इंदौर
इंदौर नगर निगम मस्टर कर्मचारियों का 180 करोड़ दबाकर बैठा...! हारे लेकिन अकड़ नहीं गई, अब कुर्की और फौजदारी कार्रवाई की चेतावनी
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आदेश का पालन या फिर कुर्की...!
हेमंत शर्मा
इंदौर.
इंदौर नगर निगम का कर्मचारियों के हक पर बैठा पहाड़ अब दरकने लगा है. 1391 कर्मचारियों को उनका वैधानिक वेतनमान, पदोन्नति और अवकाश देने के बजाय सालों तक फाइलों में दबाकर रखने वाली व्यवस्था अब कानूनी शिकंजे में फंसती दिख रही है. श्रम आयुक्त ने साफ शब्दों में अंतिम नोटिस जारी कर दिया है. जिसमें कहा गया कि 10 दिन में आदेश लागू करो, वरना कुर्की की कार्रवाई झेलने के लिए तैयार रहो. मामला यहीं नहीं थम सकता, क्योंकि कर्मचारी संगठन अब फौजदारी प्रकरण तक की चेतावनी दे रहे हैं.
श्रम आयुक्त ने साफ शब्दों में अंतिम नोटिस जारी किया
कहानी 2013 से शुरू होती है, जब 10 साल की सेवा पूरी कर चुके, कर्मचारियों की सूची जारी हुई थी. उस वक्त के निगम कमिश्नर राकेश सिंह ने सार्वजनिक रूप से समान कार्य के बदले समान वेतन और पदोन्नति का रास्ता खोलने की बात कही थी. लेकिन कर्मचारियों का आरोप है कि यह घोषणा महज़ दिखावा निकली. हक की जगह इंतज़ार मिला, पदोन्नति की जगह टालमटोल, और वेतन सुधार की जगह चुप्पी. थके-हारे कर्मचारी अदालत पहुंचे.
श्रम न्यायालय से मामला औद्योगिक न्यायाधिकरण पहुंचा और 2023 में साफ फैसला आया-1391 कर्मचारियों को समान वेतन, पदोन्नति, 15 दिन अर्जित अवकाश और 7 दिन आकस्मिक अवकाश दिया जाए और वह भी तय समय-सीमा में. लेकिन आदेश लागू करने के बजाय नगर निगम ने कानूनी गलियारों में भागदौड़ शुरू कर दी.
निजली अदालत, हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट
मामला मध्यप्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा, जहां भी निगम को राहत नहीं मिली. हाईकोर्ट ने निचली अदालत का फैसला सही ठहराया. इसके बाद भी जिद नहीं टूटी और मामला देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट तक ले जाया गया, वहां भी कर्मचारियों की दलीलें भारी पड़ीं और सुप्रीम कोर्ट ने भी पहले के आदेशों को बरकरार रखा.
यानी कानूनी तौर पर तस्वीर पूरी तरह साफ हो चुकी है-कर्मचारी सही थे, निगम गलत. अब असली चोट 180 करोड़ रुपये के बकाया पर है. यह रकम कर्मचारियों के वेतन और पदोन्नति से जुड़ी देनदारी बताई जा रही है. इतने बड़े भुगतान को लेकर भी नगर निगम ने गंभीरता नहीं दिखाई. पहले श्रम आयुक्त ने सुप्रीम कोर्ट की स्थिति स्पष्ट होने तक इंतजार किया, लेकिन अब जब सर्वोच्च स्तर से भी आदेश कायम है, तो श्रम आयुक्त ने सख्त तेवर दिखाए हैं.
प्रशासन पर भारी पड़ सकती है चुप्पी
नोटिस में साफ कहा गया है कि लाभों का निराकरण तुरंत किया जाए, नहीं तो संपत्ति कुर्क करने की कार्रवाई शुरू होगी. इससे पहले भी कारण बताओ नोटिस दिया गया था, लेकिन निगम की तरफ से ठोस जवाब नहीं आया. यही चुप्पी अब प्रशासन पर भारी पड़ सकती है. संभाग मस्टर कर्मचारी यूनियन खुलकर कह रही है कि अगर अब भी आदेश की अनदेखी हुई, तो जिम्मेदार अधिकारियों, खासकर निगम कमिश्नर, के खिलाफ फौजदारी मामला दर्ज कराने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी.
आदेश का पालन या फिर कुर्की ?
यह मामला अब सिर्फ वेतन विवाद नहीं रहा. यह अदालत के आदेशों की अवहेलना, प्रशासनिक जवाबदेही और कर्मचारियों के अधिकारों को कुचलने के आरोपों का प्रतीक बन चुका है. सालों तक अदालतों में हारने के बाद भी अगर आदेश लागू नहीं होते, तो सवाल सिर्फ रकम का नहीं, कानून की साख का भी है. अब देखना यह है कि नगर निगम आदेश मानता है या फिर कुर्की और आपराधिक कार्रवाई की नौबत सच में दरवाज़े पर दस्तक देती है.
साथियों संगठन की जीत आपकी जीत हैं....
मस्टर कर्मचारी संघ इंदौर की ओर से प्रमुख रूप से ओम प्रकाश खटके (एडवोकेट), कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तिवारी, कर्मचारी योद्वा रजनीश तिवारी, महेश बांनगे, अनिल यादव, सचिन गौर, आउटसोर्स कर्मचारी संघ प्रदेश अध्यक्ष वासुदेव शर्मा, भारतीय मजदूर संघ् संयुक्त मंत्री राजेश सोनकर (खटीक), संगठन मंत्री अजय सोनकर, कार्यालय मंत्री दिनेश कौशल, रवि जावडे, मुन्ना कौशल, राज कुमार यादव, सफाई कर्मचारी कल्याण संघ् अध्यक्ष देव बीरदडे, मध्य प्रदेश मांझी मछुआ श्रमिक संघ जिला अध्यक्ष दीपक गौड़, गोविन्द शर्मा, सोनू कल्याणे, नवल संकेत, सचिन गौर, गजेन्द्र यादव, प्रिंस सोनकर, सूरज नाकोड़िया, इसरार अहमद, आकाश सिलावट, तेजु सोलंकी, दिनेश सैन, राहुल वर्मा, अरुण सिलावट, धर्मेन्द्र सिंह यादव (एडव्होकेट), अनिल पंचवाल, रौनक सिंह, जीतू कण्डारे, राम यादव, राम बुरूट, राम सिसौदिया, पवन कौशल, रोहित गौड़, बंटी सिलावट, संदीप राठौर, विजय जैसल ने सभी साथियों ने हर्ष व्यक्त करते हुए कहा कि साथियों संगठन की जीत आपकी जीत हैं. आगे भी संगठन लगातार प्रमुख मांगो पर गंभीरता पूर्वक काम कर रहा हैं, अगर शासन, प्रशासन और नगर निगम नहीं सुनता है, तो आपके हकों की लड़ाई मान्यनीय न्यायलाल में लड़ाई लड़ी जाएगी, जहां आपकी जीत सुनिश्चत हैं.

सर्वोच्च स्तर से भी आदेश कायम है, तो श्रम आयुक्त ने दिखाएं सख्त तेवर
विनियमित कर्मचारियों को नियमित किया जाए और सातवें वेतनमान का लाभ दिया जाए
कर्मचारी संगठन के अध्यक्ष प्रवीण तिवारी के मुताबिक, हमारी मांग है कि निगम वर्ष 2019 से पदस्थ दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों का नियमितीकरण किया जाएगा। इसके अलावा 1997 से 2007 के बीच भर्ती विनियमित कर्मचारियों को नियमित किया जाए और सातवें वेतनमान का लाभ दिया जाए। इसके अलावा कर्मचारी संगठनों ने अनुकंपा नियुक्त देने की भी मांग की।
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