इंदौर

विजय जेंटलमैन "मित्र” की... हार कर भी जीत "संजय"की : वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष पाटीदार

वरिष्ठ पत्रकार डॉ.संतोष पाटीदार
विजय जेंटलमैन
विजय जेंटलमैन "मित्र” की... हार कर भी जीत "संजय"की : वरिष्ठ पत्रकार डॉ. संतोष पाटीदार

वरिष्ठ पत्रकार डॉ.संतोष पाटीदार की रिपोर्ट...✍️

इंदौर : कल तक जो राजनीतिक व मीडिया के पण्डे - पण्डित इंदौर के नगर निगम परिषद के महापौर चुनाव को भाजपा के लिए अनुकूल पर बेहद कठिन बता रहे थे आज वे ही अवसरवादी पलटी मारकर बीजेपी की लाखों से जीत पर तालियां पीटने लगे है। हवाई आंकलन वाले कुछ भी कहते करते रहे हो , मतदान के ठीक बाद संघ का कहना था   परिणाम बीजेपी के पक्ष में ही रहेंगे। पूर्व के चुनावों की तरह रिकार्ड विजय जैसी स्थिति रहने वाली है।संघ के   वरिष्ठ कार्यकर्ता विकास दवे ने बहुत पहले स्पष्ट कर दिया था कि बीजेपी के पार्षदों की संख्या व महापौर की जीत पिछले चुनावों जैसी भारी भरकम ही रहेगी। आखिर हुआ वैसा ही। उल्लेखनीय हैं कि संघ व बीजेपी के समन्वय में रहते हुए श्री दवे की भूमिका महापौर प्रत्याशी चयन से लेकर चुनावी रणनीति तक महत्वपूर्ण रही थी। 

दूसरी ओर  प्रत्याशी चयन के दिनों और अब जीत से  पार्टी के बड़े बरगद भी हिल गए है। पार्टी के भीतर  सत्त्ता में  येन - केन - प्रकारेण  अपना अस्तित्व बनाए रखने के लिए  महापौर पद के दावेदारों की लाईन में लगे रहे व अन्य संवेधानिक दायित्वों वाले नेताओं के भी होश पख्ता है। यह जीत जिन हालातों में हुई वह पुष्यमित्र की सीधी सच्ची  लोकप्रियता व संघ के युवा नेतृत्व तैयार करने के राजनैतिक नवाचार  पर भी मुहर लगाती है। क्योंकि चुनाव में संगठन की उदासीनता की खबरें खूब प्रचारित हुई। इस लिहाज से जीत में एक हद तक संघ का नेटवर्क व पुष्यमित्र का जेंटलमैन वाला मिस्टर भरोसेमंद का  व्यक्तित्व व उज्ज्वल छवि, भी काफी हद तक  निर्णायक रही है। तो फिर क्यो संगठन स्तर पर तूफ़ान खड़ा किया गया? इसका जवाब भी सीधा सा था।

अगले विधानसभा फिर आगे के चुनावों में भी  असंतुष्ट हुए नेताओ को अपनी व अपनी परिवारवादी राजनीति चौपट होती नजर आ रही है। इस कारण उम्मीदो पर तुषारापात होने से अपने ही उम्मीदवार की खबरे चली। घेराबंदी पर सवाल खड़े हुए। सवालों का जवाब सीधा - सा रहा है। इस चुनावी दौर की बीजेपी की प्रत्याशी चयन से लेकर घोषणा तथा उसके बाद मैदान में होते हुए भी नही होने के साथ मतदान  तक के अनेकानेक घटनाक्रमों की क्रोनोलॉजी/सिलसिला देख ले। हालात खुद बता रहे है कि अर्जुन को अकेले रण में छोड़कर वजीर से लेकर प्यादे तक रणछोड हो गए ऐसा प्रतीत होता रहा।  हालात बता रहे थे , जैसे नाराज वर्ग  अपनी मातृ संस्था  संघ व संगठन से हिसाब चुकता करने से कम पर नही मानेंगे। वजह , बरसों बरस से असीमित सत्ता सुख भोग रहे बीजेपी के कई नेता महापौर बनना चाहते थे। वे नही बन पाए। संघ ने तमाम बड़बोले नेताओं को एक झटके में जमीन दिखाते हुए नए - नवेले युवा तुर्क पुष्यमित्र भार्गव को प्रत्याशी घोषित कर दिया।अंदरूनी तौर पर  बीजेपी के लिए यह नागवार था। उसके नेताओं ने अपरोक्ष रूप से भांति - भाँति के रंग दिखाए। संघ ने भी  प्रत्याशी चयन में नवाचार करने के बाद चुनावी भूमिका से दूरी बनाकर चुनाव बीजेपी के  सुपुर्द कर दिया। इसे नया प्रयोग बताया गया।

चुनाव में शुरूआत के कुछ दिनों तक संगठन निश्चेत-सा था। कहा जा रहा था पुष्यमित्र का मनोबल कमजोर करने के प्रयास भी हुए। हुआ उलटा । पुष्यमित्र ज्यादा आत्मनिर्भर व मजबूत हुए। जनता में कभी भी उनको लेकर आजबतक  कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नही आई।यह उनकी जनसमर्थन की बढ़ती हुई कमाई थी।इचर बीजेपी नेताओं का रूख भाँप कर संघ ने अंदरूनी तौर पर अघोषित   बैठके करने के साथ पुष्यमित्र के साथ आनुषंगिक संगठनों की बैठकें करवाई। कोई भी दायित्व वान स्वयंसेवक सामने नहीं आए पर पुष्यमित्र के लिए अपना काम करते रहे। संगठन को भी ईशारे ईशारे में समझाईश डजे दी। इस तरह बीजेपी हौले हौले हरकत में आई। तब तक हालातों का फायदा उठाकर कांग्रेस प्रत्याशी सजंय शुक्ला व उनके मैदानी  साथियों ने मनोवैज्ञानिक युध्द छेड़कर चुनाव में हावी होने की कोशिशें की व सफल भी रहे ।

बस , यहाँ से उपकृत हुए प्रचार तन्त्रो ने कांग्रेस को शेर बताने का खेल खेला जब कि पुष्यमित्र सवा शेर थे यह कभी नही कहा। इस हल्ले से शुरु में थोड़े विचलित हुए पुष्यमित्र बेहद सुलझे , सरल , सहज व संगठन के प्रति पूरी तरह समर्पित होकर  परिपक्व राजनीतिक की तरह आगे बढते रहे। पार्टी में असंतुष्ट वर्ग ने आखरी दांव खेलते हुए  मतदान को निशाने पर लिया। पर जनमानस तो बीजेपी व पुष्यमित्र के लिए पहले ही बना हुआ था।  इस तरह पुष्यमित्र पराक्रमी राजनीतिज्ञ साबित हुए। उनके साथ अदृश्य ताकतवर संघ का व जनता का समर्थन था। यह जिन्हें नही दिखाई दिया उनके लिए पुष्यमित्र कमजोर प्रत्याशी थे। संगठन में भी एक तबका यही समझ रहा था। मीडिया में भी बढ चढ़कर प्रचारित हुआ कि बीजेपी के लिए जीत हार बहुत कम वोटों पर जाकर टिकेगी। लेकिन पुष्यमित्र की सहजता ,सरलता , सबको अपील करती उनकी आम आदमी की छवि व ज़मीनी बाते प्रभावी रही। उन्होंने बढचढकर कोई दावे नही किये। कभी भी अहंकार का भाव नही आया।  और सबसे बढ़कर भ्र्ष्ट ,सड़ गल रही राजनीति में नव- रक्तसंचार के रूप में पुष्यमित्र की उम्मीदवारी ने लोगो खासकर युवाओं में नई उम्मीदें जगाई। महिलाओं का रूझान भी था ही।बाकी बीजेपी व केंद्र सरकार के प्रमुख मोदी इम्पेक्ट का असर है ही। 

मतदान के पूर्व व मतदान के दौरान सक्रिय रहे संघ के एक  वरिष्ठ पदाधिकारी ने तमाम खबरों व चर्चाओं को मजाक बताते हुए आपसी बातचीत में  कहा था इंदौर व मालवा का जनमानस में संघ व बीजेपी के प्रभाव की जड़े गहरे तक है। अभी ऐसी प्रतिकूलता नही है कि लोगों में संघ के प्रति विरक्ति का भाव आये। बीजेपी सरकार से नाराज़गी अपनी जगह हो सकती है। इसका कुछ असर हो सकता है। पार्षद चयन का नुकसान भी हो सकता है। बीजेपी की संघ से नाराजगी पर आप कहते है संगठन में इतना साहस नही । सारी अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने मतदान के आखिरी में  कहा था परिणाम पूरी तरह सामान्य रहेगे। पार्षदों की संख्या व पुष्यमित्र की जीत सब कुछ करीब करीब पुर्ववत चुनाव की तरह  ही रहेंगे। संघ व बीजेपी का प्रभाव है कि वार्ड 78 में पिछली बार बेहद निष्क्रिय रही बीजेपी की पार्षद सुनीता आर्य  के बाद इस बार उनके पति बुजुर्ग व पिछली निष्क्रियता के बावजूद  भी जीत गए जब कि इनका अंदरूनी गुटीय विरोध भी था भीतरघात भी हुआ।  ऐसे  कुछ ओर  भी उदाहरण है। 

इसलिये "लड़ाका" साबित हुए कांग्रेस प्रत्याशी

सजंय शुक्ला ने बिना संगठन चुनाव में कई ताकतवर मोर्चों के खिलाफ संघर्ष किया। कांग्रेस की परंपरागत रीती नीति रही कि टिकट देकर अकेले चुनावी मैदान में छोड़ दिया जाता है। इस लिहाज से सजंय अकेले संघ के गहरे मजबूत नेटवर्क, बीजेपी की ताकत, बीजेपी की सरकार व सरकारी मशीनरी इस सबसे से अकेले लड़ते रहे. सजंय ने आखिर दम तक निजी संसाधनों के बूते किला लड़ाया । इस चुनाव के माध्यम से उन्होंने अगले विधानसभा चुनाव की ट्रॉयल भी कर ली है। इस चुनाव से सजंय ने कांग्रेस के प्रदेश स्तर पर संगठन में अपनी महत्ता साबित कर दी है। अब बूढ़े नेतृत्व के  संगठन में  सजंय जैसे नेताओं को महत्वपूर्ण दायित्व सौपने चाहिए.

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