Special news story : नवरात्रि, अम्बा आमी-सामी लाठियां वखैर गरबे रमवा ने !

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चन्द्रशेखर मेहता

प्रतापगढ़.

चारों और खुशियाँ, उत्साह, उमंग, गरबा गीत की तरंग, दामिनी की द्युति सतरंग !

 क्या माहौल जमता है, संध्या होते ही...! कानों में सबसे पहले ढोलक की थाप, हार-मोनियम की स्वर लहरी, डण्टियों की टच- टच, गरबा गीत गायकों की कोकिल कण्ठी आवाज, साथ ही आधुनिकतम वायलिन, इलेक्ट्रोनिक आर्गन, इकाडियन, वायलिन की मीठी धुन... मन को कितनी मस्ती, संतुष्टि, शांति देती है ....? वाह ! 

इसीलिए वर्ष में दो बार आयोजित होने वाला-- एक ही पर्व है-वो है--"गरबा- महोत्सव "। 'चेती नवरात' और आसोज की नवरात्रि शारदीया नवरात्रि कहलाती है। इसका आयोजन करीब भारत भर में होता, फिर भी बंगाल, पंजाब, गुजरात, मध्यप्रदेश, राजस्थान के गरबा महोत्सव मुख्य हैं। राजस्थान में मेवाड के और मेवाड में इस कांठल प्रदेश के गरबों की तो बात ही कुछ निराली है।

श्री आसावरा माताजी

  " गणपत गरबे रमो तो वेगा आवजो।"

 से प्रारम्भ गरबे नवरात्रि स्थापना से लेकर दशहरा या  पूर्णिमा तक मनाये जाते । प्रतिदिन महिलाओं व पुरुषों के गरबा नृत्य होते । गरबा गीतों में मां भवानी अम्बिके की महिमा, स्तुति, श्रृंगार, कथाएं आदि कथावस्तु होती। माँ को मीठी मनुहार के साथ गरबा नृत्य का न्यौता दिया जाता--

"अम्बा आमी-सामी लाठियां वखैर गरबे रमबा ने ।"

और क्षत्रिय कुल देवी 

बाण माताजी की गरबी--

"बाणमाता, म्हें तो गाऊ आपरी गाथा । गरबे रमवा ने पधारो ओ बाणमाता।"

भादवा माताजी की गरबी ---

 जे हो भादवा महाराणी,

 थारो अमृत पाणी" ।

 माताजी का श्रृंगार गीत--

"म्हारी अम्बा भवानी माय, जोडू थारे पाँय ।

थारा गला में हार प्यारों,

 लागे म्हारी माय ॥

थारी माला में हीरा जडाऊं मोरी माय.....

कुश्माण्डा भवानी..।

थारे माथा पे बिन्दी,

 प्यारी लागे म्हारी माय ।

थारा  टीका में रतन,

 जडाऊं मोरी माय, 

शैलपुत्री भवानी...।

गरबा गीतों में साधक की साधना भी झलकती l "कलकत्ता री कालिका, दरसन दे ! .... 

महामाया भादवा माताजी

भेरव बावजी की गरबी --

जननी रा प्यारा-दुलारा

 भैरव जी, 

दीन दुखी रा सहारा भैरव जी, 

म्हारी विनती पर  ध्यान धरो रे भैरव जी, 

खबरा लाओ कि जननी, कदी   म्हाने लाड लड़ावे ,

प्रतापगढ़ राज्य के राजा राम सिंह जी की गरबी, रावण की गरबी के साथ सब से ज्यादातर प्रसिद्ध गरबी - अष्टमी की गाई जाती है l 

जिसमें स्वयं अम्बा माताजी गरबी खेलने नगर की स्त्रियों के बीच आई थीं l ये घटना गुजरात के पावागढ की है l

जिसमें घटित घटना क्रम में अहंकारी बादशाह को कुल ,वंश सहित नाश का श्राप दिया गया था l 

फिल्म सुहाग की फिल्मी गरबी भी गाई जाती--

"ओ, सबसे बडा तेरा नाम,

 ओ शेरा वाली,

 ऊ'चे डेरा वाली,

 बिगड़े बना दे मेरे काम.....।

 नवरात्रि में हर जगह मेले भरते, विशाल।

चित्तौड़ किले में कालिका माता, आसावरा माता, निकुम्भ, भंवर-माता (छोटीसादड़ी) बाणमाता, राजराजेश्वरी अंबा माताजी (प्रतापगढ़), अम्बा माताजी, बमोतर,  कामाख्या माता, शीतलामाता, कालिका माताजी कोठी(अरनोद), अम्बामाता (निम्बाहेड़ा), अंबा माता जी, मेणार, दुर्गा माँ, नालछा माता, (मन्दसौर) पुराने समय से  प्रसिद्ध है l 

आंतरी माताजी, मनासा के पास  देश का एकमात्र एसा मंदिर है, जहा जीभ (जिव्हा) की बलि चढती है, आज भी और माता जी का चमत्कार कि भक्त की  जीभ वापस  एक सप्ताह मे आ जाती। 

मेवाड के सलूंबर मे एक मात्र माताजी का मंदिर है- इडाणा माता जी। जो अग्नि स्नान करती। जोगणिया माता, मरमी माता, चित्तोडगढ मे माताजी के प्रसिद्ध  मंदिर है।पाँवागढ़ गुजरात तथा यहीं आबू रोड़ के पास दुर्गम पहाडियों में अम्बाजी मन्दिर में लाखों की संख्या में नर- नारी दर्शन करते। आश्चर्य कि माँ भगवती की मूति प्रतिदिन रुप बदलती हैं। देवी के प्रसिद्ध मन्दिरो मे बंगाल में कालिका माता जी मे लाखों लोग पूजा करते,  विजयादशमी के दिन दुर्गा का जुलूस निकालते एवं उसे गंगा में प्रवाहित करते। 

हमारे यहां ज्योति कलश को शीतला माँ के मन्दिर में मंगल करते है। नवरात्रि में गरबों  में  धार्मिक झांकियां भी रोजाना नई-नई बनाई जाती है। शानदार विद्युत सज्जा की जाती। भाटपुरा में गरबी गायक अशोकराव, धोबी चौक मे श्याम टांक, चन्द्र प्रकाश सुथार, गरबी गायको मे प्रसिद्ध है l 

प्रतापगढ़ में 50 वर्षों से यहां की भाषा में जो गरबियां गाई जाती, वो स्व. भेरु लाल शर्मा द्वारा लिखी गईl जो माताजी और भक्तों मे आपसी भावात्मक संबंध स्थापित कर देती l सुनने वाले भाव विभोर हो जाते l

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