धर्मशास्त्र
क्रोध विनाशकारी शत्रु : संसार में एक से एक बढ़कर क्रोधी राजा, महाराजा और नवाब-बादशाह हुए
paliwalwani
संसार में एक से एक बढ़कर क्रोधी राजा, महाराजा और नवाब- बादशाह हुए हैं, जो मद की अधिकता के कारण जरा-सी बात पर अपने प्रियजनों को भी मरवा डालते थे।
तब भी उनके दरबार में और उनके सम्पर्क में हजारों आदमी रहते थे और मनमाना लाभ उठाते थे, किन्तु कुशलता ऐसे व्यक्तियों की ही रहती थी, जो अपना मानसिक सन्तुलन ठीक रखते थे और अपनी बुद्धि को किसी विषम दशा में विकृत न होने देते थे।
बहुत बार सबल व्यक्ति निर्बल व्यक्तियों को सताते हैं और उन्हें कुचल डालना चाहते हैं। प्रचण्ड क्रोध करते हैं और न जाने क्या कर डालना चाहते हैं? किन्तु बुद्धिमान निर्बल व्यक्ति अपनी शान्ति के बल पर उनके क्रोध के शिकार होने से बच जाते हैं और सबल व्यक्ति अपने क्रोध से स्वयं ही अपना विनाश कर लेते हैं।
क्रोध प्रायः तब तक सक्रिय नहीं हो पाता, जब तक दूसरी ओर से सजातीय प्रतिक्रिया का सहारा नहीं पाता। जहांँ क्रोध में विनाश की संभावनाएंँ निहित रहती है, वहांँ शान्ति में सदा क्षेम का निवास रहता है।
क्रोधी मनुष्य स्वयं अपना विनाश कर लेता है। इसके एक नहीं सैकड़ों उदाहरण इतिहास में पाए जाते हैं। विपत्तियांँ और संकट संसार में किस पर नहीं आते? दुष्ट पर, सज्जन पर भी। धनी पर भी, निर्धन पर भी। निर्बल भी इससे नहीं बचता और न बलवान ही।
किन्तु संकट से रक्षा करने में वही सफल हो पाते हैं, जो अपना सन्तुलन नहीं खोते। इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण है। वह यह कि जिनका सन्तुलन नहीं बिगड़ता, उनकी बुद्धि कुशल बनी रहती है।
- युग निर्माण योजना जुलाई 1969 पृष्ठ पृष्ठ





