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भट्टी के धुएं से शिक्षा के उजियारे तक, कलम की अमर विरासत : नैवेद्य पुरोहित

📅 30 August 2026, 08:41 PM • ✍️ नैवेद्य पुरोहित • ⏱️ 7 मिनट में पढ़ें
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भट्टी के धुएं से शिक्षा के उजियारे तक, कलम की अमर विरासत : नैवेद्य पुरोहित
भट्टी के धुएं से शिक्षा के उजियारे तक, कलम की अमर विरासत : नैवेद्य पुरोहित

नैवेद्य पुरोहित

पिछली किस्त में आपने पढ़ा कि कैसे हिम्मतजी जनता के अधिकारों के लिए अंचल में अग्रणी भूमिका निभाते थे। जब रावटी क्षेत्र में महीनों से टेलीफोन लाइनें ठप पड़ी थीं, तो उन्होंने उपभोक्ताओं को एकजुट कर बंद पड़े टेलीफोन की 'अर्थी' सजाकर रतलाम में भोपाल जीएम के काफ़िले के आगे उग्र प्रदर्शन किया था। उसी दिन बंद लाइनें शुरू हुईं और टेलीग्राम के जरिए जब यह ख़बर प्रदेश के अख़बारों में छपी, तो अगले तीन सालों तक अंचल की टेलीफोन सेवा सुचारू रही।

अब पढ़िए उनके प्रेरक सफर का अंतिम अध्याय...

जीवन का चक्र भी बड़ा अजीब और अद्भुत होता है। 11 मार्च 1960 को जन्मे हिम्मतजी के सफर की शुरुआत रतलाम जिले के रावटी गांव में पिता बापूलाल जी ('बापू सेठ') की मिठाई और नमकीन की दुकान से हुई थी। सेव घिसने की भट्टी के धुएं से शुरू हुआ यह जीवन समय के साथ नित-नए आयाम गढ़ता गया। हिम्मतजी का सबसे बड़ा सिद्धांत रहा, "समय के साथ चलना और बदलाव को स्वीकारना।"

मिठाई-नमकीन के व्यापार के बाद उन्होंने किराना व्यवसाय, खाद-बीज और दवाइयों का कारोबार संभाला और शासकीय ठेकेदारी भी की। तकनीकी बदलाव के दौर में वे कभी पीछे नहीं रहे। अंचल में पहला रंगीन टीवी लाना हो, कंप्यूटर क्लासेस की शुरुआत करनी हो, या डिस्क केबल और वीडियो हॉल चलाना हो। उन्होंने समय की नब्ज़ पकड़कर हर नवाचार को सबसे पहले अपनाया। आज वे अपने बेटे के साथ नल-लाइट फिटिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, सीमेंट और हार्डवेयर का सफल जनरल स्टोर संभाल रहे हैं।

लेकिन उनके जीवन का सबसे महान और दूरदर्शी अध्याय तब शुरू हुआ, जब अपने बेटे के रतलाम के स्कूल में एडमिशन न होने की चुनौती सामने आई। हिम्मतजी ने इस समस्या को केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं रहने दिया। उन्होंने अपने मित्र जुहारमल जी के सुपुत्र कांतिलाल जी कटारिया के सहयोग से 'जैन पब्लिक स्कूल' की नींव रखी और पूरे 24 वर्षों तक इसका सफल संचालन किया। इस स्कूल का प्रभाव इतना गहरा रहा कि यहाँ से पढ़कर निकले 11 विद्यार्थी आज एमबीबीएस डॉक्टर के रूप में समाज की सेवा कर रहे हैं, वहीं नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षाओं में भी ब्लॉक के आधे से अधिक बच्चों का चयन इसी विद्यालय से होता रहा।

व्यापार बदला, तकनीक बदली, समाज सेवा के आयाम बदले...पर जो एक चीज़ 41 सालों तक कभी नहीं बदली, वह थी हिम्मतजी की सादगी, ईमानदारी और निष्पक्ष पत्रकारिता। वे खुद कहते हैं कि अंचल में जो प्रतिष्ठा उन्हें मिली, उसमें दैनिक भास्कर और पत्रकारिता का सबसे बड़ा योगदान रहा। 41 सालों के लंबे करियर में उन्होंने इंदौर एडिशन के फ्रंट पेज से लेकर देश भर के ऑल इंडिया एडिशंस तक सैकड़ों धमाकेदार, आंदोलनात्मक और संवेदनशील 'बायलाइन' ख़बरें छापीं।

लेकिन जब उनसे उनकी पुरानी फाइलों या ख़बरों की कटिंग के बारे में पूछो, तो वे मुस्कुराकर सहजता से कहते हैं, "अरे भाई! ना तो कभी कटिंग संभालकर रखी, ना कोई फाइल बनाई। कभी दिमाग में यह प्रदर्शन वाला मामला रहा ही नहीं। जो किया, वो अख़बार और जनता के प्रति फर्ज़ था। ख़बर आई, छपी, बात ख़त्म!"

अपनी उपलब्धियों को लेकर यही निश्छलता और सहजता उन्हें भीड़ से अलग बनाती है। दैनिक भास्कर इंदौर की लॉन्चिंग टीम से जुड़कर मालवा के ग्रामीण अंचल की समस्याओं को इंदौर प्रेस कॉम्प्लेक्स के पन्नों तक पहुँचाने वाले हिम्मत मेहता केवल एक नाम नहीं, बल्कि निष्पक्ष और ज़मीनी पत्रकारिता का एक विचार हैं। उन्होंने दिखाया कि बिना किसी बड़े शहर में रहे, बिना किसी प्रचार की चाह के भी, केवल अपनी साफ़-सुथरी लिखावट, सटीक भाषा और निडर कलम के दम पर पत्रकारिता के सर्वोच्च मानकों को छुआ जा सकता है।

भट्टी की तपन से लेकर इंदौर प्रेस कॉम्प्लेक्स में सागरमल मौलाजी की शाबाशी पाने तक, टेलीफोन सेवाओं की अर्थी निकालने से लेकर 2000 आदिवासियों के आंदोलन की रिपोर्टिंग तक, और 11 डॉक्टरों को गढ़ने वाले स्कूल की स्थापना से लेकर स्वाभिमानी बच्चों की ईंट भट्टी की दास्तान देश भर में पहुँचाने तक। हिम्मतजी का यह सफर मालवा और इंदौर शहर की पत्रकारिता के इतिहास का एक जगमगाता अध्याय है।

वे प्रचार की चकाचौंध से दूर अपने गांव में सुकून की जिंदगी बिता रहे है। सही मायनों में इंदौर शहर की पत्रकारिता के ऐसे 'गुमनाम नायक' हैं, जिनका योगदान हमेशा प्रेरित करता रहेगा।

  • अगली किस्त में पढ़िएगा: मेरी श्रृंखला "इंदौर शहर की पत्रकारिता के गुमनाम नायक" के अगले किरदार अरुण आहूजाजी के बारे में जो दैनिक भास्कर के शुरुआती दौर में कंप्यूटर इंचार्ज थे। उनके सफर को जानने के लिए इंतज़ार कीजिए अगली कड़ी का...।
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