नैवेद्य पुरोहित
इंदौर.
इंदौर जिसे हिंदी पत्रकारिता की राजधानी कहा जाता है यह सिर्फ एक शहर नहीं। यह शहर यहां के बाशिंदों के लिए एक एहसास, एक परंपरा और एक जज़्बा है। यहाँ की पत्रकारिता महज़ पेशा होने के अलावा जिम्मेदारी और अपनापन भी रही है। इसी एहसास को एक ठोस शक्ल देने के लिए 1957-58 के दरमियान में करीब 30 पत्रकारों ने एक सपना देखा एक ऐसे मंच का सपना, जहाँ कलम की आवाज़ संगठित हो सके। यही सपना औपचारिक रूप से 9 अप्रैल 1962 को इन्दौर प्रेस क्लब के रूप में हक़ीक़त बना।
लेकिन सवाल आज ये नहीं है कि यह संस्था कितनी पुरानी है, बल्कि यह है कि 64 साल बाद भी इन्दौर प्रेस क्लब क्यों ज़रूरी है? खासकर युवाओं की नज़र में इसका क्या मतलब है?
एक इमारत नहीं, एक ज़िंदा विरासत
इंदौर प्रेस क्लब सिर्फ ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, चार पीढ़ियों से ज़्यादा की एक दास्तान है। मूर्धन्य पत्रकार बाबा राहुल बारपुते, प्रभाष जोशी, राजेंद्र माथुर, मामाजी माणिकचंद्र वाजपेयी, कृष्णकुमार अष्ठाना, जयकृष्ण गौड़ सहित सैकड़ों नामों ने इसे अपने विचारों से सींचा है। आज जब एक युवा पत्रकार इस परिसर में कदम रखता है तो उसे सिर्फ एक हॉल या लाइब्रेरी नहीं दिखती। उसे एक इतिहास की साँसें सुनाई देती हैं जैसे हर दीवार कोई किस्सा कह रही हो।
कभी खबरें टाइपराइटर पर टंकित होती थीं, साइकिल से अखबार दफ्तर पहुँचते थे। आज वही पत्रकारिता डिजिटल स्क्रीन, रियल टाइम लाइव अपडेट्स और सोशल मीडिया के दौर में है। इस बदलते दौर में भी इन्दौर प्रेस क्लब एक अडिग चट्टान की तरह खड़ा है। एक ऐसी जगह, जहाँ तेज़ रफ्तार खबरों के बीच ठहरकर सोचने की गुंजाइश मिलती है।
शहर की नब्ज़ पकड़ने वाली जगह
इन्दौर प्रेस क्लब ने हमेशा शहर की धड़कन को समझा है। चाहे 1962 का चीनी आक्रमण हो, 1977 का आंध्र का तूफान या 1965 के युद्ध के दौरान फैली अफवाहें हर बार यह संस्था सिर्फ खबर देने के साथ समाज को दिशा देने वाला एक केंद्र भी बना है। यह वही जगह है जहाँ से शहर की समस्याएँ सत्ता तक पहुँचीं और जनता की आवाज़ को भी एक मंच मिला। आज भी जब शहर बदल रहा है चुनौतियाँ बदल रही हैं इन्दौर प्रेस क्लब उस नब्ज़ को पकड़ने वाला केंद्र बना हुआ है।
क्या आज भी यह पत्रकारों का ‘घर’ है?
क्या आज के युवा पत्रकार के लिए इन्दौर प्रेस क्लब सिर्फ एक संस्था है या एक घर? शायद जवाब दोनों के बीच कहीं है। आज की पीढ़ी नेटवर्किंग, इंस्टेंट न्यूज़ और डिजिटल पहचान में व्यस्त है लेकिन इसके बावजूद इन्दौर प्रेस क्लब उन्हें जड़ों से जोड़ने का काम करता है। यह वो जगह है जहाँ सीनियर का तजुर्बा और युवा की ऊर्जा एक साथ बैठती है।
1957 में जो सपना देखा गया था, वो सिर्फ एक संगठन का नहीं था, बल्कि एक विचार का था कि पत्रकार एकजुट रहें, स्वतंत्र रहें और समाज के प्रति जवाबदेह रहें। आज 64 साल बाद यह सवाल उठाना ज़रूरी है क्या हम उस मूल भावना को बचा पाए हैं? यह भी सच है कि हर पीढ़ी उस सपने को अपने तरीके से ज़िंदा रख रही है।
सीखने और सिखाने का केंद्र
इन्दौर प्रेस क्लब ने पत्रकार बनाए हैं। वर्कशॉप, ट्रेनिंग, व्याख्यानमालाएँ ये सब कार्यक्रम एक नई सोच की प्रयोगशाला हैं। आज के युवाओं के लिए यह जगह एक लर्निंग हब है, जहाँ किताबी ज्ञान से ज़्यादा ज़मीनी समझ मिलती है। कोरोना काल हो या किसी पत्रकार की व्यक्तिगत कठिनाई इंदौर प्रेस क्लब ने हमेशा साथ निभाने की मिसाल पेश की है। एक प्रोफेशनल बॉडी होने के साथ एक इंसानी रिश्ते को भी बनाए रखा है। जहाँ “मैं” से पहले “हम” आता है।
आज जब पत्रकारिता कई चुनौतियों से गुजर रही है फेक न्यूज़, दबाव, प्रतिस्पर्धा ऐसे में इन्दौर प्रेस क्लब जैसे संस्थान की अहमियत और बढ़ जाती है। युवाओं के लिए यह सिर्फ एक जगह नहीं, बल्कि एक आईना है। 64 साल बाद भी यह संस्था इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यह एक अतीत की विरासत है...एक वर्तमान की ज़रूरत है और एक बेहतर भविष्य की उम्मीद है...!