मशीनों और फैक्ट्री में निर्मित कॉर्पोरेट और ब्रांडेड ज्वेलर्स शोरूम सोने की ज्वैलरी और आभूषणों के मेकिंग चार्जेस सोने के रेट के अनुपात में प्रतिशत % में क्यों लेते हैं?
@प्रदीप मिश्रा री डिस्कवर इंडिया न्यूज इंदौर
इंदौर. अधिकांश कॉर्पोरेट और ब्रांडेड ज्वेलरी जैसे टाटा ग्रुप का तनिष्क, मलाबार गोल्ड, कल्याण ज्वेलर्स, बिड़ला ग्रुप का इन्द्रिया, PNG ज्वेलर्स...…आदि की अधिकांश ज्वेलरी मशीनों और फैक्ट्रियों में ही बनाई जाती हैं। इसके बावजूद भी इन कॉर्पोरेट शोरूम पर मेकिंग चार्जेस सोने के बाजार भाव के 10 से लेकर 20 फीसदी तक लिए जाते है! जो सोने की ज्वेलरी और बहुमूल्य आभूषणों को अत्यधिक महंगा कर देते है!
सोना एक मूल्यवान अंतरराष्ट्रीय धातु है, जिसकी बाजार कीमत तो वैश्विक स्तर पर तय होती है और सभी ज्वेलर्स के लिए समान होती हैं। लेकिन सोने से बनायी जाने वाली ज्वेलरी और खूबसूरत आभूषणों के ‘मेकिंग चार्जेस’ पूरी तरह से ज्वेलर्स के हाथ में होते हैं।
पारंपरिक रूप से भारत में हमेशा ‘प्रति ग्राम’ (Per Gram) के हिसाब से ही गढ़ाई या मेकिंग चार्जेस लिया जाता था (जैसे: ₹50 या ₹100 प्रति ग्राम)। लेकिन 1990 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में जब भारत में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियां जैसे टाटा (तनिष्क), रिलायंस, बिड़ला (इंद्रिया) और चैन ऑफ ज्वेलरी शोरूम जैसे कल्याण, मलाबार, PNG, TBZ जैसे ब्रांडेड ज्वेलरी कंपनियों का आगमन हुआ, तो उन्होंने धीरे-धीरे प्रतिशत-आधारित (Percentage-based) मॉडल को बढ़ावा देना शुरू किया।
पिछले 5 वर्षों में सोने की कीमतों में भारी उछाल आया है, लेकिन इसके साथ मेकिंग चार्जेस बढ़ने के पीछे मुख्य कारण “प्रतिशत-आधारित गणना” और बढ़ती परिचालन लागत है।
ज्यादातर कॉर्पोरेट ज्वेलर्स मेकिंग चार्जेस को सोने की कीमत के एक निश्चित प्रतिशत (जैसे 10%, 12%, 15%, 20% या उससे ज्यादा तक) के रूप में तय करते हैं। जब सोने का दाम बढ़ता है, तो वही मेकिंग चार्जेस प्रतिशत के आधार पर गणना करने की वजह से ज्वेलरी और आभूषणों का मूल्य बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
जैसे-जैसे सोने के दाम तेजी से बढ़े, कॉर्पोरेट ज्वेलर्स ने अपने मुनाफे, शोरूम के खर्च, इंश्योरेंस, बैंक लोन और जोखिम (Risk Factor) को मेंटेन करने के लिए इसे सोने की कुल कीमत के प्रतिशत से जोड़ दिया।
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