Monday, 06 July 2026

ज्ञानवर्धक प्रेरक प्रसंग

क्या तुमने बेर, जामुन, खजूर खाना छोड़ दिया है, नहीं रे पगले मतलब तूने जीना छोड़ दिया है...!

paliwalwani
क्या तुमने बेर, जामुन, खजूर खाना छोड़ दिया है, नहीं रे पगले मतलब तूने जीना छोड़ दिया है...!
क्या तुमने बेर, जामुन, खजूर खाना छोड़ दिया है, नहीं रे पगले मतलब तूने जीना छोड़ दिया है...!

क्या तुमने बेर,जामुन,खजूर खाना छोड़ दिया है...!

नहीं रे पगले मतलब तूने जीना छोड़ दिया है...!!

​आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम सबने एक बहुत ही अजीब तरह का समझौता कर लिया है। सुबह की शुरुआत अलार्म की कर्कश आवाज़ से होती है, और रात का अंत लैपटॉप की नीली रोशनी के सामने। इस दौड़ में, हमने न केवल अपने स्वाद को बदला है, बल्कि अपनी आत्मा का एक हिस्सा भी कहीं पीछे छोड़ दिया है।

​"क्या तुमने बेर, खजूर, जामुन खाना छोड़ दिया है?"

​यह सवाल महज खाने-पीने की आदतों के बारे में नहीं है। यह एक कटाक्ष है उस आधुनिकता पर, जिसमें हमने 'देसी मिठास' को 'जंक फूड' के प्लास्टिक के पैकेटों से बदल दिया है। बचपन में जब हम पेड़ों पर चढ़कर बेर तोड़ा करते थे, या बारिश के बाद जामुन के लिए आपस में होड़ मचाते थे, तब हम सिर्फ फल नहीं खा रहे होते थे, हम 'जी' रहे होते थे।

​आज, हमारे पास दुनिया भर के महंगे 'एक्जॉटिक फ्रूट्स' हैं, जो फ्रिज में सजे तो रहते हैं, लेकिन उन्हें खाने के लिए वक्त नहीं है। हम ब्रेकफास्ट में 'क्विक ओट्स' और 'एनर्जी बार' खाते हैं, क्योंकि हमें 'दौड़ना' है। लेकिन किसके लिए?

​"नहीं रे पगले, तूने तो जीना ही छोड़ दिया है।"

​यह बात कितनी गहरी और कड़वी है! हमने जीने का मतलब बदल दिया है। हम सोचते हैं कि बड़ी गाड़ी, ऊँचा पद और डिजिटल दुनिया की चमक-दमक ही जीवन है। हमने वह फुर्सत खो दी है जिसमें शाम को गली के नुक्कड़ पर बैठकर नमक लगाकर जामुन खाने का आनंद मिलता था। हमने वह धैर्य खो दिया है जो खजूर के पकने का इंतज़ार करने में होता था।

​आज हम 'स्टैंडिंग डेस्क' पर खड़े होकर काम करते हैं, लेकिन ज़मीन से हमारा जुड़ाव खत्म हो गया है। हम 'ऑर्गेनिक' के नाम पर महंगे लेबल खरीदते हैं, लेकिन असली ज़ायका हमारी यादों के साथ मर चुका है। हमने बेर नहीं छोड़े, हमने वह मासूमियत छोड़ दी जो बेर खाने में छुपी थी। हमने खजूर नहीं छोड़े, हमने वह सब्र छोड़ दिया जो पेड़ से गिरने वाले फल को उठाने की खुशी में था।

​सच तो यह है कि हमने खुद को मशीनों में बदल लिया है। मशीनें काम करती हैं, चलती हैं, आउटपुट देती हैं, लेकिन वो 'जीती' नहीं हैं। वो बेर का खट्टा-मीठा स्वाद महसूस नहीं कर सकतीं।

​तो अगली बार जब आपको किसी बड़े सुपरमार्केट में भागते हुए अपनी लिस्ट पूरी करने की जल्दी हो, तो ज़रा रुकिएगा। किसी ठेले पर रखे उन बेर या जामुन को देखिएगा। वे सिर्फ फल नहीं हैं, वे इस बात का सबूत हैं कि आप अभी भी इंसान हैं।

​इसे एक चुनौती की तरह लीजिए—कभी-कभी काम की रफ्तार को 'पॉज' बटन दबाइए, एक मुट्ठी जामुन खरीदिए, और बस... उन्हें खाइए। शायद उसी पल में आपको महसूस हो कि आपने फिर से जीना शुरू कर दिया है।

​क्या आपको लगता है कि आधुनिक जीवनशैली में 'ठहरने' की यह कला अब पूरी तरह से लुप्त हो चुकी है, या हम इसे वापस अपना सकते हैं?

डॉ. दीपक जैन...✍️  

घाटाबिल्लोद

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