सीएम हेल्पलाइन की अपार सफलता के बाद जन विश्वास अभियान पोर्टल! हंसना मना है?
संपादकीय : राजेन्द्र सिंह जादौन
मध्यप्रदेश में जनता की समस्याओं के समाधान के लिए एक और नया अध्याय शुरू हो गया है। सीएम हेल्पलाइन की अपार सफलता के बाद अब मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान पोर्टल भी लॉन्च कर दिया गया है। मंत्रालय में पोर्टल का शुभारंभ हुआ और बताया गया कि अभियान के चार सप्ताह सफलतापूर्वक पूरे हो चुके हैं। जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के समन्वय से जन समस्याओं का त्वरित निराकरण हो रहा है।
अधिकारियों के भ्रमण, निरीक्षण, जनसंवाद, उद्यम संवाद, जिला स्तरीय समीक्षा बैठकों, महत्वपूर्ण निर्देशों, नवाचारों और सुझावों की जानकारी अब इस पोर्टल पर दर्ज होगी। इसकी उच्च स्तर पर नियमित समीक्षा होगी और किसी भी स्तर पर लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अधिकारियों को पोर्टल पर नियमित रूप से जानकारी दर्ज करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
सरकारी विज्ञप्ति पढ़कर तो ऐसा लगता है कि मध्यप्रदेश में अब जनता की समस्याएं बस कुछ ही दिनों की मेहमान हैं। अधिकारी दौरा करेंगे, निरीक्षण करेंगे, जनता से संवाद करेंगे, बैठकें होंगी, निर्देश जारी होंगे और फिर पोर्टल पर सब कुछ दर्ज हो जाएगा। यानी अब सरकार के पास जनता की समस्याओं का पूरा डिजिटल हिसाब रहेगा। लेकिन सवाल यह है कि जनता के पास अपनी समस्या के समाधान का हिसाब कब आएगा?
सीएम हेल्पलाइन की सफलता की कहानी जनता ने खूब देखी है। शिकायत दर्ज होती है, शिकायत नंबर मिलता है, शिकायत संबंधित अधिकारी के पास पहुंचती है, अधिकारी जवाब देता है और कई बार सरकारी रिकॉर्ड में शिकायत का निराकरण भी हो जाता है। बस समस्या यह है कि शिकायतकर्ता को पता ही नहीं चलता कि उसकी समस्या कब और कैसे खत्म हो गई। वह जमीन पर समस्या लेकर खड़ा रहता है और सरकारी कागजों में समस्या का समाधान हो चुका होता है। शायद यही सरकारी सफलता का नया पैमाना है जनता परेशान रहे लेकिन पोर्टल पर आंकड़ा मुस्कुराता रहे।
अब नया जन विश्वास अभियान पोर्टल आ गया है। जनता को बताया जा रहा है कि इससे जन समस्याओं का त्वरित निराकरण होगा। सरकार को जनता की समस्याओं पर ध्यान देना ही चाहिए और तकनीक के माध्यम से निगरानी की व्यवस्था करना निश्चित रूप से अच्छी पहल है। लेकिन सवाल तकनीक का नहीं, नीयत और व्यवस्था का है। पोर्टल बदलने से व्यवस्था बदल जाएगी क्या? शिकायत दर्ज करने का माध्यम बदलने से सरकारी कार्यालयों में काम करने का तरीका बदल जाएगा क्या? अगर कोई अधिकारी या कर्मचारी आज भी आम आदमी का काम बिना सिफारिश या बिना किसी लेन-देन के नहीं करता तो नया पोर्टल उसकी मानसिकता कैसे बदलेगा?
मध्यप्रदेश का आम आदमी आज भी तहसील से लेकर नगर निगम तक, पंचायत से लेकर पुलिस थाने तक और छोटे से छोटे सरकारी कार्यालय से लेकर बड़े विभागों तक अपनी समस्या लेकर भटकता दिखाई देता है। किसी की जमीन का नामांतरण अटका हुआ है, किसी की पेंशन अटकी है, किसी का प्रमाणपत्र नहीं बन रहा, किसी को सरकारी योजना का लाभ नहीं मिल रहा, किसी की फाइल महीनों से एक टेबल से दूसरी टेबल घूम रही है। जनता कार्यालयों के चक्कर लगाती है और हर चक्कर के साथ उसके भीतर यह सवाल मजबूत होता जाता है कि आखिर सरकारी काम कराने के लिए इतना परेशान क्यों होना पड़ता है?
और यहीं से रिश्वतखोरी का वह खेल शुरू होता है जिसके खिलाफ सरकारें लगातार कार्रवाई का दावा करती हैं। पिछले वर्षों में लोकायुक्त और अन्य एजेंसियों की कार्रवाई में अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़े जाते रहे हैं। कभी पटवारी, कभी पुलिसकर्मी, कभी इंजीनियर, कभी बाबू और कभी कोई अधिकारी। ट्रैप की खबरें आती हैं, गिरफ्तारी होती है, मामला दर्ज होता है और कुछ समय बाद फिर किसी दूसरे कार्यालय से रिश्वत लेते कर्मचारी के पकड़े जाने की खबर सामने आ जाती है।
सवाल यह नहीं है कि रिश्वत लेते कितने लोग पकड़े गए। असली सवाल यह है कि जो पकड़े गए, उनके पकड़े जाने से पहले कितने लोगों ने उनके सामने मजबूरी में पैसे रखे होंगे? और जो नहीं पकड़े गए, उनकी व्यवस्था कौन देखेगा? हर रिश्वतखोर रंगे हाथ पकड़ा जाए, यह संभव नहीं है। लेकिन जिस व्यवस्था में आम आदमी को अपना वैध काम कराने के लिए भी किसी की सिफारिश खोजनी पड़े, किसी दलाल का सहारा लेना पड़े या यह पूछना पड़े कि साहब से मिलने के लिए किसके माध्यम से जाएं, वहां जन विश्वास की बात थोड़ी हास्यास्पद जरूर लगती है।
जन विश्वास किसी पोर्टल से पैदा नहीं होता। जन विश्वास तब पैदा होता है जब एक गरीब आदमी तहसील में जाए और उसका काम बिना पैसे के हो जाए। जब किसान अपनी जमीन के कागज के लिए महीनों चक्कर न लगाए। जब बुजुर्ग पेंशन के लिए किसी कर्मचारी की मेहरबानी का इंतजार न करे। जब युवा अपना प्रमाणपत्र बनवाने के लिए दलाल की तलाश न करे। जब पुलिस थाने में शिकायत लेकर जाने वाले व्यक्ति को यह महसूस न हो कि उसकी सुनवाई के लिए भी कोई पहचान जरूरी है। जब सरकारी दफ्तर की कुर्सी पर बैठा कर्मचारी यह समझे कि सामने खड़ा नागरिक उसके ऊपर एहसान मांगने नहीं, अपना अधिकार लेने आया है।
सरकार के लिए यह भी जरूरी है कि वह जन विश्वास अभियान पोर्टल पर केवल अधिकारियों की गतिविधियों का रिकॉर्ड न रखे, बल्कि जनता के अनुभव का रिकॉर्ड भी रखे। अधिकारी ने कितने दौरे किए, कितनी बैठकें कीं, कितने निर्देश दिए, यह महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उन निर्देशों के बाद जमीन पर कितना बदलाव आया। कितनी समस्याएं वास्तव में खत्म हुईं और कितनी समस्याएं सिर्फ रिपोर्ट में खत्म हुईं। कितनी शिकायतों में शिकायतकर्ता ने स्वयं माना कि उसका समाधान हुआ और कितनी शिकायतों में विभाग ने अपने स्तर पर समाधान मान लिया।
सरकारें अक्सर आंकड़ों से अपनी सफलता बताती हैं। कितनी शिकायतें आईं, कितनी शिकायतों का निराकरण हुआ, कितनी बैठकें हुईं, कितने अधिकारी मैदान में उतरे, कितने निरीक्षण हुए। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की सफलता का सबसे बड़ा आंकड़ा कोई पोर्टल नहीं होता। सरकार की सफलता का सबसे बड़ा आंकड़ा जनता का अनुभव होता है।
अगर आम आदमी सरकारी कार्यालय से अपना काम करवाकर बाहर निकलते हुए यह कहे कि इस बार उसे किसी अधिकारी की सिफारिश नहीं लगानी पड़ी, किसी कर्मचारी को पैसा नहीं देना पड़ा और उसका काम समय सीमा में हो गया, तो समझिए जन विश्वास अभियान सफल है। इसके लिए किसी पोर्टल पर हरे रंग का आंकड़ा दिखाने की जरूरत नहीं होगी। जनता खुद सरकार को सफलता का प्रमाणपत्र दे देगी।
लेकिन अगर अधिकारी की बैठक होती रहे, निरीक्षण की फोटो आती रहे, पोर्टल पर रिपोर्ट अपलोड होती रहे और जनता अपनी उसी समस्या के साथ महीनों तक घूमती रहे तो फिर यह जन विश्वास नहीं, केवल सरकारी गतिविधियों का डिजिटल दस्तावेज बनकर रह जाएगा।
जनसंवाद का मतलब केवल जनता के बीच जाकर भाषण सुनना नहीं है। जनसंवाद का मतलब है जनता की बात सुनना और उसके समाधान की जिम्मेदारी लेना। निरीक्षण का मतलब केवल मौके पर जाकर फोटो खिंचवाना नहीं है। निरीक्षण का मतलब है कि निरीक्षण के बाद व्यवस्था में सुधार दिखाई दे। समीक्षा बैठक का मतलब केवल अधिकारियों से रिपोर्ट लेना नहीं है। समीक्षा का मतलब यह भी है कि लापरवाही सामने आने पर जिम्मेदारी तय हो और कार्रवाई जमीन पर दिखाई दे।
मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान का नाम बहुत बड़ा है और इसलिए इसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। सरकार को इस अभियान को महज एक और पोर्टल नहीं बनने देना चाहिए। अगर वास्तव में जनता का विश्वास जीतना है तो सरकार को सरकारी कार्यालयों में उस मानसिकता पर चोट करनी होगी जिसमें नागरिक को काम करवाने के लिए बार-बार चक्कर लगाना पड़ता है। उस व्यवस्था पर चोट करनी होगी जहां फाइल तभी तेजी से चलती है जब उसके पहियों में किसी और का पैसा लगाया जाए। उस सोच पर चोट करनी होगी जहां कर्मचारी जनता को अपना ग्राहक और सरकारी कार्यालय को निजी दुकान समझने लगता है।
सीएम हेल्पलाइन के बाद अब जन विश्वास अभियान पोर्टल आ गया है। कल को कोई और पोर्टल आ सकता है। नाम जन समाधान हो सकता है, जन संतोष हो सकता है या जन राहत हो सकता है। पोर्टल आते रहेंगे, बैठकें होती रहेंगी, समीक्षा होती रहेगी, निर्देश जारी होते रहेंगे और सरकारी रिपोर्टें बनती रहेंगी। लेकिन जनता का सवाल वही रहेगा साहब, मेरी समस्या कब खत्म होगी?
जनता को शिकायत नंबर नहीं चाहिए, उसे समाधान चाहिए। जनता को अधिकारी के दौरे की जानकारी नहीं चाहिए, उसे अपने गांव और शहर में बदलाव चाहिए। जनता को समीक्षा बैठक की खबर नहीं चाहिए, उसे सरकारी दफ्तर में सम्मान चाहिए। जनता को पोर्टल पर दर्ज आंकड़े नहीं चाहिए, उसे अपने अधिकार का समय पर मिलना चाहिए।
जन विश्वास का असली पोर्टल जनता का दरवाजा है। वहां कोई लॉगिन नहीं है, कोई पासवर्ड नहीं है और कोई तकनीकी समस्या भी नहीं है। वहां सिर्फ एक सवाल है सरकार ने जनता के लिए क्या किया? इसलिए नए पोर्टल का स्वागत है, बशर्ते यह जनता की समस्या को डिजिटल फाइल में बंद करने के बजाय उसे जमीन पर खत्म करने का माध्यम बने। वरना सीएम हेल्पलाइन के बाद यह भी सरकारी व्यवस्था की एक और उपलब्धि बनकर रह जाएगा, जिसका आंकड़ा सरकार बताएगी और अनुभव जनता अपना बताएगी।
क्योंकि अब जनता इतनी भोली नहीं है कि केवल पोर्टल देखकर विश्वास कर ले। जनता जमीन पर परिणाम देखकर विश्वास करेगी। और अगर परिणाम नहीं बदले तो फिर सवाल उठेगा कि पोर्टल तो बदल गया साहब, लेकिन सरकारी दफ्तरों की कार्यशैली कब बदलेगी? फिलहाल इतना ही कहना है कि मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान शुरू हो चुका है। सरकार को शुभकामनाएं।
उम्मीद है कि इस बार पोर्टल पर सिर्फ अधिकारियों की गतिविधियां दर्ज नहीं होंगी, बल्कि जनता के चेहरे पर आया संतोष भी दिखाई देगा। क्योंकि असली जन विश्वास तब पैदा होगा जब आम आदमी सरकारी दफ्तर से बाहर निकलकर कहेगा मेरा काम हो गया। उस दिन किसी पोर्टल की जरूरत नहीं होगी। तब जनता खुद कहेगी सरकार पर विश्वास किया जा सकता है। तब तक सवाल पूछना हमारा काम है। हंसना मना है… आखिर मामला जन विश्वास का जो है!
एमपी हाईकोर्ट की नई वेबसाइट में आ रही कई तकनीकी दिक्कतें, वकील हो रहे परेशान
बार एसोसिएशन ने वकीलों से भी मांगी जानकारी
तेज कुमार सेन
इंदौर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की वेबसाइट को पुराने पोर्टल से नए पोर्टल पर शिफ्ट किए जाने की प्रक्रिया के बीच वकीलों एवं पक्षकारों को कई तकनीकी और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। बार एसोसिएशन ने भी वकीलों से आ रही दिक्कतों की जानकारी मांगी है।
हाल ही में हाई कोर्ट की नई वेबसाइट बनाई गई है जिसमें अनेक बदलाव किए गए हैं। हालांकि पुरानी वेबसाइट चालू है लेकिन धीरे धीरे उस पर अपडेट्स खत्म किए जा रहे हैं और जल्द ही पुरानी को बंद कर सारे अपडेट्स केवल नई वेबसाइट पर किए जाएंगे। इस नई वेबसाइट पर कई तकनीकी दिक्कते सामने आने की बात कही जा रही है। इनमें जो मुख्य है इसमे नई वेबसाइट पर एडवोकेट-वाइज कॉज लिस्ट से सीधे केस स्टेटस खोलने की सुविधा फिलहाल काम नहीं कर रही है। वहीं एडवोकेट्स लिस्ट में भी केस स्टेटस की सीधी लिंक उपलब्ध नहीं है। कॉज लिस्ट में आई.ए. नंबर सहित अन्य जरूरी जानकारियां नहीं दिख रही हैं तथा कई बार आइटम नंबर भी सही नहीं होते और दोबारा देखने पर बदल जाते हैं। इसी तरह अधिवक्ताओं को कोर्ट फीस जमा होने के बावजूद उसके कंज्यूम नहीं होने से कोर्ट-फीस डिफेक्ट के रूप में मामले सूचीबद्ध होने की समस्या भी आ रही है। ई-डिस्प्ले बोर्ड पर पूरी सूची एक साथ नहीं दिखने से यह पता लगाने में परेशानी हो रही है कि मामला स्थगित हुआ, पासओवर हुआ या अन्य कार्रवाई हुई।
इसके अलावा ईआरपी अपडेट, एनरोलमेंट नंबर से केस खोजने, ई-सर्टिफाइड कॉपी के आवेदन तथा मोबाइल पर बाय-नेम कॉज लिस्ट के असुविधाजनक वर्टिकल फॉर्मेट जैसी समस्याएं भी सामने आई हैं। पुरानी वेबसाइट पर उपलब्ध की वर्ड सर्च और फ्री टैक्स सर्च विकल्प भी नई वेबसाइट में नहीं हैं। हाईकोर्ट बार एसोसिएशन, ने इन समस्याओं को संज्ञान में लिया है। अध्यक्ष मनीष यादव ने सदस्यों से कहा है कि और भी जो अन्य तकनीकी समस्याएं सामने आ रही है इन्हें बार कार्यालय में दर्ज कराएं ताकि पुरानी वेबसाइट बंद होने से पहले सभी समस्याओं को संबंधित अधिकारियों के समक्ष रख कर इसका निराकरण किया जा सके न
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