इंदौर
इस एक निवाले की शक्ति क्या है-“पिता स्वर्गः, पिता धर्मः, पिता हि परमं तपः” : पालीवाल समाज की अद्भूत प्रतिभा कार्तिक ओमप्रकाश जोशी
sunil paliwal-Anil Bagora
सनातन परंपरा में कहा गया है- “पिता स्वर्गः, पिता धर्मः, पिता हि परमं तपः।” अर्थात पिता ही स्वर्ग हैं, पिता ही धर्म हैं और पिता ही सर्वोच्च तप हैं।
इंदौर. पालीवाल समाज की अद्भूत और होनहार प्रतिभा कार्तिक ओमप्रकाश जोशी की कठिन तप, तपस्या के फलस्वरूप ही आज इंदौर का नाम रोशन ही नहीं कर रहा है, बल्कि पालीवाल समाज का नाम भी गौरवान्वित करने में निरंतर दौड़ लगाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा हैं...ऐसे जुझारू जाबांज नौजवान को पालीवाल वाणी मीडिया समूह सैल्यूट करता हैं, धन्य है, आपके माता-पिता, उन्हें भी हम सबकी ओर से हार्दिक बधाई...!
पिता के हाथों का वह एक निवाला मेरे लिए केवल भोजन नहीं, बल्कि आशीर्वाद, ऊर्जा और जीवन का अमृत है। जिस प्रकार श्रीकृष्ण ने सुदामा के प्रेम से भरे मुट्ठीभर चावलों में सम्पूर्ण सृष्टि का स्नेह स्वीकार किया था, और जिस प्रकार भगवान गणेश की अनंत क्षुधा को श्रद्धा से अर्पित एक तुलसी पत्र ने शांत कर दिया था, उसी प्रकार मेरे पिता के हाथों से मिला एक निवाला मुझे हजारों किलोमीटर दौड़ने की शक्ति दे देता है।
कारगिल से कन्याकुमारी तक 4200 किलोमीटर की इस तपस्या में जब मैंने बर्फीली हवाओं, मूसलाधार बारिश, हाड़ कंपा देने वाली ठंड और राजस्थान की 47 डिग्री की झुलसा देने वाली गर्मी का सामना किया, तब मेरे पिता ने केवल मुझे देखा नहीं, बल्कि मेरे हर दर्द को महसूस किया। मेरे चेहरे के भाव पढ़कर वे मेरे शरीर का वैसा परीक्षण कर लेते हैं जैसे कोई अनुभवी वैद्य नाड़ी देखकर रोग पहचान लेता है।
वे मेरे पहले जागते हैं, मेरे बाद सोते हैं। मैं प्रतिदिन 60 से 75 किलोमीटर दौड़ने के बाद थक जाता हूँ, लेकिन अगले दिन उसी शक्ति, उसी लय और उसी उत्साह के साथ फिर खड़ा हो जाऊँ, इसका सूत्र उनके पास है। वे केवल मेरे पिता नहीं, मेरे पहले गुरु, मेरे कोच, मेरे संरक्षक और मेरे सबसे बड़े प्रेरणास्रोत हैं।
आज यदि एक साधारण इंदौर का लड़का अंतरराष्ट्रीय अल्ट्रा रनर बनकर देश का प्रतिनिधित्व कर पा रहा है, तो उसके पीछे मेरे पिता का त्याग, उनका विश्वास, उनका अनुशासन और उनका निस्वार्थ प्रेम खड़ा है।
दुनिया में पिता के प्रेम की गहराई को शायद कोई पूरी तरह नहीं समझ सकता, लेकिन मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि मेरी हर जीत में मेरे पिता का अंश है, मेरी हर साँस में उनका आशीर्वाद है, और मेरी हर मंजिल तक पहुँचने वाले कदमों के पीछे उनकी अनगिनत जागी हुई रातें हैं। मेरे लिए पिता केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि ईश्वर का वह स्वरूप हैं जो हर कदम पर मेरे साथ चलता है।
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कार्तिक ओमप्रकाश जोशी : पालीवाल समाज का नाम भी गौरवान्वित करने में निरंतर दौड़ लगाकर एक नया कीर्तिमान स्थापित कर रहा हैं... - बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी - चश्म-ए-क़ातिल मिरी दुश्मन थी हमेशा लेकिन
जैसी अब हो गई क़ातिल कभी ऐसी तो न थी
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