Tuesday, 07 July 2026

आपकी कलम

राजनैतिक व्यंग्य-समागम : नौकरी करें और खुश रहे, वरना ...! : विष्णु नागर

paliwalwani
राजनैतिक व्यंग्य-समागम : नौकरी करें और खुश रहे, वरना ...! : विष्णु नागर
राजनैतिक व्यंग्य-समागम : नौकरी करें और खुश रहे, वरना ...! : विष्णु नागर

नौकरी करें और खुश रहे, वरना ...! 

बांबे हाईकोर्ट के जज माधव जामदार साहब, आप  यह नहीं कहते, तो आपका क्या बिगड़ जाता कि नागरिकों को भारत सरकार का गुलाम बना रखा है, वे विरोध प्रदर्शन नहीं कर सकते, वे आंदोलन नहीं कर सकते। वे विरोध करें, तो उन पर केस कर दिया जाता है। वे भाजपा सरकार मुर्दाबाद, अमित शाह मुर्दाबाद के नारे लगाएं, तो तड़ीपार कर दिया जाता है।नागरिक ऐसे नारे क्यों नहीं लगा सकते? इससे तकलीफ़ क्या है?

जिनसे आप पूछ रहे हैं न जज साहब, वे तो  जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु के छह दशक के बाद भी उनसे सवाल पूछ रहे हैं, तो वे आपसे प्रश्न कर सकते हैं। आपको ट्रोल कर सकते हैं कि आपको इस सबसे तकलीफ़ क्या है? आपको तो विरोध प्रदर्शन करना नहीं है, धरना देना नहीं है, आपको मुर्दाबाद-जिंदाबाद करना नहीं है। आपकी पत्नी, आपके बच्चे भी धरना देने, विरोध प्रदर्शन करने जानेवाले हैं नहीं! उनमें से किसी को तड़ीपार  नहीं किया जा रहा है।

फिर समस्या क्या है? हो, तो साफ़ बताओ! देवेन्द्र फड़नवीस से बोलो, वरना सीधे अमित शाह से बोलो और चाहो तो, प्रधानमंत्री से बोलो।वैसे नागपुर से भी बोल‌ सकते हो। उन्हें भी एलाऊ किया हुआ है, पर ऐसे कटु वचन मत बोलो और बोलोगे तो हमारी आईटी सेल भी कुछ उल्टी बोल पड़ी, तो फिर शिकायत मत करना कि देखो जज के साथ भी क्या सलूक हो रहा है! एक ट्वीट करवाने के केवल पांच रुपए लगते हैं और पार्टी के पास अरबों का खजाना है।

वे ऐसी-ऐसी बेहूदा टिप्पणी करेंगे कि हवा टाइट से भी टाइट कर देंगे। इस बहाने वे बरनाल का विज्ञापन खूब करेंगे और ये भी बताएंगे कि इसका उपयोग कहां और किस तरह  करना है! आप भी यह चाहते हो, तो बोलो। अमित मालवीय को आपके जवाब का इंतजार है।

और सुनो, जज साहब आपको इस पद पर, इतनी तनख्वाह और इतनी सुविधाओं के साथ इसलिए थोड़े बैठाया था कि दूसरों के दुख- तकलीफ़ से खुद भी तकलीफ़ पाओ। बैठाया इसलिए था कि सारी तकलीफों से, दुःखों से, अन्यायों और अत्याचारों से इतने अधिक ऊपर उठ जाओ कि कुछ भी ग़लत होता न दिखे, और दिखे तो आंखों पर पट्टी बांध लो। सुनाई दे, तो कान में रुई डाल लो। बीच-बीच में छोटा-मोटा न्याय करते रहो, ताकि बड़े अन्याय में बिना पलक झपकाए हमारा साथ दे सको!

वैसे जज लोया के बारे में तो आपको सब मालूम ही होगा। इसी प्रदेश के थे। चलो बारह साल पुरानी बात है, भूल जाते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के जज एस मुरलीधर का नाम सुना होगा, कभी मिले भी हों शायद, तो मालूम होगा कि वे नफरती भाषण देनेवाले दिल्ली के भाजपाई नेताओं के खिलाफ केस दर्ज न करने के लिए दिल्ली पुलिस को बहुत जोर से फटकार रहे थे, तो हमने उनका रातों-रात स्थानांतरण करवा दिया।

सुबह होने  का इंतजार भी नहीं किया! गुजरात हाईकोर्ट के एक जज थे,अकील कुरैशी। उन्हें गुजरात हाईकोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश का दायित्व दे दिया गया था।कुछ ही घंटों में उनसे यह छीन लिया गया। पूछो क्यों, तो उनका अपराध यह था कि उन्होंने सोहराबुद्दीन फ़र्जी मुठभेड़ केस में अमित शाह को कभी पुलिस हिरासत में भिजवाया था। इसके बाद भी उन्हें बख्शा नहीं गया। सुप्रीम कोर्ट का जज नहीं बनने दिया गया।

डंका फट गया है, मगर कमाल है कि फिर भी बज रहा है!

इसी तरह उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के एम जोसेफ ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के विरुद्ध निर्णय दिया था, तो उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने  में काफी देरी की गई। उनकी वरिष्ठता को चूना लगा दिया गया। तो जजों को भी सबक सिखाने के इतने उदाहरण हैं कि अब बिना सिखाए भी काफी जज सब सीख चुके हैं। अधिकांश पदों पर अब समझदार लोग  बैठे हैं। हमने तो आपको भी समझदार ही समझा था, पर क्या कहें? आपने तो हमारा भरोसा ही तोड़ दिया!

और जज साहब आपको इतना भी समझ में क्यों नहीं आया कि यह हिन्दू-मुस्लिम करने का स्वर्णयुग है। अजीब बात है कि इस युग में आपको सेकुलरिज्म की रक्षा करने की पड़ी है।आपको वाहिद चौधरी नाम देखते ही समझ जाना चाहिए था कि ये मुल्ला है। इतना तो हर हिन्दू बच्चा भी समझता है, मगर आप नहीं समझे। जिसे हमारी भाषा में मुस्लिमपरस्ती कहते हैं, वह आपने की। उसे न्याय देने की चिंता की और हिंदुत्व का खेल बिगाड़ने की कोशिश की।

आप जज हैं, इसलिए हम बहुत नरमी से समझा रहे हैं, वरना नरमी हमारे डीएनए में नहीं है। इसे आप धमकी या चेतावनी मत समझना और समझो तो भी कोई प्राब्लम नहीं क्योंकि सारी दुनिया में हमारे नेता का डंका बज रहा है। डंका फट गया है, मगर कमाल है कि फिर भी बज रहा है!

आप केस सुन रहे थे वाहिद चौधरी का और व्यंग्य हम पर कस रहे थे कि इधर दस साल के बच्चे की दुर्घटना में मौत हो रही थी और उधर सदन में पार्टी बदलने पर बहस चल रही थी।आपने वाहिद चौधरी से कहा कि आजकल दलबदल चल रहा है, वाशिंग मशीन चालू है। आप भी उसमें घुस जाओ, पाक-साफ हो जाओ। हमारे मामले में आपको बोलना नहीं चाहिए। दिस इज नाट डन! आइंदा खयाल रखें। नौकरी करें और घर जाएं और बीवी - बच्चों के साथ खुश रहें! खुश रहने से बड़ी बात इस दुनिया में और क्या है!

कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं. जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं.

  1.  “कई पुरस्कारों से सम्मानित विष्णु नागर साहित्यकार और स्वतंत्र पत्रकार हैं. जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं...!!!
  2. चुप हूँ सब जानता मगर हूँ मैं...ये न समझो कि बे-ख़बर हूँ मैं...

मैया मोरी मैं नहीं मंगलसूत्र चुरायो! : राजेंद्र शर्मा

अब इसमें मंगलसूत्र की चोरी की बात कहां से आ गयी। माना कि रामलला के घर में चोरी हुई है। माना कि अयोध्या में रामलला के चढ़ावे में से चोरी हुई है। माना कि छोटी-मोटी नहीं, करोड़ों रुपए की चोरी हुई है। माना कि किसी एक दिन नहीं, दो-चार बार भी नहीं, बार-बार, लगातार, सालों चोरी हुई है।

माना कि मंदिर बनने के बाद ही नहीं, मंदिर बनने से पहले से चोरी हुई है। माना कि मोदी जी के शिला पूजन से पहले से चोरी हुई है, मोदी जी के मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठापन तक और उन्हीं के कर कमलों से ध्वजारोहण के पहले और बाद तक चोरी हुई है। 

माना कि किसी तरह की हड़बड़ी में नहीं, बड़े इत्मीनान से, व्यवस्थित तरीके से चोरी हुई है। सिर्फ रुपये-पैसे की ही नहीं, हर कीमती चीज की चोरी हुई है। रामलला की चरण पादुका से लेकर गले के के हार तक की। सोने से मढ़ी रामायण से लेकर, रत्नजड़ित काकभुशुंडी तक की। सुना है कि चांदी की दो सौ ईंटें तक चोरी हो गयीं, जो मंदिर की नींव में लगनी थीं।

और हां! जमीन की भी चोरी हुई है। वैसे जमीन तो मस्जिद की भी चोरी हुई थी, मगर हम उसकी बात नहीं करेंगे। सबसे बड़ी अदालत जिस चोरी को ही न्याय कहे, उसे चोरी कहने की जुर्रत कौन करेगा? एंटी-राम और एंटी-नेशनल कहलाएगा सो कहलाएगा, सबसे ऊंची अदालत को बदनाम करने के जुर्म में, अदालत में ही रगड़ा और जाएगा। पर जमीनें और भी चुराई गई हैं, मस्जिद की जमीन के सिवा। वह सब तो सही है। 

माना कि चोरी की एक-एक बात सब सही है। फिर भी इसमें मंगलसूत्र की चोरी की बात कहां से आ गयी। इस सब का मंगलसूत्र की चोरी से क्या लेना-देना है? चंदा चोरी करने वालों पर मंगलसूत्र की चोरी का इल्जाम यूं ही नहीं लगाया जा सकता। मंगलसूत्र की बात डिफरेंट है। बाकी सारी चोरी के इल्जाम एक तरफ, मां-बहनों के मंगलसूत्र की चोरी का इल्जाम एक तरफ।

मंगलसूत्र की चोरी का अलग से खंडन इसलिए करना पड़ रहा है कि अयोध्या से किन्हीं साधु-महात्मा जी का वीडियो वायरल हो रहा है। वीडियो में साधु बाबा एक किस्सा सुनाते हैं। अयोध्या में मार-काट वाली कार सेवा के दौरान, दक्षिण भारत की एक महिला बाबा के पास आती है। बताती है कि उसका पति कार सेवा में शहीद हो गया है, क्या अयोध्या में उसका अंतिम संस्कार हो सकता है? बाबा ने कहा, अवश्य। अंतिम संस्कार के बाद उस महिला ने बाबा जी को रूमाल की छोटी सी पोटली देनी चाही।

बाबा ने पूछा इसमें क्या है? महिला ने दिखाया, उसमें मंगलसूत्र था। बाबा ने कहा, हम तो साधु-महात्मा हैं, इसे नहीं रख सकते। पर जब राम मंदिर बन जाएगा, तब आकर इसे मंदिर में चढ़ा जाना। मंदिर बन गया, वह महिला फिर आयी और अपना मंगलसूत्र दानपात्र में चढ़ा भी गयी। पर मंगलसूत्र, रामलला के खाते में तो चढ़ा ही नहीं। चंदा चोरी करने वालों ने मंगलसूत्र भी नहीं छोड़ा। कारसेवक की विधवा का मंगलसूत्र भी चुरा लिया!

वायरल वीडियो वाले साधु-बाबा कितने साधु हैं और कितने बाबा, हम नहीं जानते। अयोध्या में तो कहते हैं कि जहां भी कोई ईंट खिसकाओ, नीचे दो-तीन भगवाधारी तो निकल ही आएंगे। फिर भी, साधु-बाबा की कहानी अगर पूरी सच भी मान ली जाए और कार सेवक विधवा के राम मंदिर में अपना मंगलसूत्र चढ़ाने के दावे को सच भी मान लिया जाए, तब भी इससे ज्यादा से ज्यादा मंगलसूत्र दान पेटी में डाले जाने की बात साबित होती है, मंगलसूत्र की चोरी की नहीं। दान पेटी में डालने और रामलला के खाते तक पहुंचने के बीच में, मंगलसूत्र कई और संदों में भी सरक सकता है, चोरी के सिवा। 

हो सकता है कि दान पेटी में डालते समय ही मंगलसूत्र इधर-उधर सरक गया हो और दान पेटी के अंदर गया ही नहीं हो। दान पेटी से जो खुद ही सरक जाए, उसे रामलला का चढ़ावा कैसे कहेंगे? वह तो रामलला द्वारा रिजेक्टेड चढ़ावा ही माना जाएगा। उसे हटाने में चोरी कैसी? या हो सकता है कि मंगलसूत्र ज्यादा ही पतला हो और दान पेटी में ही अटका रह गया हो। पेटी से नोट-नोट निकलते हों, मंगलसूत्र अब भी उसी में अटका हुआ हो।

या मंगलसूत्र पेटी खाली करते समय, इधर-उधर खिसक कर छिप गया हो। या रामलला ने ही खेल-खेल में छुपा लिया हो और फिर भूल गए हों। यानी और भी बहुत कुछ है, जो हो सकता है, मंगलसूत्र की चोरी के सिवा। इसलिए, जब तक सीधे चोरी का साक्ष्य न हो, तब तक यूं ही चढ़ावा चोरों पर मंगलसूत्र की चोरी का इल्जाम लगाना ठीक नहीं है।

यूं तो जब तक चोरी साबित नहीं हो जाए, तब तक किसी भी चीज की चोरी का इल्जाम लगाना ही ठीक नहीं है। सुना है कि राम मंदिर के ट्रस्टी गोपाल राव को लखनऊ से बंगलूरु की उड़ान में सह-यात्रियों ने चढ़ावा चोर और चंदा चोर कहकर घेर लिया। विमान चालक दल को उन्हें उग्र भीड़ से बचाना पड़ा। यह ठीक है क्या? खैर! चढ़ावा चोरी और चंदा चोरी तक की बात तो फिर भी टेढ़े-मेढ़े तर्कों से मानी जा सकती है, पर मंगलसूत्र की चोरी की बात हम हरगिज नहीं मानेंगे। 

चंपत राय हों तो, गोपाल राव हों तो, नृपेन्द्र मिश्र हों तो या कोई और ट्रस्टी, सब के सब मोदी जी ने खुद चुन-चुनकर ट्रस्ट में रखे हैं। सब के सब नागपुर दीक्षित हैं, सब के सब पक्के वाले संस्कारी हैं। यहां तक कि उन्होंने मंदिर की व्यवस्था से लेकर नोटों की गिनती तक के लिए जितने भी लोगों को लगाया है, उन्हें भी और कुछ आता हो या नहीं आता हो, हैं पक्के संस्कारी। पक्का संस्कारी चुराने पर आ जाएगा, तो कुछ भी चुराएगा, रामलला की गुल्लक से भी चुराएगा, पर किसी मां-बहन का मंगलसूत्र नहीं चुराएगा!

आखिरकार, मंगलसूत्र की चोरी तो गैर-संस्कारी विपक्षियों के लिए रिजर्व्ड है। मोदी जी ने पिछले चुनाव के समय ही माताओं-बहनों को चेता दिया था कि विपक्षी, कुछ नहीं छोड़ेंगे, मंगलसूत्र भी चुरा लेंगे। जिन मोदी जी ने 2024 के चुनाव में अपनी कुर्सी ही नहीं बचायी, माताओं-बहनों का मंगलसूत्र भी बचाकर दिखाया, वह अपने मंदिर में मंगलसूत्र की चोरी, अपने पट्ठों तक को कैसे करने दे सकते हैं? अगले चुनाव में भी तो हिंदू माताओं-बहनों को मंगलसूत्र के लिए विपक्ष वालों से खतरा दिखाना है! 

  1.  “आज सुबह मैंने दो उपहार खोले। वे मेरी आँखें थीं”..!!!
  2. लेखक वरिष्ठ पत्रकार और 'लोकलहर' के संपादक हैं..
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