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इंदौर

मध्यप्रदेश को बना दिया प्रशासनिक प्रयोगशाला...! : सुदेश तिवारी

📅 02 January 2026, 01:54 AM • ✍️ सुदेश तिवारी • ⏱️ 4 मिनट में पढ़ें
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मध्यप्रदेश को बना दिया प्रशासनिक प्रयोगशाला...! : सुदेश तिवारी
मध्यप्रदेश को बना दिया प्रशासनिक प्रयोगशाला...! : सुदेश तिवारी

सुदेश तिवारी

मध्यप्रदेश में प्रशासन नहीं, प्रयोग चल रहा है।

अफ़सरों की पोस्टिंग ऐसे हो रही है जैसे प्रदेश कोई टेस्ट ट्यूब हो और जनता उसका गिनी पिग।

भागीरथपुरा, इंदौर जैसी घटनाएँ चेतावनी नहीं, बल्कि गलत अफ़सरशाही की परिणति हैं।यंहा पर कई अपरआयुक्त हैं लेकिन rr ias के पास इतने ज़्यादा प्रभार थे कि वह मैनेज ही नहीं कर पा रहे थे।

पिछले एक साल में प्रदेश के प्रशासकीय मुखिया ने पूरा सिस्टम नवसिखियों के भरोसे छोड़ दिया है।

पहले सीधे भर्ती (आरआर) आईएएस अफ़सर मंत्रालय में परिपक्व होते थे,

फिर फील्ड में भेजे जाते थे।

लेकिन अब?

परीक्षा पास = सीधे ज़िला, सीधे पावर, सीधे प्रयोग।

जिन पदों पर वर्षों का अनुभव रखने वाले राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी शानदार काम करते थे,

उन्हें हटाकर कहा गया—

❝सिर्फ आईएएस ही योग्य हैं❞

सवाल ये नहीं है कि

राज्य सेवा के अफ़सर कितने अच्छे हैं।

सवाल ये है कि

अनुभवहीन अफ़सरों को सिर्फ इसलिए ज़िम्मेदारी क्यों दी जा रही है क्योंकि उन्होंने परीक्षा पास की है?

यह सोच आज पूरे प्रदेश के विभागों को जाम कर रही है।

फाइलें रुक रही हैं।

फैसले लटक रहे हैं।

और राज्य प्रशासनिक सेवा के भीतर हीन भावना गहराती जा रही है।

प्रशासकीय मुखिया की मंशा चाहे ठीक हो,

लेकिन फील्ड का अनुभव साफ़ बता रहा है—

यह प्रयोग है, और यह प्रयोग फेल हो चुका है।

अब बात करें आरआर बनाम प्रमोटी आईएएस–आईपीएस की।

प्रदेश के अधिकांश जिलों में प्रमोटी अफ़सरों को फील्ड से हटाकर

बल्लभ भवन भेज दिया गया।

कारण?

वे प्रमोटी हैं।

वहीं दूसरी तरफ़

सिर्फ “आरआर” होने पर महत्वपूर्ण पद बांटे जा रहे हैं।

पिछली आईएएस तबादला सूची खोलिए—

सब कुछ साफ़ दिख जाएगा।

प्रमोटी अफ़सरों की क्या हैसियत रखी गई है।

2019 बैच के कई आईएएस अफ़सरों की पोस्टिंग ने

‘गुल खिलाने’ का काम किया है।

खंडवा ज़िला पंचायत सीईओ इसका उदाहरण है।

इंदौर विकास प्राधिकरण

भोपाल विकास प्राधिकरण

एमपीआईडीसी

और अब…

महाकाल मंदिर प्रशासक जैसे आस्था से जुड़े पदों पर भी प्रयोग!

प्रशासन कोई ट्रेनिंग अकादमी नहीं।

प्रदेश कोई प्रयोगशाला नहीं।

और जनता कोई टेस्ट सब्जेक्ट नहीं।

अगर यही हाल रहा,

तो इसकी कीमत अफ़सर नहीं—

मध्यप्रदेश की जनता चुकाएगी।

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