की राजनीति देगा या वायरल अपमान की विरासत? #Since1949ललकार

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