Friday, 01 May 2026

इंदौर

पट्टाचार्य महोत्सव को एक वर्ष पूर्ण, आचार्य विशुद्धसागर जी की विनम्रता बनी प्रेरणा

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पट्टाचार्य महोत्सव को एक वर्ष पूर्ण, आचार्य विशुद्धसागर जी की विनम्रता बनी प्रेरणा
पट्टाचार्य महोत्सव को एक वर्ष पूर्ण, आचार्य विशुद्धसागर जी की विनम्रता बनी प्रेरणा

राजेश जैन दद्दू 

इंदौर. श्रंमण संस्कृति के महामहिम अध्यात्मयोगी पट्टाचार्य आचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज को पट्टाचार्य पद पर आरूढ़ हुए आज एक वर्ष पूर्ण हो गया है. इस पावन अवसर पर भारत वर्षीय समाजजनों ने विनम्र भाव से "नमोस्तु, नमोस्तु, नमोस्तु" नमोस्तु शासन जयवंत हो कहकर अपनी श्रद्धा भक्ति अर्पित की.

धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि पद और विनम्रता का अनूठा संगम सामान्यतः जब कोई व्यक्ति किसी पद पर आसीन होता है, तो उसके चेहरे की चमक, हाव-भाव और व्यक्तित्व में आया परिवर्तन सहज ही दिखाई देने लगता है.

विशेषकर राजनीतिक पदों पर यह बदलाव और अधिक स्पष्ट होता है, किन्तु दिगम्बर जैन परंपरा में इसका स्वरूप बिल्कुल भिन्न है. जब कोई दिगम्बर जैन साधु पद पर आरूढ़ होता है, तब न तो बाहरी उल्लास का प्रदर्शन होता है और न ही किसी प्रकार का अहंकार झलकता है.

बल्कि उनके मुखमंडल पर शालीनता, गंभीरता और नम्रता की अद्भुत छटा दिखाई देती है. वर्तमान आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज हों या आचार्य श्री समयसागर जी महाराज-दोनों महान आचार्ययो के व्यक्तित्व में यही विनम्रता और संतुलन स्पष्ट परिलक्षित होता है.

पद स्थापना इंदौर का विहंगम दृश्य  

वरिष्ठ समाजसेवी डॉ जैनेन्द्र जैन ने कहा कि जब आचार्य श्री को पट्टाचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया जा रहा था, उस समय भी उनका मुखमंडल आचरण अत्यंत शांत और संयमित था. वे स्थिर भाव से बैठे रहे. भक्तों के उत्साह और उल्लास के बीच उन्होंने अपनी दोनों आँखें बंद कर लीं. न कोई उत्साह का बाहरी प्रदर्शन, न उछाल-कूद, न दिखावा-केवल शांत, चित, स्थिर और गंभीर भाव. उनके मुखमंडल पर विराजमान वह शांति उनके आंतरिक वैराग्य और साधना का परिचायक है. 

एक वर्ष बाद भी वही सहजता  

आज एक वर्ष पूर्ण होने के उपरांत भी गुरुवर के मुख पर ऐसा कोई भाव नहीं दिखाई देता कि वे स्वयं को सर्वोपरि मानते हों. उनकी वही शांत मुद्रा सहजता, वही शांति और वही विनम्रता वात्सल्य आज भी यथावत बनी हुई है.

क्या है इसका कारण?  

इसका उत्तर दिगम्बर जैन परंपरा में निहित है, जब कोई आचार्य सल्लेखना की ओर अग्रसर होता है, तब वह अपने पद का त्याग कर उसे योग्य शिष्य को सौंप देता है. जब एक दिन इस पद को छोड़ना ही है, तो फिर उसके प्रति अहंकार या आसक्ति का क्या औचित्य...? 

संदेश : यह संपूर्ण घटना हमें गहरा संदेश देती है कि पद किसी के श्रेष्ठ होने का प्रमाण नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व है. पद प्राप्त होने पर व्यक्ति को अहंकार से दूर रहना चाहिए. हमें कभी भी किसी को अपने से छोटा नहीं समझना चाहिए और सदैव नम्रता के साथ "नमोस्तु" एवं "प्रति नमोस्तु" की भावना बनाए रखनी चाहिए. यही विचार, यही दर्शन और यही विनम्रता दिगम्बर जैन आचार्यों को महान बनाती है.

"नमोस्तु" एवं "प्रति नमोस्तु

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