राजीव से राहुल तक- युवाओं पर विश्वास की विरासत
विजया पाठक, एडिटर, जगत विजन
भारत की राजनीति में युवाओं को केवल भविष्य कहने की परंपरा पुरानी है, लेकिन उन्हें वर्तमान में अधिकार, अवसर और निर्णय की ताकत देने का साहस कुछ ही नेताओं ने दिखाया। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कमलनाथ जब स्व. राजीव गांधी के दौर को याद करते हैं तो उनकी स्मृतियों में एक ऐसे प्रधानमंत्री की तस्वीर उभरती है, जिसने समय से बहुत पहले युवा भारत की क्षमता और आने वाली तकनीकी दुनिया को पहचान लिया था।
आज राहुल गांधी की ‘छात्रों की गूंज’ पहल में कमलनाथ उसी सोच और विरासत का नया स्वरूप देखते हैं। कमलनाथ कहते हैं कि राजीव गांधी को उन्होंने बेहद करीब से देखा और उनके साथ काफी काम किया। राजीव जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे केवल उस समय के भारत के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि उस भारत की कल्पना करते थे जो आने वाले 20-30 वर्षों में बनने वाला था।
उनकी इस कल्पना के केंद्र में भारत का युवा था। यही कारण था कि राजीव गांधी ने युवाओं को केवल भाषणों में महत्व नहीं दिया, बल्कि उन्हें अधिकार और अवसर देने वाले ऐतिहासिक फैसले किए। उनके कार्यकाल में मतदान की न्यूनतम आयु 21 वर्ष से घटाकर 18 वर्ष की गई। इसके पीछे सोच साफ थी- यदि 18 वर्ष का युवा देश के भविष्य की जिम्मेदारी उठा सकता है तो उसे देश की सरकार चुनने में भी भागीदारी मिलनी चाहिए। यह फैसला केवल मतदान की उम्र घटाने का नहीं था, बल्कि करोड़ों युवाओं पर विश्वास व्यक्त करने का निर्णय था।
इसी सोच का दूसरा बड़ा अध्याय था भारत में कंप्यूटर, सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के विस्तार को गति देना। उस समय कंप्यूटर को लेकर आशंकाएं थीं, लेकिन राजीव गांधी आने वाले समय को देख रहे थे। उन्होंने तकनीक को रोजगार का विरोधी नहीं, बल्कि युवाओं के लिए नए अवसरों का माध्यम माना। बाद के दशकों में भारत जिस तरह सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर और दूरसंचार के क्षेत्र में दुनिया की प्रमुख शक्तियों में शामिल हुआ, उसकी बुनियाद तैयार करने में उस दौर की नीतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
आज करीब चार दशक बाद युवा भारत के सामने चुनौतियों का स्वरूप बदल गया है। तकनीक के अवसर बढ़े हैं तो प्रतिस्पर्धा भी कई गुना बढ़ी है। शिक्षा महंगी हुई है, प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर सवाल उठते हैं, रोजगार की चिंता है और भविष्य को लेकर असुरक्षा भी है। ऐसे समय में कमलनाथ राहुल गांधी की उस पहल को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसमें नेता मंच से युवाओं को केवल सुनाता नहीं, बल्कि मंच युवाओं को सौंपकर स्वयं उनकी बात सुनता है।
इस पहल का नाम है: ‘छात्रों की गूंज’
पुणे में आयोजित ‘छात्रों की गूंज’ में राहुल गांधी ने विद्यार्थियों, विशेषकर छात्राओं से सीधे संवाद किया। शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं, करियर, सुरक्षा, सामाजिक दबाव और आदिवासी विद्यार्थियों की समस्याओं तक अनेक मुद्दे युवाओं ने उनके सामने स्वयं रखे। अब 19 सितंबर को यही संवाद इंदौर में होने जा रहा है। ‘छात्रों की गूंज’ की विशेषता यही है कि यह परंपरागत राजनीतिक सभा से अलग संवाद का मंच बनाने का प्रयास है। यहां सवाल नेता तय नहीं करता, युवा अपनी समस्या स्वयं बताता है।
वह बता सकता है कि उसकी पढ़ाई में क्या बाधा है, प्रतियोगी परीक्षाओं में उसे किन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, रोजगार को लेकर उसकी चिंता क्या है और आखिर कौन-सी परिस्थितियां उसे अपने सपनों तक पहुंचने से रोक रही हैं। ऐसे संवाद का महत्व केवल किसी समस्या को सुन लेने तक सीमित नहीं है। जब देश के अलग-अलग हिस्सों के विद्यार्थी अपनी समस्याएं सीधे राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने रखते हैं तो स्थानीय दिखने वाली अनेक समस्याएं राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन सकती हैं। नीति बनाने वालों को आंकड़ों के पीछे छिपी वास्तविक जिंदगी सुनाई देती है और युवाओं को यह भरोसा मिलता है कि लोकतंत्र में उनकी भूमिका केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है- उनकी बात, उनका अनुभव और उनके सुझाव भी मायने रखते हैं।
कमलनाथ को राहुल गांधी के इस प्रयास में राजीव गांधी की राजनीतिक विरासत की निरंतरता दिखाई देती है, राजीव गांधी ने 18 वर्ष के युवा से कहा था- देश की सरकार चुनने में तुम्हारी आवाज महत्वपूर्ण है. आज राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ के माध्यम से नई पीढ़ी से मानो कह रहे हैं। देश का भविष्य तय करने में तुम्हारी समस्या, तुम्हारा सवाल और तुम्हारा सुझाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। दोनों समय अलग हैं, चुनौतियां अलग हैं और संवाद के माध्यम भी बदल चुके हैं, लेकिन मूल भावना वही है- युवा पर विश्वास।
कांग्रेस ने युवाओं को जोड़ा और आगे बढ़ाया
कांग्रेस के इतिहास को देखें तो युवा शक्ति पर यह भरोसा नया नहीं है। राजीव गांधी ने युवाओं को लोकतांत्रिक अधिकार और आधुनिक तकनीक से जोड़ा। बाद के वर्षों में कांग्रेस की सरकारों ने शिक्षा, कौशल और रोजगार से जुड़े कार्यक्रमों के माध्यम से इस दिशा को आगे बढ़ाया। कमलनाथ की नजर में यह केवल एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण संदेश है' नई पीढ़ी को निर्देश देने से पहले उसे सुनना होगा।
भारत आज दुनिया के सबसे युवा देशों में है। इस युवा शक्ति को यदि अच्छी शिक्षा, आधुनिक कौशल, सुरक्षित वातावरण, रोजगार के पर्याप्त अवसर और अपनी बात रखने का मंच मिले तो यही पीढ़ी आने वाले दशकों में भारत की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। राजीव गांधी ने जिस युवा भारत पर चार दशक पहले भरोसा किया था, राहुल गांधी आज उसी विश्वास को नई पीढ़ी के सवालों और आकांक्षाओं से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। राजीव गांधी के लिए वह विश्वास भारत का युवा था और कमलनाथ को राहुल गांधी की इस पहल में उसी विश्वास की गूंज सुनाई देती है- ‘छात्रों की गूंज’।