ज्योतिषी
सांवरे से नाता : एक अनूठी प्रेम गाथा...!
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मथुरा के एक छोटे से शांत गांव में एक नन्हीं सी कली खिली थी। घर में भक्ति का माहौल था, क्योंकि पास ही कान्हा की नगरी वृंदावन जो थी। जब वह बच्ची मात्र पाँच वर्ष की थी, तब उसके घर वाले बांके बिहारी के दर्शन की तैयारी कर रहे थे। उस दौर में आज की तरह गाड़ियां नहीं थीं, मीलों पैदल चलना पड़ता था।
अपनी तोतली आवाज़ में उसने पिता का पल्लू पकड़कर मनुहार की, "पिताजी, मुझे भी ठाकुर जी के पास ले चलो न!"
पिता ने पुचकार कर कहा, "लाडो, अभी तेरे पैर बहुत कोमल हैं। इतना लंबा रास्ता तू थक जाएगी। अगली बार पक्का ले चलूँगा।"
समय का पहिया घूमा, वह सात साल की हुई। ललक और बढ़ गई थी। फिर वही सवाल और फिर वही जवाब— "अभी तुम छोटी हो।"
उस नन्हीं जान के मन में यह बात बैठ गई कि शायद बिहारी जी उससे मिलना ही नहीं चाहते। गांव के बच्चे जब मंदिर की गलियों और ठाकुर जी की सुंदर छवि का बखान करते, तो उसकी आंखों में आंसू आ जाते। वह मन ही मन कहती— "सब देख आए, बस एक मैं ही अभागन हूँ।"
दिन हफ़्तों में और हफ़्तों सालों में बदल गए। वह बच्ची अब 17 वर्ष की रूपवती युवती बन चुकी थी। संयोग देखिए या बिहारी जी की कृपा, उसका विवाह वृंदावन के ही पास एक गांव में तय हुआ। वह फूली नहीं समा रही थी। उसे लगा, "अब तो मैं उनके पास ही रहूंगी, जब मन करेगा दौड़कर चली जाऊंगी।"
विवाह के बाद जब वह विदा होकर ससुराल जा रही थी, तो रास्ते में यमुना का किनारा आया। उसके पति ने कहा, "तुम यहाँ छाया में बैठो, मैं ज़रा यमुना जी में स्नान करके आता हूँ।"
लाज-शरम का वक्त था, उसने लंबा घूंघट काढ़ रखा था। एकांत पाकर उसका मन फिर से उन्हीं यादों में खो गया। वह सोचने लगी— "इतने साल बीत गए, मैंने उन्हें पुकारा, उनके लिए रोई, पर आज तक उनसे मेरा रिश्ता क्या है? भगवान तो सबके होते हैं, मेरा अपना क्या?"
तभी उसके मन में एक नटखट विचार आया। उसने सोचा, "मेरी उम्र 17 है, मेरे पति 21 के हैं। तो यकीनन मेरे ठाकुर जी भी 17-18 के ही होंगे। इस नाते तो वो मेरे पति के छोटे भाई हुए... यानी मेरे देवर! हाँ! आज से मेरा और उनका रिश्ता पक्का। वो मेरे प्यारे देवर और मैं उनकी बड़ी भाभी।"
वह मन ही मन मुस्कुराई और ठिठोली करते हुए बोली, "ठाकुर जी, रिश्ता तो जोड़ लिया, पर आप मुझे 'भाभी' कहकर कब पुकारोगे?"
अभी ये विचार उसके मन में चल ही रहे थे कि अचानक सन्नाटे को चीरती हुई एक सुरीली आवाज़ आई— "भाभी! ओ भाभी!"
लड़की ठिठक गई। उसने सोचा, "यहाँ मुझे कौन जानता है? मैं तो इस गांव के लिए नई हूँ।" उसने मर्यादा वश घूंघट और नीचे कर लिया। पर वह आवाज़ पास आती गई। एक सांवला सा, बड़ी-बड़ी आँखों वाला किशोर लड़का उसके सामने आकर खड़ा हो गया।
उसने शरारत से कहा, "भाभी! नेक (ज़रा) अपना चेहरा तो दिखाओ। घूंघट में क्यों छिपी हो?"
लड़की घबरा गई, बोली— "जाओ यहाँ से, मैं तुम्हें नहीं जानती। कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगा।"
बालक खिलखिलाकर हंसा, "अरे! मैं तो आपको जानता हूँ। आप उसी गांव की हो न? हमारा घर पास ही है। देखो भाभी, मैं इतनी दूर आपसे मिलने आया और आप बात भी नहीं कर रही? क्या आप मुझसे मिलना नहीं चाहती थीं?"
इतना कहकर उस नटखट लड़के ने झटके से उसका घूंघट ऊपर खींच दिया, उसकी आँखों में झाँका और एक जादुई मुस्कान देकर वहां से भाग गया। लड़की अवाक रह गई। तभी उसका पति वापस आया। उसने सारी बात बताई कि कैसे एक लड़के ने बदतमीजी की। पति ने गुस्से में कहा, "तुम फिक्र मत करो, वृंदावन छोटा सा है। जिस दिन वो हाथ लग गया, उसकी हड्डियां तोड़ दूंगा।"
कुछ दिनों बाद सास ने कहा, "बेटा, नई बहू आई है, इसे बांके बिहारी के दर्शन करा ला।"
अगले दिन दोनों मंदिर पहुँचे। भारी भीड़ थी। पति ने कहा, "तुम आगे जाकर दर्शन करो, मैं यहीं रुकता हूँ।" लड़की मंदिर के गर्भगृह के सामने खड़ी थी, पर घूंघट इतना लंबा था कि कुछ दिख नहीं रहा था। तभी पीछे से पति ने आकर टोक दिया— "अरी बावली! ठाकुर जी सामने खड़े हैं और तू घूंघट डाले खड़ी है? ऐसे कैसे दर्शन होंगे?"
जैसे ही उसने कांपते हाथों से अपना घूंघट उठाया और सामने देखा, उसकी चीख निकल गई। "अरे! ये तो वही है! सुनिए, जल्दी आइये! मिल गया वो लड़का!"
पति दौड़कर आया, "कहाँ है? कौन है?"
उसने कांपती उंगली से सामने सिंहासन पर विराजे बांके बिहारी की ओर इशारा किया और बोली— "वही सांवला लड़का, जिसने यमुना तट पर मुझे भाभी कहा था, वो यही तो है! देखो, कैसे मुस्कुरा रहा है!"
पति ने जैसे ही मूर्ति की ओर देखा, उसकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली। वह अपनी पत्नी के चरणों में गिर पड़ा और बोला— "देवी, तुम धन्य हो! हम बरसों से यहाँ रह रहे हैं, पर हमें तो पत्थर की मूरत दिखती है। पर तुम्हारे निश्छल प्रेम और 'देवर' वाले भाव ने साक्षात जगन्नाथ को तुम्हारे सामने लाकर खड़ा कर दिया।"
आज बांके बिहारी मंदिर में उस भक्तन की प्रेम कथा गूँजती है, जो सिखाती है कि भगवान को पाने के लिए मंत्र नहीं, बस एक प्यारा सा रिश्ता और थोड़ा सा 'हक' चाहिए।
!! बोलिए बांके बिहारी लाल की जय !!
ज्यो:शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा mo no/WhatsApp no9992776726
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान
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HISTORY : !!आओ चले बांध खुशियों की डोर...नही चाहिए अपनी तारीफो के शोर...बस आपका साथ चाहिए...समाज विकास की ओर!!






