राजेश जैन दद्दू
ऋषभोदय, दिल्ली.
दिगम्बर जैन धर्म के उन्नायक पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि सत्य जीवन का श्रृंगार है।गुरुदेव ने कहा - सत्यपूर्ण जीवन ही खुशहाल होता है। सत्य वस्तु है, वस्तु धर्म है, सत्य ही धन है, सत्य तन है, सत्य विराट है। सत्य जीवन हो, सत्य वाणी हो, सत्य भोजन हो, सत्य पानी हो। जिसका भोजन-पानी अभक्ष हिंसक है, वह सत्य नहीं बोल सकता।
सत्य जानो, सत्य मानो, सत्यपूर्ण जीवन जियो। सत्य सुख का साधन है, सत्य धर्म है, सत्य व्रत है, सत्य सिद्धि का साधन है। सत्य ही अहिंसा है, सत्य ही सर्वस्व है, सत्य ही शांति का आधार है। जगत माया नहीं, सत्य है। सत्यपूर्ण जीवन कठिन हो सकता है, पर उसका फल श्रेष्ठ होता है।
सत्य कैसे जानें? -
जो सत्य को जानना चाहता है, उसे सम्प्रदाय, पंथ, पक्षों से परे जीना होगा। पक्षपातहीन ही यथार्थ सत्य को जान सकता है। सत्य को जानना कठिन है, फिर सत्य को पचाना और अधिक कठिन है।
वाणी से पहचान : गुरुदेव ने कहा - अपनी वाणी से आपके कुल की पहचान हो जाती है। वाणी से ज्ञान की, आन्तरिक भावों की, व्यक्तित्व की और देश-प्रदेश की पहचान होती है।
सज्जनों की वाणी हित-मित-प्रिय होती है। आपकी वाणी मिश्री के समान मधुर होना चाहिए। वचन स्व-पर कल्याणकारी होने चाहिए। वचन वीणा के संगीत के समान हों, वाण की तरह चुभने वाले न हों।
कटु-वचन बहुत घातक :
कटु वचन हथियार से भी अधिक गहरे घाव करते हैं। तलवार का घाव तो भर जाता है, पर कटु वचनों का घाव वर्षों तक नहीं भरता। इसलिए मधुर सोचो, मधुर बोलो, मधुर व्यवहार करो। मधुर और सत्य बोलने वाला सबका प्रिय होता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाएँ उपस्थित रहे।