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दो कौड़ी की कविताये

📅 16 November 2023, 05:48 PM • ✍️ Paliwalwani • ⏱️ 2 मिनट में पढ़ें
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दो कौड़ी की कविताये
दो कौड़ी की कविताये

दो कौड़ी की कविताये

दो कौड़ी की कविताएं मैं लिखता हूँ।

खुद भी तो मैं दो कौड़ी का दिखता हूँ।

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दो कौड़ी का व्यक्तिव मेरा।

दो कौड़ी का अस्तित्व मेरा।

दो कौड़ी की है गात मेरी।

दो कौड़ी की औकात मेरी।

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दो कौड़ी ही तनख्वाह मेरी।

दो कौड़ी ही परवाह मेरी।

दो कौड़ी रोज कमाता हूँ।

दो कौड़ी में इतराता हूँ।

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कपड़ा हूँ मिट्टी सुतली हूँ।

दो कौड़ी का कठपुटली हूँ।

उंगली पर डोर घुमाता वो।

अपनी मर्जी से लिखाता वो।

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है कलाकार ऊपर वाला।

जड़ चेतन सबका रखवाला।

है हुनर दिया मुझको जिसने,

औकात नहीं देखा उसने।

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वह यहां वहाँ का खालिक है।

दोनों जहान का मालिक है।

उसकी दो कौड़ी इतनी है।

सम्राट हैशियत जितनी है।

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दो कौड़ी में खुश रहता हूँ।

शुकराना उसका कहता हूँ।

मेरा मौला दया समंदर का,

मैं तट का कण भर सिक्ता हूँ।

दो कौड़ी की कविताएं मैं लिखता हूँ ।

खुद भी तो मैं दो कौड़ी का दिखता हूँ।

  • सतीश सृजन, लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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  • हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है, आप भी अपनी रचना भेजने के लिए फोटो सहित मेल paliwalwani2@gmail.com करें.

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