Saturday, 04 April 2026

आपकी कलम

हम हैं कि मुर्ख बने जा रहे हैं...!

paliwalwani
हम हैं कि मुर्ख बने जा रहे हैं...!
हम हैं कि मुर्ख बने जा रहे हैं...!

अन्ना दुराई

सड़क से गुजरते वक्त मामूली सा टल्ला लग जाए तो दो पक्ष गुत्थम गुत्था हो जाते हैं। घंटो आपस में लड़ लेते हैं। यहाँ तक की हाथापाई भी हो जाती है। हम आपस में एक दूसरे को कितनी ही गालियाँ दे लें लेकिन उस व्यवस्था को कभी दोष नहीं देते दिखते, जिसके कारण आए दिन ऐसी स्थितियां निर्मित होती रहती है। यह तो एक उदाहरण है लेकिन ऐसे अनेक मुद्दे हैं जहां आम आदमी असल जड़ तक नहीं पहुंच पाता। इसलिए एक दिन के मुर्खता दिवस (1 अप्रैल। के भी अब कोई मायने नही रह गए क्योंकि वो रोज कहीं ना कहीं मुर्ख बनता है।

कोई इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं,जगह-जगह जाम की स्थिति

देखा जाए तो यातायात व्यवस्था पूरी तरह चौपट है। कोई इन्फ़्रास्ट्रक्चर नहीं। जगह जगह जाम की स्थिति। विदेशों जैसी चार छह लेन चले। हमारे यहां की सड़कें वैसी हो, ऐसे में कोई गलती करे और उसे ई चालान भेजें तो समझ आए। साफ तौर पर फोटो खींचकर ई चालान भेजना, कमाई का जरिया ही नजर आता है लेकिन आम जनता सुव्यवस्थित यातायात देने के लिए जिम्मेदार सरकार को कोसती नहीं। भले वह एक के ऊपर एक गिरती पड़ती निकलेगी।

एक वीआईपी आता है, पूरा शहर तहस नहस

आए दिन आ जाने वाले चालान जैसे तैसे भरती रहेगी, लेकिन कभी यह नहीं कहेगी कि चालानी कार्रवाई से पहले वैसी सुगमता भी मिले। एक वीआईपी आता है, पूरा शहर तहस नहस हो जाता है लेकिन भोली भाली जनता गाड़ियों की संख्या के मान से उस नेता की हैसियत का अंदाज़ा लगाती रहती है।

हंसी आती : यह नहीं सोचती कि इतनी गाड़ियों की जरूरत क्या है। सोचता हूँ इन दिनों हेलमेट एवं सीट बेल्ट पहनाने के लिए जिस तरह का बेहूदा एवं अभद्रता भरा अभियान चल रहा है, क्या वाकई शासन प्रशासन आम आदमी की जान माल की चिंता के लिए ऐसा करता है। हंसी आती है।

भ्रष्टाचार को शिष्टाचार समझने की मुर्खता

सड़क, बिजली, पानी, ड्रेनेज, सरकारी शिक्षा, चिकित्सा आदि जहां आम आदमी समस्याओं के साथ सामंजस्य ही बिठाता दिखाई देता है। जगह जगह टोल हो या गाईड लाईन, संपत्ति कर हो या आरटीओ रजिस्ट्रेशन इंश्योरेंस आदि, जीएसटी की गैर वाजिब दरें हो या अन्य कोई काम। सरकारी फीस में चाहे जब भारी बढ़ोतरी। फीस के साथ दूसरी फीस अलग। थोपे गए नियमों का हवाला देकर आम आदमी की जेब हल्की करके मुर्ख ही बनाया जाता है। सरकारी मकड़जाल ऐसा कि जनता सदैव उसमें फंसी नजर आती है। दिन भर यहां वहां लाईन में लगी दिखती है। वह भ्रष्टाचार को शिष्टाचार समझने की मुर्खता करती है। एक बार में होने वाले काम के लिए सौ सौ चक्कर लगाती है।

हर्जाना चालान और मनमाने टैक्स के रूप में भरना आम आदमी का राष्ट्रीय कर्तव्य...!

इस पर सरकारी तामझाम और खर्चों की तो बात ही निराली। इन दिनों आम व्यक्ति की दाल रोटी कैसे चल रही है, वही जानता है लेकिन सरकार की अनाप शनाप फिजूलखर्ची से वह प्रभाव में आता है। कभी इसके गलत होने का आकलन करता नहीं। बल्कि सरकारी अपव्यय का हर्जाना चालान और मनमाने टैक्स के रूप में भरना आम आदमी का राष्ट्रीय कर्तव्य बनता जा रहा है। ठीक ऐसे ही सरकारी अधिकारी कर्मचारी जो भारी भरकम तनख्वाह पर काम करते हैं। जायज काम के लिए आम आदमी उनके आगे गिड़गिड़ाता रहता है।

नासमझी में वह यह नहीं सोच पाता कि सीना ठोक कर उसका काम होना चाहिए, न कि हाथ फैलाकर या रिश्वत देकर। वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं तो हम एक दूसरे को दोषी करार देने लगते हैं लेकिन इसके लिए जिम्मेदार सरकार को क्लीनचिट और बेचारी करार दे देते हैं। जनप्रतिनिधि भी अप्रासंगिक से लगते हैं। उनका काम क्या है और वे न जाने क्या क्या करके आम जनता को बरगलाते रहते हैं।

रही सही कसर सोशल मीडिया पूरी करता है। लगातार झूठ से भरे, नफरती मैसेज चलते रहते हैं लेकिन आम आदमी उन्हें सच मान लेने की मुर्खता करता है। सरकारी चाटुकारों की बातों में आ जाता है। तय है, मौन रहकर मुर्ख बनना यदि जनता का शगल बन जाएगा तो सरकारों का क्या, वह कदम कदम पर जनता को मुर्ख बनाती रहेगी।

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