आपकी कलम
घमंड चूर-चूर वैईग्यों : राजेन्द्र सनाढ्य राजन
paliwalwani
घमंड चूर-चूर वैईग्यों
एक लगाई सूबे-सूबे,
गोदड़ी ने जोर ऊँ पटकी,
अबाणु जमाई न मेली,
पाछी परी लटकी।
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गोदड़ी बोली धीरे मेल,
घमंड कणी पे करे हैं,
थूँ जिने अतरो चावें,
वो जादा म्हारा पे मरे हैं।
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थूँ कतरोई सणंगार करी ले,
वंडों भोजन ऊँ पेट भरी ले,
ठंड लागताई न म्हारे पा आवें,
थूँ कतराई मंतर फेरी ले।
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कतरा परेम ऊँ म्हनें वो,
आकी रात लपाई राखें,
सूबे तक नी छोड़े म्हनें,
थूँईस सूबे पाणी फाँके।
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म्हारों रंग रूप हाऊँ नी हैं,
भली क ई काम नी कीदो,
म्हारा मा अतरा गुण तो हैं,
वंडे हिवड़ा ने जीती लीदो।
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पूछी लिजे थारा धणी ने,
अबाणु किने जादा चावें,
एक दन भी म्हूँ नी मली,
तो वो वेन्डों वैई जावें।
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थारा मा न म्हारा मा वेन्डी,
ओईस तो हैं अंतर,
म्हारा मा हवारथ नी हैं,
थूँ हवारथ रो भर्यों कनस्तर।
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राजन आ हुणताई न लगाई रा,
हाथ-पग ठंडा वैईग्यां,
घमंड चूर-चूर वैईग्यों,
मुंडा रा बोल मुंडा मी रैईग्यां।
मुंडा रा बोल मुंडा मी रैईग्यां।।
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राजेन्द्र सनाढ्य राजन
वाइस प्रिंसिपल-रा उ मा वि नमाना
नि-कोठारिया, जि-राजसमंद, राजस्थान





