आपकी कलम
आत्ममीमांसा : अंग्रेजी विज्ञापन और जाहिर सूचना के सिद्धहस्त हिन्दी अनुवादक थे विश्वनाथजी शर्मा
paliwalwani
आत्ममीमांसा (107)
सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार
एक मौन साधक, मशीनों की धड़धड़ाहट, शोर के बीच एक प्लायवुड का छोटा सा कमरा, वही दुनिया थी आदरणीय विश्वनाथ जी शर्मा की। वे हस्तरेखा भी बहुत अच्छी पढ़ लेते थे, 1978 में ही उन्होंने कह दिया था, प्रतिभाशाली हो नई दुनिया में तुम्हें वह मुकाम नहीं मिलेगा।
मुझे कहा था....एक दिन आएगा....
जो तुम पाना चाहते हो, एक बार बाहर दक्षिण में किसी शहर में काम करने का योग है...., फिर लौटकर आओगे तो इन्दौर ही तुम्हारी कद्र भी करेगा और यहां नाम, काम दोनों से मिलेगी प्रतिष्ठा...। तब मुझे इन सब बातों पर ज्यादा विश्वास नहीं था...पर आगे चलकर सही साबित हुआ। तब मैं नई दुनिया से अलग जिन्दगी की कल्पना ही नहीं कर सकता था...।
शर्माजी कर्मयौद्धा थे...
खैर मैं बात कर रहा था आदरणीय विश्वनाथ जी शर्मा की...वे अब नहीं रहे लेकिन वे यौद्धा थे। हाथ-पांव दोनों से दिव्यांग और अंग्रेजी, हिन्दी के विद्वान, नई दुनिया को उन्होंने अपना पूरा जीवन दे दिया... वहीं उस कमरे में रहते, वहीं विश्राम और पीछे ही अपनी ट्राईसिकल से एक भृत्य के सहारे जाते, नित्यक्रम स्नान कर, कमरे में लौटकर आकर पूजा करते और ठीक साढ़े दस से शाम पांच बजे तक, या जब तक विज्ञापन का कार्य पूरा नहीं होता करते रहते....।
उनके साथी थे....
उनके साथ आदरणीय नवीन व्यास, मित्र अशोक गुप्ता, सी. के. शर्मा अनुवादित विज्ञापनों के प्रूफ पढ़कर फाइनल किया करते थे। सी. के. शर्मा यह कार्य तभी करते थे, जब व्यासजी छुट्टी पर होते थे। उस समय राष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसियों के विज्ञापन और जाहिर सूचना अंग्रेजी में ही आते थे, उनको अनुवाद कर ही छापने होते थे।
जिम्मेदारी और जोखिम भरा....
यह कार्य बहुत ही जिम्मेदारी और जोखिम भरा था। जोखिम यह कि अंग्रेजी में लिखे भाव को पढ़ना और हिन्दी में उसी भाव को उतारना, शब्दों की यह कला शर्माजी के ही बस में थी। अनुवाद नवीनजी व्यास भी कर लेते थे। शर्माजी एक धैर्यवान और संजीदा इंसान थे। सब उनके पास जाते थे।
तीनों नियमित हाल-चाल पूछते थे
बाबूजी, भैय्याजी, तिवारीजी तीनों दिन में एक बार अवश्य आते-जाते उनसे मिलते, हालचाल जानते। एक डाक्टर भी तय थे, शर्माजी की तबीयत संभालते। उनके भोजन का टिफिन नियमित था। सादा भोजन, दाल-चावल, सब्जी चपाती, पापड़, अचार, सलाद...भरपूर प्रोटीन। दवाईयाँ उनके नियमित जीवन का अंग था। सदैव प्रसन्न रहते, कार्य के प्रति सतर्क, समय के पाबंद।
उन्होंने.... नहीं देखा दुखद उत्तरार्ध
उनके पास अनुवाद का कार्य आया नहीं कि मिनटों में पूरा....। तीन बजे की चाय मेरी उनके साथ तय रहती थी। उनके जीवन की संध्या नई दुनिया के दुखद उत्तरार्ध के काफी पहले आ गई थी, वे शायद यह सब न देख पाते....।






