Thursday, 16 April 2026

आपकी कलम

भूलोक की कामधेनु : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

paliwalwani
भूलोक की कामधेनु : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
भूलोक की कामधेनु : पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

वर्तमान शताब्दी के महापुरुष भी गायत्री का वैसा ही महत्व स्वीकार करते हैं जैसा कि प्राचीन काल के ऋषियों ने स्वीकार किया था। महात्मा गाँधी कहते थे कि स्थिर चित्त और शांत हृदय से किया हुआ गायत्री का जप आपत्तिकाल के संकटों को दूर करने का प्रभाव रखता है। लोकमान्य तिलक का कथन है कि गायत्री मंत्र में कुमार्ग छोड़ कर सुमार्ग पर चलाने की प्रेरणा विद्यमान है। महामना मदनमोहन मालवीय जी कहते थे कि - ऋषियों ने जो अनेक अमूल्य रत्न हमें दिए हैं उन सब में श्रेष्ठ गायत्री रत्न है। 

कवीन्द्र रबीन्द्रनाथ टैगौर का कथन है कि निर्विवाद रूप से गायत्री मंत्र राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाला है। योगी अरविन्द घोष गायत्री में महत्त्वपूर्ण शक्ति सन्निहित बताते थे। स्वामी रामकृष्ण परमहंस का अनुभव था कि गायत्री से बड़ी-बड़ी सिद्धियाँ मिल सकतीं हैं। स्वामी विवेकानन्द का वचन है कि गायत्री सब मंत्रों की मुकुटमणि है। जगद्गुरु शंकराचार्य का मत है कि गायत्री की महिमा वर्णन करना मनुष्य की सामर्थ्य से बाहर है। स्वामी रामतीर्थ कहते थे कि गायत्री बुद्धि को 'काम' में से हटाकर 'राम' में लगा देती है। 

महर्षि रमण की उक्ति है कि-गायत्री से आध्यात्मिक और भौतिक दोनों ही प्रकार के लाभ मिलते हैं। स्वामी शिवानन्द जी कहते हैं कि गायत्री जप से शरीर निरोग रहता है, स्वभाव में नम्रता आती है, बुद्धि सूक्ष्म होती है, दूरदर्शिता बढ़ती और मानसिक शक्तियों का विकास होता है। 

आर्य समाज के जन्मदाता स्वामी दयानन्द सरस्वती गायत्री के श्रद्धालु उपासक थे। वे गायत्री उपासना पर बहुत जोर देते थे। ग्वालियर के राजा साहब से स्वामी जी ने कहा था कि भागवत सप्ताह कराने की अपेक्षा गायत्री पुरुश्चरण कराना अधिक श्रेष्ठ है। श्री स्वामी दयानन्द ने कई स्थानों पर विशाल गायत्री अनुष्ठानों का आयोजन कराया था जिनमें चालीस-चालीस विद्वान ब्राह्मण बुलाये गये थे।

गायत्री भूलोक की कामधेनु है। इसका आश्रय लेकर मनुष्य उन सब कामनाओं को पूर्ण कर सकता है जो उसके लिए उचित एवं आवश्यक है। इसे अमृत भी कहा है क्योंकि यह आत्मा की समस्त क्षुधाओं, पिपासाओं को शांति करती है। वह भव- बन्धनों के जन्म-मृत्यु के चक्र से छुड़ाने की सामर्थ्य के परिपूर्ण है। गायत्री का अंचल पकड़ने वाला व्यक्ति कुछ से कुछ बन जाता है। इसलिये उसे पारसमणि भी कहा गया है। चाहे कोई गृहस्थ हो या विरक्त, पुरुष हो या स्त्री, बालक हो या वृद्ध, गायत्री उपासना प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कृत्य है। उसकी उपेक्षा करना अपने पुनीत धार्मिक कर्त्तव्य से च्युत होना है।

  • पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
whatsapp share facebook share twitter share telegram share linkedin share
Related News
Latest News
Trending News