Friday, 03 April 2026

आपकी कलम

मन का दुःख

paliwalwani
मन का दुःख
मन का दुःख

बहुत पहले की बात है, किसी प्रदेश में बेतू नाम का कोई आदमी रहता था। वह बहुत क्रूर तथा स्वार्थी था। अपने मित्रों को दुःख देने में उसे आनन्द आता था। एक बार वह अपने मित्र के घर के प्रति पैदल ही चल पड़ा। उसके पास भोजन तथा लालटेन थी। कुछ दूर चले जाने पर अन्धकार छा गया। उसने लालटेन जलाई। उसी समय पीछे से दो आदमी आये जो उसी गाँव में जाना चाहते थे।

बेतू ने देखा कि वे दोनों उस लालटेन के उजाले में चल रहे हैं। बेतू ने अपनी चाल तेज कर दी। वे दोनों भी तेजी से चलने लगे। घना अंधेरा छा गया। अपने पीछे चलने वालों को बेतू ने कहा, "भाइयों ! यह लालटेन मेरी है। आप इसका लाभ उठा रहे हैं।" उन्होंने कहा, "यदि हम दोनों लालटेन के प्रकाश में चल रहे हैं, तो कोई हानि नहीं हो रही है। तेल भी अधिक खर्च नहीं हो रहा है। तुम्हें दुःख क्यों हो रहा है ? रास्ते में हम तुम्हारी मदद करेंगे। हम भी उसी गाँव में जा रहे हैं।" ईर्ष्यालु बेतू ने शीघ्र ही लालटेन बुझा दी। स्वयं भी वह अंधेरे में चलने लगा।

उन दोनों ने विचार किया कि शायद हवा से लालटेन बुझ गई है। कुछ समय बाद यह फिर लालटेन जलायेगा। घने अंधेरे से रास्ता भी नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक बेतू गड्ढे में गिर पड़ा। वे दोनों हक्के-बक्के-से रह गये जब उसे गड्ढे में पड़ा देखा तो रस्सी से निकालने लगे। बेचारा बेतू घायल हो गया। उसकी लालटेन भी फूट गई। उसकी चीजें भी इधर-उधर बिखर गईं।

उन दोनों ने बेतू को उठाया। जल पिलाकर उसे डाक्टर के पास ले गये कुछ समय बाद बेतू ने अपने मन में विचार किया कि मैं वास्तव में नीच हूँ, मेरे पीछे चलने वाले महान् हैं। मैंने इनके साथ दुर्व्यवहार किया फिर भी इन्होंने मेरे साथ अच्छा व्यवहार किया। मुझे धिक्कार है। इस प्रकार पश्चात्ताप करते हुए बेतू ने क्षमायाचना की और वह अपने मन में बड़ा दुःखी हुआ।

!! जो प्राप्त है, पर्याप्त है...!!

whatsapp share facebook share twitter share telegram share linkedin share
Related News
Latest News
Trending News