क्या शिवराज का राजनीतिक करियर समाप्त करना चाहता है पार्टी हाईकमान?
क्या मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के इशारे पर हो रही है केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की उपेक्षा?
क्या वजह है कि शिवराज जैसी लोकप्रियता हासिल करने में विफल हुए हैं मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव?
आदिवासियों का मुद्दा तो बहाना है, असली मकसद तो मोहन यादव को कमजोर करना है
विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन
क्या मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच सब ठीक चल रहा है? क्या मध्यप्रदेश सरकार और केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बीच तालमेल सही बैठ नहीं पा रहा है? पिछले कुछ दिनों से जिस तरह से मध्यप्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रदेश की मोहन सरकार में उपेक्षा हो रही है वह संकेत ठीक दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। यह संकेत साफतौर पर इशारा कर रहे हैं कि भाजपा में अंतर्कलह बुरी तरह से मची हुई है।
वरिष्ठ मंत्रियों और नेताओं सहित कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों में तालमेल जम नहीं पा रहा है जो अब पार्टी की बैठकों में, नेताओं के बयानबाजी में साफतौर पर देखने को मिल रहा है। बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या हो गया है कि मोहन सरकार में वरिष्ठ मंत्रियों, नेताओं को उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है। आखिर ऐसी क्या वजह है कि आलाकमान भी इस ओर ध्यान नहीं दे रहा है। अगर स्थितियां ऐसी ही रहीं तो वह दिन दूर नहीं जब मध्यप्रदेश भाजपा दो हिस्सों में बंट जाएगी और आगामी चुनाव का दृश्य कुछ ओर ही दिखाई देगा।
आखिर क्यों नाराज हुए शिवराज?
मध्यप्रदेश की राजनीति में सक्रिय रूप से 18 वर्षों तक मुख्यमंत्री पद पर रहे शिवराज सिंह चौहान पिछले कुछ समय से मोहन सरकार की कार्यशैली से खासे नाराज दिखाई पड़ रहे हैं। कुछ दिनों पहले विदिशा में एक रैली के दौरान भी शिवराज सिंह चौहान मुख्यमंत्री डॉ. यादव की सरकार के खिलाफ मुखर हो गये थे। इस बार तो हद ही हो गई और शिवराज सिंह चौहान को अपनी पार्टी की सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ा। शिवराज सिंह चौहान लोकप्रिय जननेता हैं और जनता से जुड़ाव उनका साधारण नहीं है। यही कारण है कि जब सीहोर जिले के आदिवासियों के कुछ गांवों को सरकार ने बेरहमी से तोड़ उन्हें बेघर कर दिया तो शिवराज सिंह चौहान को आदिवासियों का यह दर्द देखा नहीं गया और वे उन्हें सहानुभूति देने सीहोर पहुंचे और अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
मुख्यमंत्री डॉ. यादव की हालत पस्त
मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान की लगातार उपेक्षा होते देख मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की हालत पस्त हो गई है। यही कारण है कि इस बार जब शिवराज ने मंच से मोहन सरकार को चेतावनी दी तो वे सीधे मंत्रालय में पहुंचे और अफसरों के साथ बैठकर इस पूरे मामले की जांच कर मामले को शांत करने का आदेश दे दिया। सूत्रों के अनुसार आगामी विधानसभा चुनाव के पहले मोहन यादव को पार्टी आलाकमान का निर्देश मिला है कि मप्र में शिवराज सिंह चौहान की उपेक्षा की जाये और उन्हें यहां ज्यादा सक्रिय न होना दिया जाये। निश्चित ही ऐसे माहौल में कहीं पार्टी आलाकमान को प्रदेश में तीसरे विकल्प पर विचार करना न पड़े।
दोनों नेताओं में है वर्चस्व की लड़ाई
मंत्रालय सूत्रों और पार्टी सूत्रों के अनुसार दोनों ही नेताओं में इन दिनों वर्चस्व की लड़ाई देखने को मिल रही है। दिल्ली के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि प्रधानमंत्री कार्यालय और पार्टी कार्यालय से साफतौर पर आगामी चुनाव के पहले शिवराज सिंह चौहान को किसी राज्य में राज्यपाल के रूप में बैठाने की योजना चल रही है। वहीं शिवराज सिंह चौहान नहीं चाहते है कि वे मप्र की राजनीति से दूर हों इसलिए ही वह लगातार अलग-अलग कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के उद्देश्य से मप्र में सक्रियता बनाये हुए हैं। जबकि शिवराज सिंह चौहान की यह सक्रियता मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को बिल्कुल भी पसंद नहीं आ रही है। दोनों ही नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। अब देखने वाली बात यह है कि आगामी चुनाव के पहले ऊंट किस करवट बैठता है।
क्या शिवराज हाशिये पर जाने को तैयार नहीं हैं?
मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच चल रही खींचतान की एक बड़ी वजह यह भी बताई जा रही है कि पार्टी आलाकमान शिवराज सिंह चौहान के राजनीतिक करियर पर ब्रेक लगाने की योजना पर काम कर रहा है। लेकिन शिवराज यह बिल्कुल नहीं चाहते, इसलिए वे लगातार जल, जंगल, महिला और किसानों के विषयों पर सक्रियता के साथ लाते हैं। ऐसे में देखने वाली बात यह होगी क्या पार्टी आलाकमान मोहन यादव के कंधे पर रखकर जो तीर चला रहा है क्या वह तीर शिवराज सिंह चौहान पर सही ढंग से लगाने में कामयाब होंगे या एक बार फिर चुनाव के पहले शिवराज सिंह चौहान मुखर होकर पार्टी के विरुद्ध खड़े हो जायेंगे।
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