Sunday, 05 April 2026

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राजस्थान लोक सेवा आयोग का भट्टा बैठाने में भाजपा-कांग्रेस दोनों बराबर...!

S.P.MITTAL BLOGGER
राजस्थान लोक सेवा आयोग का भट्टा बैठाने में भाजपा-कांग्रेस दोनों बराबर...!
राजस्थान लोक सेवा आयोग का भट्टा बैठाने में भाजपा-कांग्रेस दोनों बराबर...!

सवाल-संजय श्रोत्रिय के खिलाफ भाजपा सरकार में कार्यवाही क्यों नहीं हुई?

एसआई परीक्षा 2021 रद्द होने के बाद पूर्व सीएम अशोक गहलोत अब कौन सा शास्त्र लिखेंगे।

मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को अगले तीन माह में आयोग के अध्यक्ष सहित 7 सदस्यों की नियुक्ति करनी है।

4 अप्रैल को राजस्थान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने भी गत कांग्रेस शासन में हुई सब इंस्पेक्टर (एसआई) भर्ती परीक्षा 2021 को पूरी तरह रद्द कर दिया। इससे पहले हाईकोर्ट की एकलपीठ ने परीक्षा को रद्द किया था। खंडपीठ ने राज्य की भाजपा सरकार और सफल अभ्यर्थियों के इस तर्क को स्वीकार नहीं किया कि कुछ बेईमानी की सजा सभी अभ्यर्थियों को न दी जाए।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा का कहना रहा कि जब पेपर लीक की बात प्रमाणित हो गई है, तब ईमानदार और बेईमान अभ्यर्थियों को कोई भेद नहीं किया जा सकता है। दोनों न्यायाधीशों ने कहा कि जिस राजस्थान लोक सेवा आयोग की जिम्मेदारी परीक्षा को निष्पक्ष और ईमानदार तरीके से करवानी की जिम्मेदारी थी, उसी आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों ने संदिग्ध भूमिका निभाई।

मालूम हो कि एकलपीठ ने तत्कालीन अध्यक्ष संजय श्रोत्रिय, सदस्य बाबूलाल कटारा, रामूराम रायका, श्रीमती मंजू शर्मा, श्रीमती संगीता आर्य आदि की भूमिका को संदिग्ध माना। यह सही है कि रामूराम रायका को छोड़कर इन सभी सदस्यों की नियुक्ति कांग्रेस के शासन में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने की थी।

जांच एजेंसियों ने प्राथमिक जांच में ही आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की भूमिका को संदिग्ध माना था। अध्यक्ष संजय श्रोत्रिय की नियुक्ति भले ही अशोक गहलोत ने की हो, लेकिन उनका कार्यकाल भाजपा शासन में पूरा हुआ। भाजपा के शासन में संजय श्रोत्रिय बड़े आराम से आयोग से सेवानिवृत्त हो गए। सवाल उठता है कि भाजपा के शासन में संजय श्रोत्रिय के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं हुई? जाहिर है कि भाजपा सरकार में भी ऐसे लोग बैठे हैं, जो संजय श्रोत्रिय को बचाने का काम कर रहे थे।

हाईकोर्ट की एकलपीठ और खंडपीठ का आदेश बताता है कि एसआई भर्ती परीक्षा के प्रश्न पत्र आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की संदिग्ध भूमिका के कारण लीक हुए।अच्छा होता कि भाजपा सरकार में आयोग के ऐसे बेईमान लोगों के खिलाफ कार्यवाही होती।

सब जानते हैं कि अशोक गहलोत ने अपनी सरकार को बचाने के लिए आयोग का भट्टा बैठाया। संजय श्रोत्रिय को आयोग का अध्यक्ष इसलिए बनाया गया कि उन्होंने आईपीएस के पद पर रहते हुए अशोक गहलोत को महत्वपूर्ण सूचनाएं लीक की। श्रीमती संगीता आर्य को इसलिए सदस्य बनाया गया कि वह मुख्य सचिव निरंजन आर्य की पत्नी थी। मंजू शर्मा को सदस्य इसलिए बनाया कि वे प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास की पत्नी थी।

बाबूलाल कटारा ने तो खुद स्वीकार किया है कि वह कांग्रेस के शासन में पैसों की डील कर आयोग के सदस्य बने। सवाल यह भी उठता है कि अब पूर्व सीएम अशोक गहलोत एसआई भर्ती परीक्षा रद्द होने पर कौन सा शास्त्र लिखेंगे? गहलोत इन दिनों अपने कार्यकाल की स्वीकृत योजनाओं की क्रियान्विति को लेकर मौजूदा भाजपा सरकार से इंतजार शास्त्र चलाकर सवाल पूछ रहे हैं। 4 अप्रैल को खंडपीठ के फैसले ने एसआई भर्ती परीक्षा में शामिल बेईमानों के चेहरे पर से नकाब हटा द है।

अशोक गहलोत को अब यह बताना चाहिए कि उन्होंने अपने कौन कौन से स्वार्थ पूरे कर संजय श्रोत्रिय, मंजू शर्मा, संगीता आर्य, बाबूलाल कटारा जैसों की नियुक्ति आयोग में की? भाजपा के शासन में ही संगीता आर्य और मंजू शर्मा भी इस्तीफा देकर चुपचाप चली गई।

तीन माह में 7 नियुक्तियां :

आयोग में अध्यक्ष सहित सदस्यों के 10 पद है। मौजूदा समय में चार पद खाली है। आगामी 19 जून को मौजूदा अध्यक्ष यू.आर. साहू का कार्यकाल भी पूरा हो जाएगा और जुलाई माह में कैलाश मीणा और अशोक कुमार भी सेवानिवृत्त हो जाएंगे।  यानी जुलाई माह में आयोग में अध्यक्ष सहित 7 पद रिक्त होंगे। ऐसी स्थिति में अगले तीन माह में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को आयोग में अध्यक्ष और 6 सदस्यों की नियुक्ति करनी है।

4 अप्रैल को खंडपीठ ने जो फैसला दिया, उसमें यह भी कहा है कि आयोग में गैर राजनीतिक व्यक्तियों की नियुक्तियां होनी चाहिए। इसके साथ ही नियुक्त होने वाले सदस्यों की पृष्ठभूमि की विस्तृत जांच पड़ताल भी होनी चाहिए। देखना होगा कि मुख्यमंत्री शर्मा हाईकोर्ट के आदेश के बाद किस प्रकार से आयोग में नियुक्तियां करते हैं। अभी तक तो कांग्रेस और भाजपा शासन में राजनीतिक नजरिए से ही आयोग में नियुक्तियां होती रही है।

कई बार तो भाजपा और कांग्रेस के पदाधिकारियों को ही आयोग का सदस्य बनाया गया। जो आईएएस और आईपीएस सरकारी सेवा में रहते हुए मुख्यमंत्री के इशारे पर नाचते रहे उन्हें भी आयोग का अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त किया गया। अशोक गहलोत ने तो मुख्यमंत्री रहते हुए आयोग को एक गिरोह के रूप में तब्दील कर दिया। आयोग में अभी भी एक ऐसे सदस्य कार्यरत है जिनकी नियुक्ति के बाद गहलोत को सार्वजनिक तौर पर माफी मांगनी पड़ी थी। नियुक्ति के बाद जब हंगामा हुआ तो गहलोत ने कहा कि उन्हें इस सदस्य की सामाजिक पृष्ठभूमि की जानकारी नहीं थी। हालांकि गहलोत चाहते थे कि यह सदस्य इस्तीफा दे दें, लेकिन पद ग्रहण के बाद संबंधित सदस्य कई दिनों तक भूमिगत हो गए। 

S.P.MITTAL BLOGGER 

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