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नवरात्रि में देवी के सामने बोए जवारों का महत्व

धर्मशास्त्र Published by: निशिकांत मंडलो Updated Tue, 30 Sep 2025 12:57 AM
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नवरात्रि में माता की प्रतिमा की स्थापना के साथ ही प्रतिमा के सामने जवारे बोने का विधान सनातन धर्म में प्रचलित हैं। मंदिरों में, घरों में तथा सार्वजनिक रूप से स्थापित माता के पंडालों में जवारे बोए जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि बोए गए जौ के अंकुरण को घर में समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है। लेकिन नवरात्रि के बाद इस जौ का सही उपयोग कैसे करें? इसका भी विधान धर्म गुरुओं द्वारा बताया जाता है।

नवमी या दशमी के दिन जौ की पूजा?

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना और जौ बोने की रस्म निभाई जाती है। शक्ति के इस महापर्व के नौ दिनों तक जौ को पानी पिलाया जाता है और उनकी देखभाल की जाती है। नवरात्रि के दौरान जौ का तेज़ी से बढ़ना घर में बढ़ती समृद्धि और खुशहाली का प्रतीक माना जाता है, क्योंकि जौ को घर की समृद्धि का सूचक माना जाता है। कुछ लोग नवरात्रि के बाद जौ को बिखेर कर छोड़ देते हैं, तो कुछ इसे फेंक देते हैं। लेकिन नवरात्रि के बाद उगे जौ का क्या करें। इसके भी उपाए बताए गए हैं। 

ज्वार के उपाय : जौ हमारे लिए शांति व समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। जवारे हमारे जीवन में कई मायने में महत्व रखते हैं। बताया जाता है कि आर्थिक लाभ के लिए कुछ अंकुरित पत्तियां निकालकर, उन्हें लाल कपड़े में बांधकर अपनी तिजोरी या पर्स में रखें।

बुद्धि व ज्ञान के लिए: बच्चों की पढ़ाई की किताबों में भी इसे रखा जा सकता है। स्वास्थ्य लाभ के लिए: बीमार व्यक्ति के लिए, अंकुरित पत्तियां का रस निकालकर भी सेवन किया जा सकता है, जिससे बीमारी से राहत मिलती है।

नकारात्मकता से मुक्ति : अष्टमी और नवमी तिथि को हवन में अंकुरित पत्तियां डालने से नकारात्मकता दूर होती है और बुरी नजर से बचाव होता है।    

नवरात्रि के बाद, विसर्जन से पहले, देवी दुर्गा की पूजा करके उन्हें प्रसन्न किया जाता है, और फिर ज्वारों को किसी नदी या तालाब में विसर्जित कर दिया जाता है। विसर्जन से पहले, ज्वारों को सिर पर रखकर एक जुलूस भी निकाला जाता है। विसर्जन के बाद, कुछ ज्वारों को घर में धन-स्थान पर रखा जाता है या परिवार के सदस्यों में बांट दिया जाता है। यदि आप जवारे नदी में विसर्जित नहीं कर सकते तो उन्हें पीपल या बरगद के पेड़ के नीचे रख सकते हैं।                                         

  • निशिकांत मंडलोई

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