ज्योतिषी
होली पर धन प्राप्ति के सरल उपाय
paliwalwani
पिछली पोस्ट में आपने उपाय संबंधित नियम एवं निर्देशो को जाना था आज हम आपको होली पर किये जाने वाले उपायों के बारे में जानकारी देंगे। आपने पहले कभी ऐसा लेख नही देखा होगा जिसमें उल्लेख हो कि होली पर माँ लक्ष्मी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। अभी तक प्रतीक लेखों में दीपावली पर ही माँ लक्ष्मी संबंधित उपायों की जानकारी दी जाती रही है। होली पर आगे दिए जा रहे उपायों में से कोई भी उपाय कर आप लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्त कर सकते है।
- उपाय 1???? यदि आप आर्थिक संकट में है तो होली की रात्री में सर्वप्रथम निवास के पूजा स्थल में माँ लक्ष्मी की प्रतिमा के समक्ष रोली में लाल गुलाल मिलाकर माँ को तिलक करें इस दौरान माँ लक्ष्मी के किसी भी मंत्र का यथा सामर्थ्य जप करें इसके बाद निवास अथवा व्यावसायिक स्थल की एक कील के ऊपर कलावा (मौली) बांधकर जिस स्थान पर होली जलनी है वहाँ मिट्टी में दबा दें अगले दिन उस कील को निकाल कर मुख्य द्वार के बाहर की मिट्टी में दबा दें। इस उपाय के प्रभाव से आपके निवास अथवा व्यावसायिक प्रतिष्ठान में नकारत्मक शक्ति का प्रवेश नही होगा।
- विशेष???? यदि कील को होली जलने वाले स्थान पर दबाना संभव ना हो तो जब होली जल जाए तो उसकी राख लाकर किसी मिट्टी के पात्र में रख कर इस राख के नीचे कील को दबा दें ध्यान रहे राख को घर से बाहर ही सुरक्षित स्थान पर रखें दूसरे दिन राख में से कील निकाल ऊपर बताये अनुसार ही प्रयोग करें एवं होली की राख को जल में प्रवाहित कर दें।
- उपाय 2???? आपके ऊपर किसी भी प्रकार का कोई कर्ज है अथवा आय में कमी है तो होली की रात्रि में जहाँ होली जलनी है वहां की जमीन में छोटा सा गद्दा खोद कर उसमे ५ अभिमंत्रित गोमती चक्र व इतनी ही कौड़िया दबा दें साथ ही हरे गुलाल से गड्ढे को भर के ऊपर से मिट्टी डाल दें। गड्ढे के ऊपर एक पान का पत्ता रखकर उस पर पीला गुलाल, एक सिक्का, एक छोटी कील और सुपारी रखें अब जब होली जले तब एक पान के पत्ते पर एक बताशा, एक जोड़ी लग्न घी में डुबोकर, एक बड़ी इलायची, काले तिल, पीली सरसों, एक सुपारी व एक गुड़ की डली रख कर पीला गुलाल छिड़क दें और दूसरे पान के पत्ते से ढक दें उस के ऊपर ७ गौमती चक्र रखें और होली की सात परिक्रमा करते हुए प्रत्येक परिक्रमा में निम्न मंत्र का जाप करते हुए एक गौमती चक्र होली में डालते जाएं।
मंत्र???? फ्रीम फ्रीम अमुक (जिसका कर्ज देना है) कर्ज विनशयते फट स्वाहा।
यहाँ अमुक के स्थान पर कर्जदार का नाम लें परिक्रमा पूर्ण होने पर प्रणाम कर वापस आ जाये। अगले दिन होली जलने वाले स्थान पर जाकर सर्वप्रथम गड्ढे के निकट ३ अगरबत्ती दिखाकर गड्ढे से सारी सामग्री निकाल लें इसमे कुछ सामग्री जल भी सकती है। सामग्री के साथ उस स्थान की थोड़ी मिट्टी भी ले लें और सारी सामग्री के साथ मिट्टी को किसी नीले कपड़े में लाल गुलाल के साथ बांधकर पोटली को तीव्र प्रवाह के जल में प्रवाहित कर दें इस उपाय से कुछ ही समय मे कर्ज मुक्ति के मार्ग खुलने लगेंगे।
- विशेष ???? होली जलने के बाद वहाँ दबी सामग्री आपको शायद ना भी मिले ऐसी स्थिति में परेशान होने की आवश्यकता नही है। आप केवल राख प्राप्त करें और ऊपर बताई सामग्री पुनः राख में रख पोटली बनाकर जल में प्रवाहित करें।
- उपाय 3 ???? यदि आपको लगता है आपको मेहनत के अनुसार लाभ अथवा सुविधाए नही मिलती है तो होली से पहले किसी सुनार से मिलकर उससे अपनी मध्यमा उंगली के माप के छल्ले के लिये ५०% चांदी, ३०% लोहा एवं २०% पीतल के अनुसार तीन धातुएँ ले और होली जलने से पहले उस स्थान पर ईशान कोण में गड्ढा खोदकर लाल गुलाल के साथ तीनो धातुएँ और ११ लौंग भी दबा दें और गद्दा बन्द करके ऊपर से पीले गुलाल से स्वस्तिक बना कर होली की पूजा करे होलिका दहन होने के बाद एक पान के पत्ते पर कर्पूर, थोड़ी हवन सामग्री, शक्कर, शुद्ध घी में डुबोकर लौंग का जोड़ा, काले तिल और पीली सरसों रखें व दूसरे पान के पत्ते से उस पत्ते को ढक दें और जिस स्थान पर आपने धातुएँ दबाई है उस स्थान से ही परिक्रमा आरम्भ करें प्रत्येक परिक्रमा में ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जप करते हुए होली की अग्नि में एक बताशा डालते जाए सात परिक्रमा होने पर पान के पत्ते की सारी सामग्री होली में अर्पित कर दें तथा प्रणाम कर वापस आ जाएं। अगले दिन नए पान के पत्ते वाली सामग्री पुनः ले जाकर जो धातुएँ दबाई है उन्हें निकाल लें तथा पान के पत्ते की सामग्री गड्ढे में रकह कर लाल गुलाल से गड्ढा भर के उसके ऊपर ३ अगरबत्ती जला दें और प्रणाम कर आ जाये अब किसी सुनार से तीनों धातुओं को मिलाकर अपनी मध्यमा उंगली की नाप का छल्ला बनवाकर १५ दिन बाद आने वाले शुक्ल पक्ष के गुरुवार के दिन धारण करें जब तक आपके पास यह छल्ला रहेगा तब तक आर्थिक समस्या बनने पर भी परेशान नही करेंगी।
- विशेष ???? अगर होलिका दहन के स्थान पर धातु दबाना सम्भव ना हो तो इसे भी होलिका की राख लाकर दबा दें लेकिन घर के बाहर ही रखें इसके बाद समस्त क्रिया ऊपर बताये अनुसार ही करे और अगके दिन तीनो धातु निकाल कर छल्ला बनवालें और ऊपर बताये अनुसार ही धारण करें। यदि सम्भव हो तो ऊपर बताये अनुसार उपाय करने का प्रयास करें यह ध्यान रहे तीनो धातुओं का अगले दिन मिलना आवश्यक है यदि धातुएँ दबाई जगह नही मिली तो उपाय विफल हो जाएगा।
क्रमशः
ज्यो:शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा
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● Disclaimer :इस लेख में दी गई ज्योतिष जानकारियां और सूचनाएं लोक मान्यताओं पर आधारित हैं. इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं. इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं. पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. पालीवाल वाणी इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले इससे संबंधित पंडित ज्योतिषी से संपर्क करें तथा चिकित्सा अथवा अन्य नीजि संबंधित जानकारी के लिए अपने नीजि डॉक्टरों से परार्मश जरूर लीजिए. पालीवाल वाणी तथा पालीवाल वाणी मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है.
HISTORY : !!आओ चले बांध खुशियों की डोर...नही चाहिए अपनी तारीफो के शोर...बस आपका साथ चाहिए...समाज विकास की ओर!!
गाय का दूध हल्का पीला क्यों होता है..
धार्मिक ग्रंथों में लिखा है "गावो विश्वस्य मातर:" - अर्थात गाय विश्व की माता है। गौ माता की रीढ़ की हड्डी मे सूर्य नाड़ी एवं केतु नाड़ी साथ हुआ करती है और जब वो धूप में निकलती तो सूर्य का प्रकाश गौमाता की रीढ़ हड्डी पर पड़ने से घर्षण द्धारा केरोटिन नाम का पदार्थ बनता है, जिसे स्वर्णक्षार कहते है। यह पदार्थ नीचे आकर दूध में मिलकर उसे हल्का पीला बनाता है।
इसी कारण गाय के दूध का रंग हल्का पीला या सुनहला होता है जिसे पीने से बुद्धि का तीव्र विकास होता है। जब हम किसी अत्यंत अनिवार्य कार्य से बाहर जा रहे हो और सामने गाय माता के इस प्रकार दर्शन हो की वह अपने बछड़े या बछिया को दूध पिला रही हो तो हमें समझ जाना चाहिए की जिस काम के लिए हम निकले है वह कार्य अब निश्चित ही पूर्ण होगा।
गौ माता का (गोधूलि वेला) में घर वापस लौटने का संध्या का समय अत्यंत शुभ एवं पवित्र है। गाय का मूत्र गौ-औषधि है। माँ शब्द की उत्पत्ति गौ मुख से हुई है और मानव समाज ने भी माँ शब्द कहना गाय से सीखा है। जब गौ वत्स रंभाता है तो "माँ" शब्द गुंजायमान होता है। गौशाला में बैठकर किये गए यज्ञ, हवन,जप-तप का फल कई गुणा मिलता है। बच्चों को नज़र लग जाने पर गौ माता की पूंछ से बच्चों को झाड़े जाने से नजर उतर जाती है। ऐसा उदाहरण पूतना उद्धार में भगवान कृष्ण को नज़र लग जाने पर गाय की पूंछ से नजर उतारने का ग्रँथों में भी पढ़ने को मिलता है।*
सर्व ज्ञात है कि गौ की महिमा तो अपरम्पार है किन्तु फिर भी कुछ अनजान वैज्ञानिक तथ्य है जो जानने योग्य हैं। कहते है की गौमाता के खुर से उडी हुई धूलि को सिर पर धारण करता है वह मानों तीर्थ के जल में स्नान कर लेता है और सभी पापों से छुटकारा पा जाता है। पशुओं में बकरी, भेड़, ऊँटनी, भैंस इत्यादि का दूध भी काफी महत्व रखता है।
हालाँकि केवल दूध उत्पादन को बढ़ावा देने के कारण भैंस प्रजाति को प्रोत्साहन मिला है क्योकिं ये दूध अधिक देती है और इसमें वसा की मात्रा ज्यादा होती है, जिससे घी अधिक मात्रा में प्राप्त होता है। इसके उलट गाय का दूध गुणात्मक दृष्टि से अच्छा होने के बावजूद कम मात्रा में प्राप्त होता है। दूध अधिक मिले इसके लिए गाय और भैंस के दूध निकलने की प्रक्रिया कुछ लोग क्रूर और अमानवीय तरीके से निकालते है। गाय का दूध निकालने से पहले यदि बछड़ा/बछिया हो तो पहले उसे पिलाया जाना चाहिए पर वर्तमान में लोग बछड़े/बछिया का हक़ कम करते है। साथ ही इंजेक्शन देकर दूध बढ़ाने का प्रयत्न करते है जो कि उचित नहीं है।
प्राचीन ग्रंथों में सुरभि (इंद्र के पास), कामधेनु (समुद्र मंथन के १४ रत्नों में एक), नंदिनी, पद्मा, कपिला आदि गायों का महत्त्व बताया गया है। जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव ने असि, मसि एवं कृषि गौ वंश को साथ लेकर उनके महत्त्व मनुष्य को सिखाए। हमारा पूरा जीवन गाय पर आधारित है। शिव मंदिर में काली गाय के दर्शन मात्रा से काल सर्प योग निवारण हो जाता है। कहते है की गाय के पीछे के पैरों के खुरों के दर्शन करने मात्र से कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है।
गाय की प्रदक्षिणा करने से चारों धाम के दर्शन लाभ प्राप्त होता है क्योंकि गाय के चार पैर चार धाम माने गए है। जिस प्रकार पीपल का वृक्ष एवं तुलसी का पौधा आक्सीजन छोड़ते है उसी प्रकार यदि एक छोटा चम्मच देसी गाय का घी जलते हुए कंडे पर डाला जाए तो एक टन ऑक्सीजन बनती है। यही कारण है कि इसलिए हमारे यहाँ यज्ञ हवन अग्नि-होम में गाय का ही घी उपयोग में लिया जाता था। प्रदूषण को दूर करने का इससे अच्छा और कोई साधन नहीं है।
गौ के गोबर से स्थान का लीपने से स्थान पवित्र होता है। गौ-मूत्र का पावन ग्रंथों अथर्ववेद, चरकसहिंता, राजतिपटु, बाणभट्ट, अमृत सागर, भाव सागर, सश्रुतु संहिता इत्यादि में सुंदर वर्णन किया गया है। काली गाय का दूध त्रिदोष नाश के लिए सर्वोत्तम है। रुसी वैज्ञानिक शिरोविच ने कहा था कि गाय के दूध में रेडियों विकिरण से रक्षा करने की सर्वाधिक शक्ति होती है। गाय का दूध एक ऐसा भोजन है जिसमे प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेड, दुग्ध, शर्करा, खनिज-लवण, वसा आदि मनुष्य शरीर के पोषक तत्व भरपूर पाए जाते है। गाय का दूध उपयोगी रसायन का उत्पादन करता है, ऐसी जानकारियां वैज्ञानिकों शोध की एवं धार्मिक ग्रंथों में दर्शित है।
आज भी कई घरों में गाय की रोटी रखी जाती है और कई स्थानों पर संस्थाएं गौशाला बनाकर पुनीत कार्य कर रही है। साथ ही यांत्रिक क़त्लखानों को बंद करने का आंदोलन, मांस निर्यात नीति का पुरजोर विरोध एवं गौ रक्षा पालन संवर्धन हेतु सामाजिक धार्मिक संस्थाएं एवं सेवा भावी लोग लगातार संघर्षरत है।
यहाँ तक कि इस्लाम धर्म के गुरु मोहम्मद पैगंबर ने कहा था कि गाय का माँस हराम है क्यूंकि गाय केवल दूध देने के लिए है। दुःख की बात ये है कि उनकी ये सीख आज कोई मानने को तैयार नहीं है और गाय का भी राजनीतिकरण हो गया है। इसके अलावा कुछ लोग गाय को आवारा भटकने बाजारों में छोड़ देते है। उन्हें इनके भूख प्यास की कोई चिंता ही नहीं होती। लोगो को चाहिए की यदि गाय पालने का शौक है तो उनकी देखभाल भी आवश्यक है क्योकि गाय हमारी माता है एवं गौ रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।
ज्यो:शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान
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● Disclaimer :इस लेख में दी गई ज्योतिष जानकारियां और सूचनाएं लोक मान्यताओं पर आधारित हैं. इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं. इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं. पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें. पालीवाल वाणी इनकी पुष्टि नहीं करता है. इन पर अमल करने से पहले इससे संबंधित पंडित ज्योतिषी से संपर्क करें तथा चिकित्सा अथवा अन्य नीजि संबंधित जानकारी के लिए अपने नीजि डॉक्टरों से परार्मश जरूर लीजिए. पालीवाल वाणी तथा पालीवाल वाणी मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है.
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धन संबंधित उपायों की सम्पूर्ण व्याख्या
धन की समस्या समस्त जनसमाज में प्रतिदिन विकराल रूप लेती जा रही है। जैसे जैसे व्यक्ति की आवश्यकताए बढ़ी है उससे अधिक व्यर्थ के खर्च बढ़े है। इन सभी की पूर्ति करने के लिये धन की आवश्यकता से इनकार नही किया जा सकता व्यक्ति कभी भी आकस्मिक घटनाओं अथवा दुर्घटनाओं के लिये तैयार नही रहता इसलिये जब भी अनापेक्षित एवं अनायास किसी प्रकार की घटना अथवा दुर्घटना का सामना करना पड़ता है तो अनेक समस्याओं के साथ साथ धन संबंधित समस्या भी उभर कर सामने आती है। अपने उत्तरदायित्वों को पूरा करने में भी धन की आवश्यकता पड़ती है।
इसके अतिरिक्त एक अन्य स्थिति को भी देखना चाहिये जो धन संबंधित समस्या उत्पन्न करती है।ये समस्या अधिकांशतः व्यवसाय से संबंधित ही होती है। व्यवसाय में किसी भी प्रकार की समस्या उत्पन्न होने पर भी खर्च यथावत रहते है। इस स्थिति में धन की अधिक आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में यह विचार उत्पन्न होता है जिस धन की हमे आवश्यकता है उसे कैसे प्राप्त किया जाए प्रारंभ से ही हमारे विद्वान ऋषियों ने किसी भी समस्या से मुक्ति के अनेकों उपाय बताए है। धन संबंधित समस्याओं के लिये भी की ऐसे चमत्कारिक उपाय है जिनका प्रयोग कर धन प्राप्ति के मार्ग में आने वाली बाधाये समाप्त हो सकती है। आज से हम आपके साथ प्रतिदिन धन अथवा अन्य समस्याओं से छुटकारा दिलाने के स्वानुभूत प्रयोग सांझा करेंगे।
धन संबंधित उपाय कब करें?
हमारे द्वारा बताए गए धन संबंधित अधिकांश उपाय को लक्ष्मी जी की कृपा प्राप्ति के साथ जोड़कर दिखाया गया है इससे आप यह विचार ना करें कि लक्ष्मी के उपाय केवल दीपावली पर ही करें आप दीवावली के अतिरिक्त भी अन्य शुभ अवसरों पर ये उपाय कर सकते है। लेकिन जब भी कोई उपाय करें तो पूरी श्रद्धा के साथ करें तभी शीघ्र फल की प्राप्ति होती है। आडंबर से भरपूर और विशाल स्तर पर की गई आस्था एवं श्रद्धाहीन पूजा का फल कभी नही मिलता इसका विशेष ध्यान रखें। इसके अतिरिक्त कुछ नियम का पालन करना भी अतिआवश्यक है जो आपको नीचे बताये जा रहे है।
- आवेश की अवस्था मे उपाय नही करें : अधिकांश अवसरों पर व्यक्ति दुखो परेशानियों से क्षुब्ध होकर पूजा पाठ अथवा उपाय करने बैठता है तब भी आवेश से भरा रहता है। ऐसे स्थित में आपका ध्यान उपायों पर कम अपनी समस्याओं पर अधिक रहता है परिणाम स्वरूप जिस स्थित और समर्पित भाव से उपाय करना है उस स्थिति में आया ही नही जा सकता ऐसे में किये उपाय का लाभ नही मिल पाता।
असम्भव की प्राप्ती के लिये उपाय नही करें...
- किसी के अनिष्ट के लिये उपाय नही करे अन्यथा प्रकृति के नियम अनुसार आप जिसके साथ जैसा करेंगे वैसा ही फल आपको भी आगे भोगने को मिलेगा।
- संस्कृत ज्ञान ना होने पर हिंदी अनुवाद में पाठ अथवा स्त्रोत्र करें संस्कृत को जबरदस्ती पढ़ने का प्रयास हानि करा सकता है।
- उपाय करते समय अपने गुरु और इष्ट के प्रति समर्पित भाव होना चाहिये तभी सफलता निश्चित होती है।
- फल प्राप्ति में विलंब होने पर निराश ना हो पूर्वसंचित कर्म धीरे धीरे ही कटते है उसके बाद ही उपायों में सफलता मिकने लगती है एक या दो बार सफल ना होनेपर भी निष्ठा से उपाय करते रहे पत्थर पर भी रस्सी बार बार रगड़ते रहने पर निशान आ जाता है इससे भी कुछ प्रेरणा लें।
- जिस उपाय के प्रति अधिक आस्था हो विलंब होने पर भी उसे बदलें नही अन्यथा नया उपाय करने पर शक्तियों को संग्रहित होने में फिर से उतना ही समय लगेगा।
उपाय करने के साथ-साथ कर्म भी करते रहे कुछ व्यक्ति सोचते है कि जो उपाय कर रहे है उसका फल मिलते ही उनकी समस्त संमस्या समाप्त हो जाएगी इसलिये अब अधिक पुरुषार्थ करने की आवश्यता नही जबकि ऐसा नही होता जिसे कर्ज होने की स्थिति में केवल उपाय पर ही निर्भर नही रहा जा सकता साथ मे व्यवसाय अथवा अन्य रोजगार में अधिक परिश्रम करने पर ही कर्ज उतारने की स्थिति बनेगी परिश्रम के साथ परमार्थ भी करने पर शीघ्र ही भगवत कृपा प्राप्त होती है।
सामग्री को जल में प्रवाहित कैसे करें?
अनेक उपायों में यह उल्लेख आता है कि अमुक सामग्री को जल में प्रवाहित करें इसके पीछे छुपा कारण आपको बताते है कि इसके पीछे यह भावना होती है जिस प्रकार से प्रवाहित करने पर वस्तु हमसे दूर जा रही है उसी में हमारे कष्ट और समस्याए है जिन्हें तीव्र वेग वाले जल में बहाने पर उसी तीव्र वेग से हमारे दुख एवं कष्ट दूर चले जाएं।
अधिकांश पाठकों के समक्ष यह समस्या आती है कि हमारे आस-पास बहता जल नही है ऐसी स्थिति में आप किसी तालाब में भी यह उपाय कर सकते है जो सामग्री आपने प्रवाहित करनी है उसे जल में छोड़कर दोनो हाथों से ११ अथवा २१ बार जल को आगे की ओर धकेले ऐसा करने पर सामग्री आपसे दूर चली जायेगी इसके बाद बहती सामग्री को प्रणाम कर ईश्वर से प्रार्थना करे जिसप्रकार सामग्री डोर जा रही है उसी प्रकार मेरी समस्याओं को दूर करें।
- सामग्री : उपायों में प्रयोग करने वाली सामग्री हमेशा स्वच्छ ही ले अधिकांश वस्तु आपके आसपास ही मिल जाती है लेकिन कुछ वस्तु ऐसी भी होती है जिन्हें डोर शहर से मंगाना पड़ता है जैसे कि शंख, गौमती चक्र, कौड़िया, यंत्र, रुद्राक्ष, अथवा अन्य सामग्री जो कि आपके पास पहुचने से पहले कई हाथों से गुजरती है इसलिये इनका पुनः शुद्धिकरण होना आवश्यक हो जाता है। इसलिये इन्हें गंगाजल में धोकर प्रयोग करें गंगाजल उपलब्ध ना होने पर गौमूत्र का भी प्रयोग कर सकते है। इसके बाद आप जो भी उपाय करेंगे वह अवश्य ही सफल होगा।
आज आपको उपाय संबंधित नियम निर्देशो की जानकारी दी गई है कल से नियमित उपाय के बारे में विस्तृत रूप से जानकारी दी जाएगी आशा है आप सभी इनका प्रयोग कर लाभ के भागी बनेंगे।
ज्यो:शैलेन्द्र सिंगला पलवल हरियाणा
नारायण सेवा ज्योतिष संस्थान
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पीपल द्वारा नवग्रह दोष दूर करने के उपाय वैदिक दृष्टिकोण से
भारतीय संस्कृतिमें पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना
पुलकित और प्रफुल्लित होती है।स्कन्द पुराणमें वर्णित है कि अश्वत्थ (पीपल) के मूल
में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं
के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं।पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:
मूर्तिमान स्वरूप है। भगवानकृष्णकहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ।
स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त
किया है। शास्त्रों में वर्णित है कि पीपल की सविधि पूजा-अर्चना करने से सम्पूर्ण देवता
स्वयं ही पूजित हो जाते हैं।पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट
नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं।
अश्वत्थ सुमहाभागसुभग प्रियदर्शन।
इष्टकामांश्चमेदेहिशत्रुभ्यस्तुपराभवम्॥
प्रत्येक नक्षत्र वाले दिन भी इसका विशिष्ट गुण भिन्नता लिए हुए होता है।
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में कुल मिला कर 28 नक्षत्रों कि गणना है, तथा प्रचलित
केवल 27 नक्षत्र है उसी के आधार पर प्रत्येक मनुष्य के जन्म के समय नामकरण होता है।
अर्थात मनुष्य का नाम का प्रथम अक्षर किसी ना किसी नक्षत्र के अनुसार ही होता है।
तथा इन नक्षत्रों के स्वामी भी अलग अलग ग्रह होते है।विभिन्न नक्षत्र एवं उनके स्वामी
निम्नानुसार है यहां नक्षत्रों के स्वामियों के नाम कोष्ठक में है जिससे आपको जनलाभार्थ
ज्ञान वृद्धि हो-:-
(१)अश्विनी(केतु), (१०)मघा(केतु), (१९)मूल(केतु),
(२)भरणी(शुक्र), (११)पूर्व फाल्गुनी(शुक्र), (२०)पूर्वाषाढा(शुक्र),
(३)कृतिका(सूर्य), (१२)उत्तराफाल्गुनी(सूर्य), (२१)उत्तराषाढा(सूर्य),
(४)रोहिणी(चन्द्र), (१३)हस्त(चन्द्र), (२२)श्रवण(चन्द्र),
(५)मृगशिर(मंगल), (१४)चित्रा(मंगल), (२३)धनिष्ठा(मंगल),
(६)आर्द्रा(राहू), (१५)स्वाति(राहू), (२४)शतभिषा(राहू),
(७)पुनर्वसु(वृहस्पति), (१६)विशाखा(वृहस्पति), (२५)पूर्वाभाद्रपद(वृहस्पति),
(८)पुष्य(शनि), (१७)अनुराधा(शनि), (२६)उत्तराभाद्रपद(शनि)
(९)आश्लेषा(बुध), (१८)ज्येष्ठा(बुध), (२७)रेवती(बुध)
ज्योतिष शास्त्र अनुसार प्रत्येक ग्रह 3, 3 नक्षत्रों के स्वामी होते है।
कोई भी व्यक्ति जिस भी नक्षत्र में जन्मा हो वह उसके स्वामी ग्रह से सम्बंधित दिव्य
पीपल के प्रयोगों को करके लाभ प्राप्त कर सकता है।
अपने जन्म नक्षत्र के बारे में अपनी जन्मकुंडली को देखें या अपनी जन्मतिथि और
समय व् जन्म स्थान लिखकर भेजे,या अपने विद्वान ज्योतिषी से संपर्क कर जन्म का
नक्षत्र ज्ञात कर के यह सर्व सिद्ध प्रयोग करके लाभ उठा सकते है।
सूर्य
जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान सूर्य देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है।
(अ) रविवार के दिन प्रातःकाल पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा करें।
(आ) व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र में हुआ हो उस दिन (जो कि प्रत्येक माह में अवश्य
आता है) भी पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा अनिवार्य करें।
(इ) पानी में कच्चा दूध मिला कर पीपल पर अर्पण करें।
(ई) रविवार और अपने नक्षत्र वाले दिन 5 पुष्प अवश्य चढ़ाए। साथ ही अपनी कामना
की प्रार्थना भी अवश्य करे तो जीवन की समस्त बाधाए दूर होने लगेंगी।
चन्द्र
जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान चन्द्र देव है, उन व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है।
(अ) प्रति सोमवार तथा जिस दिन जन्म नक्षत्र हो उस दिन पीपल वृक्ष को सफेद
पुष्प अर्पण करें लेकिन पहले 4 परिक्रमा पीपल की अवश्य करें।
(आ) पीपल वृक्ष की कुछ सुखी टहनियों को स्नान के जल में कुछ समय तक रख
कर फिर उस जल से स्नान करना चाहिए।
(इ) पीपल का एक पत्ता सोमवार को और एक पत्ता जन्म नक्षत्र वाले दिन तोड़ कर
उसे अपने कार्य स्थल पर रखने से सफलता प्राप्त होती है और धन लाभ के मार्ग
प्रशस्त होने लगते है।
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे प्रति सोमवार कपूर मिलकर घी का दीपक लगाना चाहिए।
मंगल
जिन नक्षत्रो के स्वामी मंगल है. उन नक्षत्रों के व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है....
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और प्रति मंगलवार को एक ताम्बे के लोटे में जल लेकर
पीपल वृक्ष को अर्पित करें।
(आ) लाल रंग के पुष्प प्रति मंगलवार प्रातःकाल पीपल देव को अर्पण करें।
(इ) मंगलवार तथा जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 8 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।
(ई) पीपल की लाल कोपल को (नवीन लाल पत्ते को) जन्म नक्षत्र के दिन स्नान के
जल में डाल कर उस जल से स्नान करें।
(उ) जन्म नक्षत्र के दिन किसी मार्ग के किनारे १ अथवा 8 पीपल के वृक्ष रोपण करें।
(ऊ) पीपल के वृक्ष के नीचे मंगलवार प्रातः कुछ शक्कर डाले।
(ए) प्रति मंगलवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन अलसी के तेल का दीपक पीपल
के वृक्ष के नीचे लगाना चाहिए।
बुध
जिन नक्षत्रों के स्वामी बुध ग्रह है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग
करने चाहिए।
(अ) किसी खेत में जंहा पीपल का वृक्ष हो वहां नक्षत्र वाले दिन जा कर, पीपल के
नीचे स्नान करना चाहिए।
(आ) पीपल के तीन हरे पत्तों को जन्म नक्षत्र वाले दिन और बुधवार को स्नान के
जल में डाल कर उस जल से स्नान करना चाहिए।
(इ) पीपल वृक्ष की प्रति बुधवार और नक्षत्र वाले दिन 6 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए।
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे बुधवार और जन्म, नक्षत्र वाले दिन चमेली के तेल का दीपक
लगाना चाहिए।
(उ) बुधवार को चमेली का थोड़ा सा इत्र पीपल पर अवश्य लगाना चाहिए अत्यंत
लाभ होता है।
वृहस्पति
जिन नक्षत्रो के स्वामी वृहस्पति है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग
करने चाहियें।
(अ) पीपल वृक्ष को वृहस्पतिवार के दिन और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन पीले पुष्प
अर्पण करने चाहिए।
(आ) पिसी हल्दी जल में मिलाकर वृहस्पतिवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन
पीपल वृक्ष पर अर्पण करें।
(इ) पीपल के वृक्ष के नीचे इसी दिन थोड़ा सा मावा शक्कर मिलाकर डालना या
कोई भी मिठाई पीपल पर अर्पित करें।
(ई) पीपल के पत्ते को स्नान के जल में डालकर उस जल से स्नान करें।
(उ) पीपल के नीचे उपरोक्त दिनों में सरसों के तेल का दीपक जलाएं।
शुक्र
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जिन नक्षत्रो के स्वामी शुक्र है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग
करने चाहियें-:-
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष के नीचे बैठ कर स्नान करना।
(आ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और शुक्रवार को पीपल पर दूध चढाना।
(इ) प्रत्येक शुक्रवार प्रातः पीपल की 7 परिक्रमा करना।
(ई) पीपल के नीचे जन्म नक्षत्र वाले दिन थोड़ासा कपूर जलाना।
(उ) पीपल पर जन्म नक्षत्र वाले दिन 7 सफेद पुष्प अर्पित करना।
(ऊ) प्रति शुक्रवार पीपल के नीचे आटे की पंजीरी सालना।
शनि
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जिन नक्षत्रों के स्वामी शनि है. उस नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए..
(अ) शनिवार के दिन पीपल पर थोड़ा सा सरसों का तेल चडाना।
(आ) शनिवार के दिन पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना।
(इ) शनिवार के दिन और जन्म नक्षत्र के दिन पीपल को स्पर्श करते हुए उसकी
एक परिक्रमा करना।
(ई) जन्म नक्षत्र के दिन पीपल की एक कोपल चबाना।
(उ) पीपल वृक्ष के नीचे कोई भी पुष्प अर्पण करना।
(ऊ) पीपल के वृक्ष पर मोलि बंधन।
राहू
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जिन नक्षत्रों के स्वामी राहू है उन नक्षत्रों से सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए...
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 21 परिक्रमा क





