भोपाल
2028 की तैयारी : दिग्विजय सिंह सरकार बनाकर ही मानेंगे : जन्मदिवस पर विशेष
paliwalwani
मध्यप्रदेश की राजनीति में संघर्ष, विचार और ज़मीनी सच्चाई का दूसरा नाम दिग्विजय सिंह है। 2028 का चुनाव उनके लिए केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतंत्र और संविधान की पुनर्स्थापना की लड़ाई है। उनका संदेश साफ़ है—यह चुनाव जीता जाएगा, और सरकार बनाकर ही मानी जाएगी।
दिग्विजय सिंह जानते हैं कि चुनाव भाषणों से नहीं, संगठन से जीते जाते हैं। इसलिए 2028 की रणनीति का पहला आधार बूथ से विधानसभा तक संगठन को मज़बूत करना है। हर बूथ पर सक्रिय कार्यकर्ता, हर मंडल में जवाबदेह नेतृत्व और ज़िले स्तर पर संघर्षशील टीम तैयार की जा रही है।
दूसरा बड़ा प्लान है जनता के मुद्दों पर सीधी लड़ाई। किसान, बेरोज़गार युवा, महिला सुरक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार—इन मुद्दों को काग़ज़ से निकालकर सड़क और सदन तक ले जाना। हर आंदोलन, हर धरना जनता को यह महसूस कराएगा कि कांग्रेस ही उनकी असली आवाज़ है।
तीसरी रणनीति है युवा नेतृत्व को आगे लाना। दिग्विजय सिंह मानते हैं कि 2028 युवा मतदाताओं का चुनाव होगा। सोशल मीडिया से लेकर ज़मीनी अभियानों तक, युवाओं को नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा।
चौथा और सबसे अहम प्लान है भाजपा की नाकामी को बेनक़ाब करना—झूठे वादे, टूटती कानून व्यवस्था, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार को तथ्यों के साथ जनता के सामने रखना।
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दिग्विजय सिंह का विश्वास साफ़ है—जब संगठन मज़बूत होगा, मुद्दे जनता के होंगे और संघर्ष ईमानदार होगा, तब 2028 में सरकार बनना तय है। यह तैयारी है, यह प्लान है, और यही संकल्प.
पूर्व मुख्यमंत्री श्री दिग्विजय सिंह जी के जन्मदिवस पर विशेष
राजनीति के पुरोधा दिग्विजय सिंह जी, जमीनी संघर्ष और जन सेवा के पर्याय हैं...,
मध्यप्रदेश की ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति में उन विरले नेताओं के नामों को उंगलियों पर गिना जा सकता है जिनका जुड़ाव सीधे जमीन और आम कार्यकर्ताओं से है। इस फेहरिस्त में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। वे जितने कद काठी से मजबूत हैं उतने ही बौद्धिक रूप से ज़हीन और सुलझे हुए राजनेता हैं। उनकी विलक्षण स्मरण शक्ति का तो पूरा देश कायल है। दशकों पुराने मिलने वालों को नाम से पुकारना उनकी विशिष्ट पहचान है।
दिग्विजय सिंह जी ने संपन्न व राजसी पृष्ठभूमि होने के बावजूद वैभव के स्थान पर संघर्ष को प्राथमिकता दी। उनकी राजनीति विशुद्ध जमीनी और जन सेवा को समर्पित रहती है। इसीलिए तो उन्हें जमीनी राजनीति का पुरोधा कहा जाता है। उन्होंने सत्ता और संगठन में संगठन को सर्वोपरि रखा। दिग्विजय सिंह जी ने संगठन के कार्यों में उनकी रुचि से जुड़ा एक बड़ा रोचक वाक्या सुनाया। उन्होंने बताया कि राजीव गांधी जी ने पूरे देश में सक्रिय युवा नेतृत्व की खोज के लिए टैलेंट हंट का आयोजन किया था जिसकी जिम्मेदारी तरुण गोगोई जी को दी गई थी।
जिसमें देश भर से युवाओं का चयन किया गया उनमें से एक वे भी थे। वे बताते हैं कि उस वक्त उनका इंटरव्यू राजीव गांधी जी ने स्वयं लिया था। राजीव जी ने इंटरव्यू के दौरान दिग्विजय सिंह जी से पूछा कि "आप क्या करना चाहते हो तो उन्होंने कहा कि मैं आपके साथ काम करना चाहता हूं। राजीव जी ने कहा कि मेरे साथ काम करने के लिए आपको मंत्री पद छोड़ना पड़ेगा, तब दिग्विजय सिंह जी न कहा कि आप कहें तो मैं आज रात को भोपाल पहुंचकर इस्तीफा दे देता हूं। हालांकि राजीव जी न उनका इस्तीफा उस वक्त नहीं लिया। और बाद में राजीव गांधी जी ने उन्हें मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में मनोनीत किया।
मध्यप्रदेश जैसे विशाल राज्य तब जिसमें छत्तीसगढ़ भी शामिल था, वहां संगठन को खड़ा करना हंसी खेल नहीं था। तब दिग्विजय सिंह जी ने एक गाड़ी में बोरिया बिस्तर बांधकर पूरे प्रदेश को नाप दिया था। गांव-गांव रात रुक कर लोगों के मिजाज को समझा। ब्लॉक स्तर पर जाकर अच्छे लोगों को ढूंढकर पदों पर बैठाया। जमीन पर इतना काम किया कि पूरे प्रदेश में कांग्रेस दिखाई देने लगी। उन्होंने प्रदेश की तासीर को समझा, विधानसभा चुनाव लड़ने लायक नेताओं को तैयार किया। परिणाम स्वरूप 1993 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनी।
ताज्जुब ये था कि 1993 में कांग्रेस की सरकार बनने से पहले किसी ने दिग्विजय सिंह जी के मुख से मुख्यमंत्री बनने की बात तक नहीं सुनी थी। क्योंकि उन्होंने इस बात का कभी शोर नहीं मचाया कि उन्हें मुख्यमंत्री बनना है बल्कि जिस तरह महाभारत में अर्जुन ने एकाग्रता के साथ चिड़िया की आंख को भेदने का लक्ष्य बनाया था उसी तरह दिग्विजय सिंह जी ने मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार बनाने का एकमेव लक्ष्य तय कर रखा था। अपने संकल्प के प्रति गंभीरता के साथ दृढ़ प्रतिज्ञ रहने की वजह से ही उन्होंने सरकार बनाने के लक्ष्य को पूरा किया था।
दिग्विजय सिंह जी में अपार संगठन क्षमताएं हैं। वे अक्सर कहते हैं जिस पार्टी के पास कैडर, कार्यकर्ता और कार्यक्रम होंगे वो पार्टी हर परिस्थिति में सफल होगी। दिग्विजय सिंह जी राजनीति के शुरुआती दौर से ही संगठन के विभिन्न पदों पर रहे। 1971 में उन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली। 1972 में गुना जिला कांग्रेस कमेटी के महामंत्री बने। 1978 से 1980 तक मध्यप्रदेश युवा कांग्रेस के महामंत्री और प्रभारी बनाए गए तब भंवर सिंह पोर्ते जी प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष थे और दिग्विजय सिंह जी विधायक थे। वे 1985 से 1988 तक एवं 1991 से 1994 तक मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रहे।
2004 के बाद लगभग 13 साल अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महामंत्री रहे। उसी दौरान वे कई राज्यों के संगठन प्रभारी भी थे। यही कारण है कि संगठन के छोटे से बड़े पदों पर रहने की वजह से वे संगठन की बारीकियों को बहुत अच्छे से समझते हैं। संगठन को मजबूत करने का उनका हमेशा एक ही फार्मूला रहा, संगठन को स्वायत्त बनाना और उसका विकेंद्रीकरण किया जाना। वे विकेंद्रीकरण के इतने बड़े हिमायती थे कि जब मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने राजीव गांधी जी के सपने को साकार करते हुए ग्राम स्वराज की स्थापना के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण कर त्रि- स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की।
दिग्विजय सिंह जी ने जन-मानस की नब्ज समझने के लिए महात्मा गांधी जी की तरह हमेशा 'पदयात्रा' को ही अपना सबसे अचूक अस्त्र बनाया। इसका सबसे अनुपम उदाहरण उनकी 'नर्मदा परिक्रमा' रही, जहाँ उन्होंने 3,300 किलोमीटर की कठिन दूरी पैदल तय कर अपनी अटूट आस्था और अदम्य इच्छाशक्ति का परिचय दिया। हालांकि यह उनकी पूर्णतः एक आध्यात्मिक और निजी साधना थी, किंतु इस कठिन तपस्या के दौरान अनगिनत गांवों और मजरों से गुजरते हुए उन्होंने जो जन-संवाद किया, उसने प्रदेश की जनता के मन में उनके प्रति अगाध विश्वास भर दिया। जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला। विनम्रता के साथ यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि दिग्विजय सिंह जी की "पैदल नर्मदा परिक्रमा" रूपी मंथन से अमृत के रूप में जनता और कांग्रेस नेताओं के बीच में आत्मिक जुड़ाव उभर कर सामने आया और फिर जन-आशीर्वाद ने 2018 में मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सत्ता में वापसी की राह प्रशस्त की।
दिग्विजय सिंह जी की धार्मिक पदयात्रा के अनुभव का लाभ देश ने तब भी देखा, जब राहुल गांधी जी की 'भारत जोड़ो यात्रा' के प्रबंधन व संचालन की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई। उस एक पदयात्रा ने राहुल गांधी जी और कांग्रेस का कायापलट कर दिया। लोगों ने पदयात्रा के दौरान राहुल गांधी जी को करीब से देखा तब उन्हें पता लगा कि राहुल जी के बारे में उन्हें झूठ बताया जाता रहा। व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी द्वारा राहुल गांधी जी को गलत ठहराने का एक षड्यंत्र रचा गया, जबकि वास्तविकता तो कुछ और ही है। भारत जोड़ो यात्रा से ही राहुल गांधी जी की छवि और निखरकर सामने आई। ऐसी ऐतिहासिक यात्रा को सुचारु रूप से चलाने की ज़िम्मेदारी दिग्विजय सिंह जी ने बखूबी निभाई। नर्मदा तट की पगडंडियों से लेकर कन्याकुमारी से कश्मीर तक की सड़कों तक, दिग्विजय सिंह जी ने यह सिद्ध कर दिया कि वे केवल सत्ता के गलियारों के खिलाड़ी नहीं, बल्कि जमीन पर पसीना बहाने वाले एक सच्चे वैचारिक तपस्वी हैं।
दिग्विजय सिंह जी की संगठन में पकड़ इसीलिए भी है कि वे नेताओं-कार्यकर्ताओं में समन्वय और आपसी तालमेल बनाने में माहिर हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है 1993 से 2003 तक 10 साल चली कांग्रेस की दिग्विजय सरकार रही। दिग्विजय सिंह जी की समन्वय शक्ति का अंदाजा आप इस बात से ही लगा सकते हैं कि अविभाजित मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए भी दिग्गज नेताओं के बीच संतुलन बनाते हुए वे 10 वर्ष तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। उस दौर में मध्यप्रदेश की राजनीति में अर्जुन सिंह जी, मोती लाल बोरा जी, माधवराव सिंधिया जी, विद्याचरण शुक्ल जी, श्यामाचरण शुक्ला जी, कमलनाथ जी, सुभाष यादव जी, श्रीमती जमुना देवी जी व शिवभानु सिंह सोलंकी जी जैसे प्रभावशाली नेताओं का अच्छा खासा वर्चस्व था और इन शीर्षस्थ नेताओं के साथ बिना तालमेल बनाए सत्ता के शिखर पर बने रहना आसान कार्य नहीं था। लेकिन दिग्विजय सिंह जी की समन्वय क्षमता ने वो करिश्मा भी कर दिखाया था।
दिग्विजय सिंह जी हर कार्यकर्ता को जमीन से जुड़े रहने के लिए पंच 'स' का अचूक नुस्खा बताते हैं। संपर्क, संवाद, समन्वय, सामंजस्य और सकारात्मक सोच। यदि हर कार्यकर्ता और नेता ये नुस्खा अपना ले तो उसके बाद उन्हें सफलता हासिल न हो ऐसा हो ही नहीं सकता। वे यह भी बताते हैं कि नेताओं को चाहिए कि उन्हें धैर्य के साथ लोगों को सुनना भी सीखना चाहिए, यदि आपने जनता और पार्टी कार्यकर्ता की बात ध्यान से सुन ली तो काम बताने वाले को उतने में ही संतोष मिल जाता है।
संगठन की मजबूती की पैरवी करने वाले दिग्विजय सिंह जी की खास बात यही है कि वे पक्के गांधी-नेहरू वादी नेता हैं, वे कांग्रेस की हर टूट में अटूट रहे क्योंकि विचारधारा को उन्होंने हर क्षण जिया। वे दिल से ये बात मानते हैं कि कांग्रेस पार्टी ने उन्हें खूब दिया, इसीलिए पार्टी के खिलाफ बगावत करने के बारे में वे सपने में भी नहीं सोच सकते। हां, सांगठनिक स्तर पर सुधार की बात वे करते रहते हैं पहले भी करते थे और अपने मातृ संगठन की भलाई के लिए हमेशा करते रहेंगे जिसमें किसी को व्यक्तिगत नहीं लेना चाहिए और न बुरा मानना चाहिए।





