Jain wani : जीवन और व्यवहार में विनम्रता का भाव एवं अहंकार का अभाव होना ही मार्दव धर्म है
राजेश जैन दद्दू
इंदौर.
मनुष्य के जीवन और व्यवहार में अहंकार ना होना और विनम्रता एवं सरलता का भाव होना ही मार्दव धर्म है। आचार्यों ने मान को महा विष रूप कहा है। व्यक्ति में स्वाभिमान हो लेकिन अभिमान नहीं होना चाहिए क्योंकि अभिमान/अहंकार व्यक्तित्व के विकास में बाधक है। महान वही बनता है जो विनम्र होकर मार्दव धर्म का पालन करता है।
यह उद्गार दिगंबर जैन आदिनाथ जिनालय छत्रपति नगर में पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर पर प्रवचन देते हुए युवा विद्वान ब्रह्मचारी अंशु भैया (सांगानेर राजस्थान) ने व्यक्त किये। भैया जी ने आगे कहा कि आज मानव मान के कारण मानवता मर रही है कुल, वंश, जाति, रूप, बल एवं ज्ञान और पद का मान दुर्गति का कारण है। अतः सभी को विनम्रता और सरलता से रहते हुए मान का मर्दन करने का प्रयास करना चाहिए।
प्रवचन के पूर्व प्रातः चार स्वर्ण कलशों से श्रीजी का अभिषेक करने का सौभाग्य डॉक्टर जैनेंद्र राजेश जैन दद्दू , डी एल जैन, कमल जैन टेलीफोन एवं अमन कासलीवाल ने प्राप्त किया एवं शांति धारा करने का सौभाग्य अनिल जैन एवं अरविंद अखिलेश सोधिया ने प्राप्त किया। इस अवसर पर जिनालय ट्रस्ट अध्यक्ष भूपेंद्र जैन, ब्रह्मचारी शुभांशु भैया, डॉ वी सी जैन, नीलेश जैन, आदि उपस्थित थे।
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