पालीवाल समाज मौन, पक्षपाती मीडिया और सोता तंत्र : दीदी की मृत्यु पर उठते तीखे सवाल : पालीवाल वाणी पर लगाया आरोप
दीदी की मृत्यु पर उठते तीखे सवाल
पालीवाल ब्राह्मण समाज 44 श्रेणी भोपाल के समाजसेवी श्री संतोष जी टपरावत ने पालीवाल वाणी पर तीखा हमला करते हुए न्याय की बात कर रहे है. पत्रकार का लिखना और जारूकता का काम है...लेकिन न्याय तो माननीय न्यायलाय से ही मिलेगा...
जब किसी घर की बेटी या बहन असमय इस दुनिया से चली जाती है, तो केवल एक जीवन का अंत नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की उम्मीदें, खुशियाँ और न्याय की आस टूट जाती है। उससे भी अधिक कष्टकारी तब होता है जब इस त्रासदी के बाद न्याय की रक्षा करने वाला तंत्र मूकदर्शक बन जाता है और समाज के स्वयंभू प्रतिनिधि दोषियों की ढाल बनने लगते हैं।
दीदी की मृत्यु कोई सामान्य घटना नहीं है; यह उन परिस्थितियों और दोषियों की क्रूरता का परिणाम है जिन्होंने उनका जीवन छीना। किंतु इस अक्षम्य अपराध से भी बड़ा अपराध वह है जो इस समय समाज के कुछ संगठन, मीडिया संस्थान और जिम्मेदार पद पर बैठे लोग कर रहे हैं। 'पालीवाल वाणी' जैसा समाचार पत्र, जिससे निष्पक्षता की उम्मीद थी, आज इस पूरे घटनाक्रम पर पर्दा डालने का काम कर रहा है। सच को दबाना और दोषियों का पक्ष लेना पत्रकारिता के सिद्धांतों का हनन है।
इसके साथ ही, समाज का नेतृत्व करने वालों का आचरण आज सबसे बड़े सवालों के घेरे में है। जिस व्यक्ति के दोनों बेटे जेल जा चुके हों और जो स्वयं अत्यंत गैर-जिम्मेदार व विवादित प्रवृत्ति का रहा हो, उस व्यक्ति के साथ पालीवाल समाज के अध्यक्ष का सार्वजनिक रूप से बैठकर भोजन करना... आखिर क्या दर्शाता है? समाज के मुखिया का यह आचरण सीधा सवाल खड़ा करता है:
क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग पीड़ित परिवार के बजाय अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं? समाज का अध्यक्ष किसी एक पक्ष का नहीं, पूरे समाज का होता है, किंतु ऐसे तत्वों के साथ उठना-बैठना उनकी निष्पक्षता और नैतिकता को पूरी तरह कटघरे में खड़ा करता है। समाज के जिम्मेदार प्रतिनिधियों को जनता के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि उनकी निष्ठा न्याय के साथ है या अपराधियों के साथ।
जो सामाजिक संगठन दिन-रात सोशल मीडिया पर समाज हित का ढोंग रचते हैं, उनकी इस पूरे मुद्दे पर चुप्पी और संदिग्ध भूमिका उनकी दोहरी मानसिकता को बेनकाब करती है। जो चेहरे निष्ठा और सामाजिक मूल्यों की दुहाई देते थे, उनका यह मौन और पक्षपात उनके नैतिक पतन को दर्शाता है।
दूसरी ओर, दोषियों पर अब तक कड़ा कानूनी शिकंजा न कसा जाना प्रशासनिक सुस्ती को दिखाता है। साक्ष्य सामने होने के बावजूद कार्रवाई में विलंब होना पीड़ितों के घावों पर नमक छिड़कने जैसा है।
यह लेख केवल एक पुकार नहीं, बल्कि उन चेहरों से नकाब हटाने का प्रयास है जो न्याय की राह में रोड़ा बने हुए हैं।
दीदी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिलेगी जब इस पक्षपात को तोड़कर दोषियों, उनका बचाव करने वाले लोगों, समाचार पत्रों और उनका साथ देने वाले जिम्मेदार सामाजिक पदाधिकारियों को बेनकाब किया जाएगा।
जय चारभुजा नाथ
पालीवाल ब्राह्मण समाज 44 श्रेणी भोपाल के समाजसेवी श्री संतोष जी टपरावत ने पालीवाल वाणी पर तीखा हमला करते हुए न्याय की बात कर रहे है. पत्रकार का लिखना और जारूकता का काम है...लेकिन न्याय तो माननीय न्यायलाय से ही मिलेगा...उनकी सोच है कि पालीवाल वाणी ने कभी भी मुद्वा नहीं उठाया तो आप सबके समाने आनलाईन की गई खबरें...सच आपके समाने...
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