आपकी कलम
आम आदमी इन दिनों एक शून्य सा जीवन जीता हुआ नजर आता : शासन प्रशासन सारे नियम कायदे आम नागरिकों पर थोपता...!
paliwalwani
अन्ना दुराई...✍️
एक समय था जब देश के विभिन्न राजनीतिक दलों के मन में एक डर सा रहता था कि कुछ गलत करेंगे तो जनता का विश्वास हमसे उठ जाएगा। हम दोबारा चुनाव नहीं जीत पाएंगे। इसलिए वे कुछ करें ना करें, जनता से थोड़ा भय जरूर खाते थे। वे उन्हें अपना माई बाप कहने से नहीं चूकते। लेकिन आज समय बदल गया है। अजीब सी परिस्थितियाँ निर्मित हो गई है।
खासकर सत्तारूढ़ दल के अंदर से अब आम जनता का डर समाप्त होता जा रहा है। बड़ी से बड़ी घटनाएँ, दुर्घटनाएँ हो जाए, शिक्षा का मजाक बन जाए। चिकित्सा के नाम पर लूट खसोट हो जाए लेकिन फिर भी सत्तारूढ़ दल न जाने क्यों इतने अहंकार में प्रतीत होता है। घमंड इतना, मानों हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जनहित से जुड़े मुद्दों का हल हो न हो, बेपरवाही का ये मंजर बहुत कुछ इशारा करता है। शासन प्रशासन सारे नियम कायदे आम नागरिकों पर थोपता है। स्वयं की नाकामियों के लिए कोई सजा या लक्ष्मण रेखा नहीं।
इन हालातों में आम आदमी की दशा और दिशा मजबूरी के चलते बदलती जा रही है। जो हो रहा है, होने दो। जो चल रहा है चलने दो। कोई लेना देना नहीं। क्या फर्क पड़ता है। मेरी क्या ताकत, मेरी क्या बिसात। वाकई आम आदमी इन दिनों एक शून्य सा जीवन जीता हुआ नजर आता है। सहने की शक्ति की तो मानों पराकाष्ठा है। परेशानियों के पहाड़ पर चढ़ना उसकी दिनचर्या में शामिल है।
इतना दब सा गया है कि भारी भागदौड़ और मशक्कत के बाद जुगाड़ से दो बाल्टी पानी जुटा ले तो उसमें खुशियॉं ढूंढ लेता है। मोहल्ले भर को बताता है, अपना आज का काम हो गया। उसके मन में यह बात नहीं आती कि इतने सारे वादे करने वाली सरकारें, चुनाव जीतने के बाद उसके लिए क्या करती है। उस पर इतने सारे नियम, इतने सारे बंधन। इन सबके बावजूद एक आम आदमी जैसे तैसे अपनी गुजर बसर करता है।
मौन, चुप्पी, खामोशी का एक कारण और नजर आता है। आजकल किसी को कोई भी सर्टिफिकेट बांट दिया जाता है। जायज बात कहने पर भी जब नाजायज का प्रमाण पत्र दे दिया जाए, तो दुख तो होता है। सबसे ज्यादा तकलीफ अकारण किसी को देशद्रोही, पाकिस्तानी एजेंट, राष्ट्रद्रोही, विदेशी फंडेड आदि करार दिए जाने से होती है। इससे भी ज्यादा खतरनाक है, किसी का चरित्र हनन।
यदि कोई अपने पक्ष में नहीं है या कोई मुद्दे उठाने का प्रयास करे तो उसको अन्य लोगों की नज़रों से गिरा दो। इतना गिरा दो कि वह कभी उठ नहीं पाए। तय है, कौन कौड़ी का, कौन दो कौड़ी का, इस आरोप प्रत्यारोप एवं बहस के बीच जनता यदि अपने हितों के लिए जागरूक नहीं हुई तो उसकी स्थिति फूटी कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी।





