Saturday, 24 January 2026

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अटल-आडवाणी के वो 'राजस्थानी दोस्त', जो रेस में रहकर भी कभी नहीं बन पाए BJP अध्यक्ष

paliwalwani
अटल-आडवाणी के वो 'राजस्थानी दोस्त', जो रेस में रहकर भी कभी नहीं बन पाए BJP अध्यक्ष
अटल-आडवाणी के वो 'राजस्थानी दोस्त', जो रेस में रहकर भी कभी नहीं बन पाए BJP अध्यक्ष

नितिन नबीन भारतीय जनता पार्टी के नये अध्यक्ष बने हैं. इसके साथ ही एक बार फिर राजस्थान के किसी नेता का बीजेपी अध्यक्ष बनने का सपना धरा ही रह गया. चर्चा थी कि जेपी नड्डा के बाद राजस्थान से आने वाले केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव को बीजेपी अध्यक्ष की कुर्सी सौंपी जा सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है.

पहली बार बिहार से आने वाले महज 45 साल के नितिन नबीन को बीजेपी का अध्यक्ष चुना गया है. आपको ये जानकर हैरत होगी कि बीजेपी के संस्थापक अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के बेहद करीब रहे राजस्थानी दोस्त भैरों सिंह शेखावत कई बार बीजेपी अध्यक्ष बनने की रेस में रहे, लेकिन उन्हें पार्टी में यह पद कभी भी नहीं मिल पाया.

बीजेपी अध्यक्ष बनने से हर बार क्यों चूके भैरों सिंह शेखावत?

राजस्थान देश का वह पहला राज्य है जहां बीजेपी की पहली सरकार बनी. यही वो राज्य है जहां से पार्टी ने सफलता की पहली सीढ़ी चढ़ी थी. 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी की ओर से बीजेपी की स्थापना करने के 10 साल बाद ही राजस्थान में इनकी पहली सरकार बनी. तब बीजेपी के 85 विधायक जीतकर आए थे. बीजेपी ने भैरों सिंह शेखावत को 9 मार्च 1990 को बतौर बीजेपी नेता उन्हें पहली बार राजस्थान का सीएम बनाया था.

हालांकि भैरों सिंह शेखावत इससे पहले 22 जून 1977 से 16 जनवरी 1980 तक भी राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे थे, लेकिन तब वह जनता पार्टी के नेता था. इसके बाद भैरों सिंह शेखावत दिसंबर 1993 से नवंबर 1998 तक बीजेपी के नेता के तौर पर राजस्थान के मुख्यमंत्री रहे.

भैरों सिंह शेखावत जनसंघ के जमाने से ही बीजेपी के साथ जुड़े हुए उन चुनिंदा नेताओं में एक थे. जनता पार्टी के विघटन के बाद जब अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने भारतीय जनता पार्टी का गठन किया तो उस वक्त मुरली मनोहर जोशी के अलावा भैरों सिंह शेखावत वह उन चुनिंदा नेताओं में शामिल थे जो संस्थापक सदस्य के रूप में जाने जाते हैं.

1980 से 1986 तक अटल बिहारी वाजपेयी बीजेपी के अध्यक्ष रहे. इसके बाद 1986 से 1991 तक लालकृष्ण आडवाणी ने यह पद संभाला. बीजेपी जब अपना तीसरा राष्ट्रीय अध्यक्ष तलाश रही थी तब भैरों सिंह शेखावत का नाम तेजी से सामने आया था. लेकिन उस वक्त शेखावत राजस्थान में बनी बीजेपी की पहली सरकार चला रहे थे, इसलिए उन्हें यह जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई. ऐसे में मुरली मनोहर जोशी को बीजेपी अध्यक्ष बनाया गया था. पार्टी के अंदर हमेशा से एक पद एक जिम्मेदारी की प्रथा रही है.

इसके बाद 1993 में एक बार फिर से भैरों सिंह शेखावत का नाम बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के लिए उछाला गया, लेकिन तब एक बार फिर से शेखावत राजस्थान के सीएम पद की जिम्मेदारी संभाल रहे थे. 1998 और 2000 में भी भैरों सिंह शेखावत का नाम बीजेपी अध्यक्ष की रेस में लिया गया, लेकिन इन मौकों पर भी क्रमश: कुशाभाऊ और बंगारू लक्ष्मण को यह जिम्मेदारी सौंपी गई.

साल 2001 में बंगारू लक्ष्मण के विवादों में फंसने के बाद एक बार फिर से भैरों सिंह शेखावत जैसे बेदाग छवि वाले नेता के हाथों में बीजेपी की कमान सौंपने की चर्चा शुरू हुई, लेकिन आखिरकार दक्षिण भारत में पार्टी के विस्तार की योजना के तहत तमिलनाडु से आने वाले जन कृष्णमूर्ति को बीजेपी का अध्यक्ष बनाया गया..

बीजेपी की राजनीति को लंबे समय से जानने समझने वाले लोग बताते हैं कि भैरों सिंह शेखावत बीजेपी के उन नेताओं में शामिल रहे जो अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी दोनों के बेहद करीबी रहे. माना जाता है कि अटल-आडवाणी पार्टी से जुड़ा कोई भी फैसला लेने में भैरों की सहमति जरूरी लेते थे. भैरों सिंह शेखावत की छवि एक ऐसे नेता की रही जिनका कोई दुश्मन नहीं रहा. भैरों हमेशा कहते थे- ‘मैं दोस्त बनाता हूं, दुश्मन नहीं.’

उस जमाने में बीजेपी के अंदर कहा जाता था कि अटल बिहारी वाजपेयी पहले से ही राष्ट्रीय स्तर पर सर्वमान्य नेता रहे. ऐसे में ठीक उसी स्वभाव के भैरों सिंह शेखावत को पार्टी का चेहरा बनाए जाने पर आम सहमति नहीं बन पा रही थी.

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