Wednesday, 28 January 2026

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भारतीय गणराज्य पर हिंदुत्व-कॉर्पोरेट गठजोड़ का हमला : डॉ. सिद्धार्थ रामू

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भारतीय गणराज्य पर हिंदुत्व-कॉर्पोरेट गठजोड़ का हमला : डॉ. सिद्धार्थ रामू
भारतीय गणराज्य पर हिंदुत्व-कॉर्पोरेट गठजोड़ का हमला : डॉ. सिद्धार्थ रामू

आलेख : डॉ. सिद्धार्थ रामू

26 जनवरी 1950 को भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया था और भारतीय संविधान को पूरी तरह लागू किया गया था। गणतांत्रिक लोकतंत्र में जन्म के आधार पर किसी को भी स्वाभाविक तौर पर बड़ा नहीं माना जाता है, न तो कोई विशेषाधिकार प्राप्त होता है और न ही किसी भी आधार पर राज्य का कोई पद किसी के लिए जन्म के आधार पर आरक्षित  होता है।

भारत में वर्ण-जाति व्यवस्था पूरी तरह से जन्म-आधारित विशेषाधिकार और अधिकार विहीनता पर टिकी हुई थी, जिसमें लिंग के आधार पर महिलाओं पर पुरूषों को भी विशेषाधिकार और वर्चस्व प्राप्त था। जन्म और लिंग-आधारित विशेषाधिकार ही ब्राह्मणवाद का मूलतत्व रहा है। इसको खारिज करते हुए डॉ. आंबेडकर ने संविधान के माध्यम से भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव डाली। उन्हें लोकतांत्रिक गणतंत्र कितना प्रिय था, इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में जिस पार्टी की नींव डाली, उस पार्टी का नाम उन्होंने ‘द रिपब्लिकन (गणतांत्रिक) पार्टी ऑफ इंडिया’ रखा। 

इस 26 जनवरी 2026 को भारतीय गणतंत्र के 76 वर्ष पूरे हो गए। डॉ. आंबेडकर ने यह उम्मीद की थी कि भारत में लोकतांत्रिक गणराज्य की नींव धीरे-धीरे मजबूत होती जाएगी और यह काफी हद तक हुई भी। जिसका परिणाम है कि वैचारिक तौर पर वर्ण-जाति की पक्षधर आरएसएस-भाजपा को भी अपनी जरूरतों एवं मजबूरियों के चलते ही सही, भारत राज्य के राष्ट्राध्यक्ष (राष्ट्रपति) के रूप में दलित समाज से आए एक व्यक्ति को स्वीकार करना पड़ा।

लेकिन इस प्रतीकात्मक उपलब्धि के बावजूद भी डॉ. आंबेडकर का भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य गंभीर खतरे में है और इस पर गहरे संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस पर सबसे बड़ा खतरा हिंदू राष्ट्र का खतरा है, जिसके संदर्भ में डॉ. आंबेडकर ने कहा था कि -- “अगर हिंदू राज हकीकत बनता है, तब वह इस मुल्क के लिए सबसे बड़ा अभिशाप होगा।

हिंदू कुछ भी कहें, हिंदू धर्म स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा है। इन पैमानों पर वह लोकतंत्र के साथ मेल नहीं खाता है। हिंदू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।” (पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इण्डिया, पृ.338). हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य के भारत के स्वप्न को धूल-धूसरित करता है, क्योंकि हिंदू राष्ट्र की पूरी परिकल्पना जन्मगत श्रेष्ठता एवं निम्नता और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व पर आधारित है, जिसे किसी भी रूप में डॉ. आंबेडकर अपने लोकतांत्रिक गणराज्य में जगह देने के लिए तैयार नहीं थे। 

पुरुषों के वर्चस्व से महिलाओं की स्वतंत्रता और स्त्री-पुरुष के बीच समता के लिए उन्होंने हिंदू कोड बिल प्रस्तुत किया और मूलत: यही प्रश्न उनके लिए नेहरू के मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देने का मूल कारण बना। इसके साथ ही , हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों पर हिंदूओं के वर्चस्व एवं विशेषाधिकार का दावा करती है। धार्मिक वर्चस्व एवं विशेषाधिकार के लिए भी डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य में कोई जगह नहीं थी।

उन्होंने लिखा है कि -- ‘‘हिंदू धर्म एक ऐसी राजनैतिक विचारधारा है, जो पूर्णतः लोकतंत्र-विरोधी है और जिसका चरित्र फासीवाद और/या नाजी विचारधारा जैसा ही है। अगर हिंदू धर्म को खुली छूट मिल जाए -- और हिंदुओं के बहुसंख्यक होने का यही अर्थ है -- तो वह उन लोगों को आगे बढ़ने ही नहीं देगा, जो हिंदू नहीं हैं या हिंदू धर्म के विरोधी हैं। यह केवल मुसलमानों का दृष्टिकोण नहीं है। यह दमित वर्गों और गैर-ब्राह्मणों का दृष्टिकोण भी है" (सोर्स मटियरल आन डॉ. आंबेडकर, खण्ड 1, पृष्ठ 241, महाराष्ट्र शासन प्रकाशन)।

उपरोक्त उद्धरण में डॉ. आंबेडकर साफ शब्दों में हिंदू राष्ट्र को पूर्णत: लोकतंत्र विरोधी और मुसलमानों तथा अन्य सभी दमित वर्गों के लिए खतरा मान रहे हैं। डॉ. आंबेडकर के लोकतांत्रिक गणराज्य की परिकल्पना और हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना दो बिलकुल विपरीत ध्रुव हैं, दोनों के बीच कोई जोड़ने वाला सेतु नहीं है।

यदि हिंदू राष्ट्र फलता-फूलता है, तो डॉ. आंबेडकर द्वारा स्थापित भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य खतरे में है। फिलहाल भारतीय लोकतांत्रिक गणराज्य के सम्मुख हिंदू राष्ट्र का गंभीर खतरा आ उपस्थित हुआ है, इस खतरे से भारतीय गणतंत्र को बचाने की जिम्मेदारी हर उस व्यक्ति की है, जो लोकतांत्रिक गणतंत्र की डॉ. आंबेडकर और संविधान सभा के अन्य सदस्यों की परिकल्पना के साथ खड़ा है।

डॉ. आंबेडकर लोकतांत्रिक गणराज्य को एक राजनीतिक व्यवस्था के साथ सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के रूप में भी देखते थे। सामाजिक व्यवस्था का उनका मूल आधार समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर टिका हुआ था। उन्होंने अपनी किताब ‘जाति के विनाश’ में साफ शब्दों में कहा है कि मेरा आदर्श समाज समता, स्वतंत्रता और बंधुता पर आधारित है। समाज के सभी सदस्यों के बीच बंधुता कायम करना उनका लक्ष्य रहा है।

बंधुता की इस अवधारणा को उन्होंने गौतम बुद्ध से ग्रहण किया था। आधुनिक युग में फ्रांसीसी क्रांति का भी नारा स्वतंत्रता, समता और भाईचारा ही था। डॉ. आंबेडकर का मानना था कि बंधुता के बिना लोकतांत्रिक गणराज्य सफल नहीं हो सकता है और न ही बंधुता-आधारित राष्ट्र या देश का निर्माण हो सकता है। 

भारत में बंधुता के मार्ग में दो बड़ी बाधाएं उन्हें दिखी -- सामाजिक और आर्थिक। सामाजिक असमानता के भारत में दो आधार स्तंभ रहे हैं और हैं -- वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं पर पुरुषों का वर्चस्व। उनका मानना था कि वर्ण-जाति व्यवस्था और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के बिना सामाजिक समता और स्वतंत्रता हासिल नहीं की जा सकती है और बिना समता और स्वतंत्रता के बंधुता कायम नहीं हो सकती है। उन्होंने बार-बार रेखांकित किया है कि बंधुता सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों के बीच कायम हो सकती है, जो समान और स्वतंत्र हों।

यानी बंधुता की अनिवार्य शर्त समता और स्वतंत्रता है। डॉ. आंबेडकर की किताब ‘जाति का विनाश’ बंधुता के लिए सामाजिक समता और स्वतंत्रता की अनिवार्यता को स्थापित करती है और उन सभी चीजों के विनाश का आह्वान करती है, जो सामाजिक असमानता की जनक वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करती हो, जिसमें हिंदू धर्म और वे सभी हिंदू धर्मग्रंथ दोनों शामिल हैं, जो वर्ण-जाति व्यवस्था का समर्थन करते हैं।

यूरोप-अमेरिका के पूंजीवादी समाज के अपने निजी अनुभव और अध्ययन के आधार पर डॉ. आंबेडकर इस निष्कर्ष पर पहुंचे थे कि आर्थिक असमानता के रहते हुए बंधुता कायम नहीं हो सकती है। भारत में वर्तमान समय में आर्थिक असमानता की खाई चौड़ी से चौड़़ी होती जा रही है। आंकड़े इसका साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं।

देश के 1 प्रतिशत लोगों के हाथ में देश की कुल संपदा का 40 प्रतिशत और 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में  कुल संपदा का 65 प्रतिशत केंद्रित हो गया है। साफ है कि देश के 90 लोगों के पास सिर्फ देश की कुल संपदा का सिर्फ 35 प्रतिशत है। इसी प्रकार, देश में ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों की जेब में देश की कुल आय का 58 प्रतिशत जा रहा है, जबकि नीचे के 50 प्रतिशत लोगों को देश की कुल आय के सिर्फ 15 प्रतिशत पर जिंदगी जीनी पड़ रही है। (स्रोत : वर्ल्ड इन-इक्वैलिटी लैब, द इंडियन एक्सप्रेस, 11 दिसंबर, दिल्ली संस्करण)

इसी रिपोर्ट के अनुसार, भरतीयों के बीच में संपदा और आय की असमानता की यह खाई साल-दर-साल चौड़ी होती जा रही है। 2022 में भारत के 10 प्रतिशत (14 करोड़) ऊपरी लोगों के हाथ में देश की कुल संपदा का 57 प्रतिशत था, जो पिछले तीन सालों में बढ़कर कुल संपदा का 65 प्रतिशत हो गया है। मतलब 7 प्रतिशत देश की और संपदा उनके हाथ में चली गई। दूसरी तरफ देश के 1 अरब 26 करोड़ लोगों के पास कुल मिला कर देश की कुल संपदा का सिर्फ 35 प्रतिशत जीने-मरने के लिए है। 

सवाल यह है कि आखिर ये 14 करोड़ लोग किस सामाजिक समूह और वर्गीय समूह के हैं? इन लोगों में कितने प्रतिशत आदिवासी हैं? 2011 की जनगणना के अनुसार देश की कुल आबादी में 10.50 करोड़ आदिवासी (एसटी) थे। वर्तमान में कम से कम इनकी आबादी 12 करोड़ है। ऊपर के सबसे धनी 14 करोड़ लोगों में शायद ही कोई आदिवासी हो। 

तब क्या इन 14 करोड़ लोगों में कोई दलित है? 2011 की जनगणना के अनुसार, देश में दलितों (एससी) की कुल आबादी देश की कुल आबादी का 16.6 प्रतिशत थी, यानि 20.13 करोड़। इस समय करीब 24 करोड़ होगी। ऊपर के सबसे धनी 10 प्रतिशत में मुश्किल से कुछ अंगुलियों पर गिनने लायक दलित होंगे, शायद न भी हों। 

फिर इन 14 करोड़ लोगों में कितने अति पिछड़े हैं? ये देश की कुल आबादी का करीब 30 से 35 प्रतिशत है -- आज की तारीख में 40 करोड़ से अधिक। इनमें से  मुश्किल से ही कोई अति पिछड़ा मिले। 

इन 14 करोड़ लोगों में कितने अन्य पिछड़े वर्ग हैं? इनकी आबादी देश की कुल आबादी का आधे से अधिक हैं -- मतलब आज की तारीख में 70 करोड़ के आसपास। इनमें से कुछ लोग ही या ज्यादा से ज्यादा 1 या 2 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग के लोग ही इन 14 करोड़ लोगों में शामिल होंगे।

साफ है कि इस संपदा के मालिकों में बहुलांश इस देश में द्विज-सवर्ण जातियों (अपरकॉस्ट) या पिछड़े की अगड़ी जातियों के लोग हैं। उसमें भी इन जातियों का एक बड़ा हिस्सा इससे बाहर होगा। 

इन 14 करोड़ लोगों में कितने मजदूर हैं? भारत सरकार के 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार, कुल कार्यरत लोग 64.33 करोड़ लोग थे। इन सभी कार्यरत कर्मचारियों-मजदूरों में से 31.2 करोड़ असंगठित क्षेत्र में हैं। यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि इसमें से एक भी व्यक्ति इन 14 करोड़ लोगों में शामिल नहीं होगा।

इन 14 करोड़ लोगों में कितने किसान हैं? एक रिपोर्ट के अनुसार,15.9 करोड़ लोग कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं और 6.84 करोड़ परिवार पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं। एक परिवार का औसत आकार 4.9 मानने पर इनकी कुल संख्या 33.5 करोड़ हैं। इनमें से किसी के ऊपर के इन 14 करोड़ लोगों में शामिल होने की कोई दूर-दूर तक संभावना नहीं है। 

इसी रिपोर्ट के अनुसार, भारत के 1 प्रतिशत लोगों (1.40 करोड़) के हाथ में देश की कुल संपदा का 40 प्रतिशत केंद्रित हो गया है। इनमें कोई आदिवासी होगा, दलित होगा, अति पिछड़ा होगा या अन्य पिछड़ा होगा, यह करीब-करीब नामुमकिन-सा है। पिछड़ी जातियों की अगड़ी ऐतिहासिक तौर पर शासक जातियों (महाराष्ट्र के मराठा या गुजरात के पटेल और जाट आदि) में से हो सकता है कि कुछ लोग हों। ये 1 करोड़ 40 लाख लोग पूरी संभावना है कि द्विज-सवर्ण जातियों ( अपरकॉस्ट) के लोग हैं। यह कहने की कोई जरूरत नहीं है कि इसमें मेहनतकश किसानों-मजदूरों में से किसी के होने की कोई संभावना नहीं है। 

यह सामाजिक-वर्गीय असमानता सिर्फ संपदा के मालिकाने तक सीमित नहीं है। आय के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। यह सामाजिक-वर्गीय असमानता सार-दर-साल चौड़ी होती जा रही है। साफ है कि यह दो तरह से हो रहा है -- पहला देश में जो संपदा साल-दर-साल सृजित हो रही है, उसका बड़ा हिस्सा ऊपर के 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में जा रहा है। दूसरा नीचे के लोगों की संपदा का भी ऊपर के लोगों के हाथों हस्तानान्तरण हो रहा है। 

लेकिन क्या यह सिर्फ गरीबी-अमीरी या संपदा-आय के अंतर का मामला है? इसमें कोई दो राय नहीं है कि यह गरीबी-अमीरी और उससे जुड़े सुख-दुख और शोषण-उत्पीड़न का मामला तो है, लेकिन इससे कम बड़ा मामला यह नहीं है कि जब देश की करीब दो-तिहाई संपदा और आय 10 प्रतिशत लोगों के हाथ में केंद्रित हो जाएगी, तो वह इस देश की आर्थिक नीतियों, प्राथमिकताओं और भविष्य की योजनाओं को निर्णायक तरीके से प्रभावित करेंगे।

इन सब चीजों को अपने हितों-लाभों के अनुसार चलाएंगे। चुनाव में अपनी इस अकूत संपदा और आय का इस्तेमाल ऐसी पार्टी या पार्टियों के लिए करेंगे, जो उनकी इस संपदा और आय को बढ़ाने में मदद करें या बनाए रखने में मदद करें। वे मीडिया का मालिक बनकर और विज्ञापनदाता बनकर तय करेंगे कि कौन-सी सूचना और सामग्री लोगों के पास जाए और कौन-सी न जाए। किस चीज को मुद्दा बनाया जाए और किस चीज को नहीं। कौन सा मुद्दा उछाला जाए और किसे कब्र में दफ्न कर दिया जाए।

वे सोशल मीडिया को भी निर्णायक तरीके से प्रभावित करने की स्थिति में हैं, क्योंकि सोशल मीडिया के मालिकों और उससे आय प्राप्त करने वालों का सारा कारोबार इसी धन से जुड़ा हुआ है। वे नेताओं और नौकरशाहों को अपने अनुकूल और अपने फायदे के लिए काम करने के लिए, नीति बनाने के लिए और नीतियों को लागू करने के लिए निर्णायक तरीके से प्रभावित और संचालित करने की स्थिति में होंगे। 

वे अपने इस अकूत संपदा और आय से देश के लोकतंत्र को हाईजैक करने की स्थिति में पहुंच गए हैं। ये सारे काम वे कानूनी और गैर-कानूनी सभी तरीकों का इस्तेमाल करके करते हैं और करेंगे। इसको भाजपा को मिलने वाले चंदे से समझा जा सकता है। 2023-24 में भाजपा को 2,243 करोड़ चंदा मिला, जबकि इसके पहले के वर्ष में सिर्फ 719 करोड़ चंदा मिला था।

एक साल में भाजपा को मिलने वाले चंदे में 211 प्रतिशत की वृद्धि। देश में सभी पार्टियों को मिले कुल चंदे का 88 प्रतिशत चंदा अकेले भाजपा को मिला। जब भाजपा को 2022-23 में 2,243 करोड़ चंदा मिला, तो उसी वर्ष कांग्रेस को सिर्फ 281 करोड़ का सिर्फ चंदा मिला। कहां 2,243 करोड़ और कहां सिर्फ 281 करोड़!

जैसे-जैसे देश के धनिकों की संपदा और आय में वृद्धि हो रही है, उसी दर से भाजपा के चंदे में भी तेजी से वृद्धि हो रही है। 2004 में भाजपा को सिर्फ 88 करोड़ चंदा मिला था। 2014 में यह 295 करोड़ हो गया। 2019 में यह छलांग लगाकर 3,562 करोड़ रूपया हो गया और 2024 में और तेजी से छलांग लगाकर 10,107 करोड़ हो गया। देश के मुट्ठी भर धनिकों की तेजी से बढ़ती आय और संपदा और भाजपा की तेजी से बढ़ती आय (कानून सम्मत चंदा) के बीच का आनुपातिक रिश्ता क्या अकारण है? क्या यह सहज-स्वाभाविक परिघटना है?

अकारण ही नहीं, संविधान सभा में संविधान का अंतिम प्रारूप प्रस्तुत करते हुए डॉ. आंबेडकर ने यह चेतावनी दी थी कि हम संविधान के माध्यम से जिस राजनीतिक लोकतंत्र को स्थापित कर रहे हैं, उसे सामाजिक और आर्थिक असमानता निगल जाएगी, यदि हम इसे खत्म करने में सफल नहीं हुए। सामाजिक असमानता खत्म तो नहीं हुई, लेकिन आर्थिक असमानता बढ़ती गई और अब तो छलांग लगाकर बढ़ रही है। यह आर्थिक असमानता वहां पहुंच गई है, जहां से वह देश, समाज और लोकतंत्र के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुकी है।

सामाजिक समता के साथ आर्थिक समता भी बंधुता की अनिवार्य शर्त है। आर्थिक समता के लिए उन्होंने ‘राजकीय समाजवाद’ की स्थापना का प्रस्ताव अपनी किताब ‘राज्य और अल्पसंख्यक’ में रखा। उन्होंने कृषि भूमि के निजी मालिकाने को पूरी तरह खत्म करने और उसका पूरी तरह राष्ट्रीयकरण करने का प्रस्ताव इस किताब में किया है। इसके साथ उन्होंने सभी बड़े और बुनियादी उद्योग-धंधों को भी राज्य के मालिकाने में रखने का प्रस्ताव किया है।

कृषि भूमि के पूर्ण राष्ट्रीयकरण और बुनियादी एवं बड़े उद्योग धंधों का पूरी तरह राष्ट्रीयकरण के माध्यम से ही आर्थिक समता हासिल की जा सकती है, यह डॉ. आंबेडकर के चिंतन का एक बुनियादी तत्व है। सामाजिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा ब्राह्मणवाद है और आर्थिक समता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा पूंजीवाद है। इन्हीं दोनों तथ्यों को ध्यान में रखते हुए डॉ. आंबेडकर ने ब्राह्मणवाद एवं पूंजीवाद को कामगारों के सबसे बड़े दो दुश्मन घोषित किया था।

आज भारत का लोकतांत्रिक गणराज्य गंभीर खतरे में है। एक तरफ हिंदू राष्ट्र की परियोजना के नाम पर नए सिरे से नए रूप में वर्ण-जाति व्यवस्था स्थापित करने की कोशिश चल रही है। दूसरी तरफ सार्वजनिक संपदा और सार्वजनिक संपत्ति को विभिन्न रूपों में कार्पोरेट घरानों को सौंपा जा रहा है और इस तरह से डॉ. आंबेडकर के सामाजिक समता और राजकीय समाजवाद के स्वप्न का खात्मा किया जा रहा है।

डॉ. आंबेडकर की बंधुता की जड़ें बुद्ध धम्म में थीं।  उन्होंने साफ शब्दों में लिखा है कि “सकारात्मक तरीके से मेरे सामाजिक दर्शन को तीन शब्दों में समेटा जा सकता है -- मुक्ति, समानता और भाईचारा। मगर, कोई यह न कहे कि मैंने अपना दर्शन फ्रांसीसी क्रांति से लिया है। बिलकुल नहीं। मेरे दर्शन की जड़ें राजनीतिशास्त्र में नहीं, बल्कि धम्म में हैं। मैंने उन्हें... बुद्ध के उपदेशों से लिया है...। (क्रिस्तोफ़ जाफ्रलो, पृ. 159) वे बंधुता-आधारित लोकतांत्रिक गणराज्य के लिए बुद्धमय भारत की कल्पना करते थे।

बुद्धमय भारत उनके लिए वर्ण-जाति व्यवस्था पर आधारित वैदिक, सनातन, ब्राह्मणवादी और हिंदू भारत का विकल्प था। बुद्धमय भारत उनके समता, स्वतंत्रता और बंधुता आधारित भारत के स्वप्न का एक अन्य आधार स्तंभ था। डॉ. आंबेडकर के प्रयासों के चलते भारतीय गणराज्य के बहुत सारे प्रतीकों में बौद्ध प्रतीकों को शामिल किया गया। जैसे -- राष्ट्रीय ध्वज में धर्मचक्र, प्राचीन भारत के बौद्ध सम्राट अशोक के सिंहों को राष्ट्रीय चिन्ह के रूप में मान्यता देना और राष्ट्रपति भवन की त्रिकोणिका पर एक बौद्ध सूक्ति को उत्कीर्ण करना।

संविधान में भी उन्होंने बौद्ध धम्म के कुछ बुनियादी तत्वों को समाहित किया। इस संदर्भ में उन्होंने स्वयं लिखा है -- “मैं भी हिंदुस्तान में सर्वांगीण पूर्ण तैयारी होने पर बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाला हूं। संविधान बनाते समय  उस दृष्टि से अनुकूल होने वाले कुछ अनुच्छेदों को मैंने उसमें अंतर्भूत किया है।” (धनंजय कीर, पृ.457) उन्होंने बौद्ध धम्म को वैज्ञानिक चेतना, लोकतांत्रिक मूल्यों और स्वतंत्रता, समता और बंधुता की भावना पर खरा पाया, जिसमें ईश्वर और किसी पारलौकिक दुनिया के लिए कोई जगह नहीं थी। न तो उसमें किसी अंतिम सत्य का दावा किया गया था और न ही कोई ऐसी किताब थी, जो ईश्वरीय वाणी होने का दावा करती हो।

गणतंत्रात्मक भारत, बंधुता-आधारित भारत और बुद्धमय भारत -- डॉ. आंबेडकर के सपनों के भारत के तीन बुनियादी तत्व थे, लेकिन इन तीनों तत्वों को तभी हासिल किया जा सकता है, जब भारतीय जन प्रबुद्ध बनें। प्रबुद्ध भारत की इस परिकल्पना को साकार करने के लिए उन्होंने 4 फरवरी 1956 को 'प्रबुद्ध भारत' नामक पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। प्रबुद्ध व्यक्ति एवं समाज वही हो सकता है, जो वैज्ञानिक चेतना से लैस हो और हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसता हो तथा आलोचनात्मक दृष्टि से देखता हो।

डॉ. आंबेडकर स्वयं बीसवीं शताब्दी के सबसे प्रबुद्ध व्यक्तित्वों में से एक हैं। वे हर चीज को एक समाज वैज्ञानिक की दृष्टि से आलोचनात्मक नजरिए से देखते थे और तर्क की कसौटी पर कसते थे। जो कुछ भी उनकी तर्क की कसौटी पर खरा नहीं उतरता था, उसे वे खारिज कर कर देते थे। उन्होंने बौद्ध धम्म को भी तर्क की कसौटी पर कसा और आलोचनात्मक नजरिए से देखा और उसे नया नाम 'नवयान' दिया।

आरएसएस और कार्पोरेट (ब्राह्मणवाद, पूंजीवाद और ब्राह्मणवादी हिंदू फासीवाद) के गठजोड़ से बन रहा वर्तमान भारत डॉ. आंबेडकर के गणतंत्रात्मक, बंधुता-आधारित, बुद्धमय और प्रबुद्ध भारत की परिकल्पना से पूरी तरह उलट है। हमें डॉ. आंबेडकर की संकल्पना के भारत के निर्माण के लिए इस गठजोड़ का पुरजोर विरोध करना चाहिए और स्वतंत्रता, समता और बंधुता आधारित गणतंत्रात्मक भारत के स्वप्न को साकार करने के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य के साथ लग जाना चाहिए।

  • डॉ. सिद्धार्थ रामू वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और अनुवादक हैं, जो दलित और बहुजन विमर्श तथा आंबेडकर वैचारिकी पर लिखते हैं।
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