Thursday, 23 April 2026

इंदौर

तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर में ऐतिहासिक क्षण : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रदान की तीन निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा

sunil paliwal-Anil Bagora
तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर में ऐतिहासिक क्षण : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रदान की तीन निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा
तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर में ऐतिहासिक क्षण : मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने प्रदान की तीन निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा

राजेश जैन दद्दू 

इंदौर. 

बाल ब्र. सारांश, क्षु. समादर सागर एवं बाल ब्र. रुपेश बने क्रमशः मुनि श्री 108 सारसागर, मुनि श्री 108 समादरसागर एवं मुनि श्री 108 रुपसागर महाराज (गिरीडीह) तीर्थराज श्री सम्मेदशिखर की पावन वंदनीय भूमि पर शनिवार, 18 अप्रैल का दिन ऐतिहासिक बन गया, जब मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने भव्य धार्मिक वातावरण में तीन मोक्ष मार्ग के पथिक साधकों को निर्ग्रंथ जैनेश्वरी मुनि दीक्षा प्रदान की। इस दीक्षा समारोह में ब्र. सारांश भैया मुनि श्री 108 सारसागर महाराज, क्षुल्लक समादर सागर मुनि श्री 108 समादरसागर महाराज तथा बाल ब्रह्मचारी रुपेश भैया मुनि श्री 108 रुपसागर महाराज बने।

धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि दीक्षा प्रदान करने के उपरांत मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने नवदीक्षित मुनिराजों को संबोधित करते हुए कहा कि साधु बनने के बाद संसार के आकर्षण और विकार स्मरण आ सकते हैं, किंतु साधु का लक्ष्य इन सबसे ऊपर उठकर आत्मशुद्धि करना है। उन्होंने कहा कि मुनि बनने के पश्चात लोग पूजा करें, प्रशंसा करें, सम्मान दें या आलोचना करें-यह उनके भाव हैं, परंतु साधु का मार्ग इन सबसे परे होता है। “मैं साधु बना हूँ न पूजा पाने के लिए, न समाज से संरक्षण पाने के लिए, बल्कि अपने जीवन को पवित्र बनाने और मोक्ष-पथ को साधने के लिए।”

उन्होंने भगवान महावीर से लेकर आचार्य कुंदकुंद तथा आचार्य विद्यासागर महाराज की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि साधु का लक्ष्य अपने अंतर्मन को निर्मल करना है। उन्होंने भावुक होकर कहा कि उन्होंने कोई नया कार्य नहीं किया, बल्कि वही जिम्मेदारी निभाई है जो आचार्य गुरुदेव श्री विद्यासागर जी महामुनिराज ने सन् 2019 में नेमावर में सौंपी थी। दीक्षा से पूर्व इन युवाओं ने आचार्य गुरुदेव से ब्रह्मचर्य व्रत लिया और वर्ष 2020 से सतत साधना में रत रहकर अपने जीवन को तप एवं संयम से तपाया तथा दीक्षा के योग्य बने।

मुनि श्री ने कहा कि साधु का आधार लोगों की प्रशंसा नहीं, बल्कि 28 मूलगुणों की रक्षा और पंचाचार का पालन है। एक अच्छा शिष्य अपने जीवन को गुरु के हाथों में बंसी के समान रख देता है—जहाँ से जो स्वर निकले वही उसकी साधना बन जाती है। उन्होंने समाज को संबोधित करते हुए कहा कि साधुओं का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनकी मर्यादा की रक्षा से होता है। साधु-संतों का निर्वाह करना समाज की जिम्मेदारी है। सेवा, विनय और साधना में सहयोग से ही धर्म का वातावरण सशक्त बनता है।

गुणायतन मध्यभारत के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया कि 20 तीर्थंकरों की मोक्ष नगरी श्री सम्मेदशिखर में यह जैनेश्वरी दीक्षा विशेष ऐतिहासिक रही, क्योंकि एक मुनिराज द्वारा भावी मुनिराज को दीक्षा प्रदान की गई। उन्होंने कहा कि यह कोई नई परंपरा नहीं है, इतिहास में इसके अनेक उदाहरण हैं। आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने भी मुनि विद्यासागर महाराज को मुनि अवस्था में ही दीक्षा प्रदान की थी।

दीक्षा पूर्व नवदीक्षार्थियों ने अपने भाव मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज के समक्ष रखे। मुनि श्री ने परिवारजनों, उपस्थित मुनिराजों, आर्यिका संघ, समस्त त्यागी वृत्तियों, विद्वानों एवं समाज के गणमान्य लोगों की अनुमति के पश्चात धार्मिक विधि-विधानों के साथ पंचमुष्टि केशलोंच एवं पंचगुरु भक्ति के साथ दीक्षा संस्कार संपन्न कराए। वस्त्र त्याग का दृश्य अत्यंत भावपूर्ण एवं पावन रहा। नवदीक्षित मुनिराजों को पिच्छिका, शास्त्र तथा शुद्धि हेतु कमंडल गुरुभक्त परिवारों द्वारा भेंट किए गए।

प्रातःकाल नवदीक्षार्थी मुनिराजों की बग्गी में भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक गुरु भक्ति की। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया लिधोरा एवं अभय आदित्य ने किया। संघस्थ मुनि श्री संधान सागर महाराज ने नवदीक्षित मुनिराजों का जीवन परिचय प्रभावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का ध्वजारोहण देश के भामाशाह श्री अशोक पाटनी एवं श्रीमती सुशीला पाटनी (आर.के. मार्बल) द्वारा किया गया। दयोदय महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेमचंद प्रेमी, दिगंबर जैन महासभा के राष्ट्रीय कार्याध्यक्ष गजेन्द्र जैन पाटनी (कुनकुरी) सहित अनेक गणमान्य जन उपस्थित रहे।

इस अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों—मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक आदि से तथा बेंगलुरु, दिल्ली, मुम्बई, इंदौर, दुर्गापुर, गोहाटी, सतना, फिरोजाबाद, औरंगाबाद, भोपाल, सागर, आगरा, कोलकाता, ग्वालियर, कन्नौज, जयपुर, बगसरिया, रतलाम, अहमदाबाद, कटनी, रांची, शामली, किशनगढ़ (राजस्थान), बांसा, अलवर, गन्नौर, जबलपुर, गुड़गांव, कोडरमा, ईसरी, हजारीबाग, गया, धूलियान, कोटा, विदिशा, पुणे, गाजियाबाद, लुधियाना, गोमिया, साड़म, चिरमरी, बुढार, राहतगढ़, खातेगांव, सिलवानी, वाराणसी, मुगलसराय सहित अनेक नगरों से श्रद्धालु उपस्थित रहे। विदेशों से ह्यूस्टन (अमेरिका), बैंकॉक और सिंगापुर से भी श्रद्धालुओं ने सहभागिता की।

सायंकाल 4 से 5 बजे तक शंका समाधान कार्यक्रम आयोजित हुआ, जिसमें श्रद्धालुओं ने अपने प्रश्न रखे और गुरुदेव से समाधान प्राप्त किया। समारोह में अपार जनसमूह की उपस्थिति ने पूरे वातावरण को आध्यात्मिक उत्साह और भक्ति से ओतप्रोत बना दिया।

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