लेई मुंडो न परो जाऊँ : राजेन्द्र सनाढ्य राजन

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लेई मुंडो न परो जाऊँ

तरकाळ गरमी मा कठी,

लेई मुंडो न परो जाऊँ, 

कणी ठंडा झरणां रे किनारे, 

चारा री झौपड़ी परी वणाऊँ।

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ठंडो टीप पाणी पी-पी न, 

एकदम तरपत वेई जाऊँ, 

राग मा राग मलाई न म्हूँ, 

कोयल रे लारे गुण-गुणाऊँ। 

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मरजी वे जतरी दाण म्हूँ, 

मळ-मळ न खूब हापड़ूँ, 

ऊँची चट्टान पे चढ़ न, 

गेरा पाणी मा गठीम्बा भीड़ूँ।

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छायादार रूकड़ा रे नीचे, 

चौड़ों वेई न नीन्द काडूँ,

हंगळी चिंता छोड़ न, 

जोर-जोर ऊँ खल्डाटा छोड़ूँ। 

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डाळ-पाक फळ खाई न, 

ओ मोटो पेट परो भरूँ, 

सूबे जट वेगो उठ न, 

भगवान री भगति परी करूँ। 

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मात-भौम री गोद मा, 

म्हूँ खूब आनन्द पाऊँ, 

कणी माँई रे लाल ने, 

म्हारे लारे नी ले जाऊँ। 

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जीव मा जीव आईजा,

पाछो सर जीवत वेई जाऊँ, 

जटा तक जीव नी भराई जा, 

राजन पाछो कदी नी आऊँ। 

राजन पाछो कदी नी आऊँ।। 

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● राजेन्द्र सनाढ्य राजन

व्याख्याता- रा उ मा वि नमाना

नि-कोठारिया, जि-राजसमंद (राजस्थान) M. 9982980777

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