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अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस : 300 रोज की मजदूरी करते मोक्ष को प्राप्त हुए धार तिरला हादसे के मजदूरों को श्रद्धांजलि

आपकी कलम Published by: paliwalwani Updated Fri, 01 May 2026 02:30 PM
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क्या खोया क्या पाया जग में... मिलते और बिछड़ते मग में...! 

मुझे किसी से नहीं शिकायत... यद्यपि छला गया पग पग में...!

डॉ. दीपक जैन घाटाबिल्लोद...✍️

मजदूर दिवस के पावन अवसर पर, जब दुनिया भर के 'सफेदपोश' लोग एयर-कंडीशनर की ठंडी हवा में बैठकर पसीने की महिमा गा रहे हैं, पेश है मजदूरों की बदहाली और उनकी हाड़-तोड़ मेहनत पर एक पीड़ा

मजदूर दिवस : पसीने का तमाशा और तालियों की गड़गड़ाहट

आज 1 मई है। वह ऐतिहासिक दिन जब साल भर मजदूरों का खून चूसने वाला तंत्र, एक दिन के लिए 'मजदूरों का सम्मान' करने का नाटक करता है। आज के दिन बड़े-बड़े होटलों में 'मजदूरी की गरिमा' पर भाषण दिए जाएंगे, जहाँ वक्ता के कोट की कीमत एक मजदूर की छह महीने की दिहाड़ी के बराबर होगी।

1. बदहाली का 'ब्रांड एंबेसडर'

असली मजदूर वह है जिसे यह भी नहीं पता कि आज उसकी छुट्टी है। वह आज भी उसी चौराहे पर खड़ा है, हाथ में बसूला या कन्नी लिए, इस उम्मीद में कि कोई 'शोषक' आए और उसे आज की रोटी के बदले पसीने बहाने का मौका दे।

मजदूर की बदहाली अब देश की 'विजुअल एस्थेटिक्स' का हिस्सा बन चुकी है। फोटोग्राफर उसके फटे हुए कपड़ों और उभरी हुई पसलियों की 'हाई-डेफिनिशन' फोटो खींचते हैं ताकि उसे "संघर्ष की सुंदरता" (Beauty of Struggle) कहकर इंस्टाग्राम पर लाइक बटोरे जा सकें। मजदूर की गरीबी अब पेट का सवाल नहीं, बल्कि आर्ट गैलरी की पेंटिंग बन गई है।

2. मेहनत का 'म्युचुअल फंड'

दुनिया का सबसे बड़ा चमत्कार देखिए—जो आलीशान महल बनाता है, वह खुद फुटपाथ पर सोता है; जो अनाज उगाता है, वह खुद आधा पेट सोता है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे 'लेबर इनपुट' कहते हैं, लेकिन असल में यह वह म्युचुअल फंड है जिसका प्रीमियम मजदूर भरता है और उसका 'रिटर्न' मालिक की सात पुश्तें खाती हैं।

  • कड़वा सच: > मजदूर की मेहनत से बनी सड़क पर जब साहब की गाड़ी गुजरती है और कीचड़ मजदूर पर ही गिरता है, तो साहब उसे "सभ्यता की कमी" कहते हैं।

3. 'सुरक्षा कवच' का मजाक

मजदूरों की सुरक्षा के लिए बड़े-बड़े कानून हैं। हेलमेट है, बीमा है, और न जाने क्या-क्या है। पर हकीकत ये है कि एक मजदूर के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच उसकी 'मजबूरी' है। उसे पता है कि अगर वह गिरेगा, तो उसकी जगह लेने के लिए पीछे सौ और खड़े हैं। तंत्र ने बेरोजगारी को इतना सुलभ बना दिया है कि अब मौत भी 'रिप्लेसेबल' (बदली जा सकने वाली) हो गई है।

4. आज के दिन का 'मेनू'

आज शाम को टीवी पर बहस होगी कि मजदूरों की हालत कैसे सुधरे।

पैनलिस्ट 1: जिसकी कंपनी में ओवरटाइम के पैसे नहीं मिलते।

पैनलिस्ट 2: जिसका घर एक मजदूर की जमीन हड़प कर बना है।

ये सब मिलकर तय करेंगे कि मजदूर को दो रोटी के साथ थोड़ा 'सम्मान' भी देना चाहिए। सम्मान—जो पेट नहीं भरता, लेकिन डकार लेने का एहसास जरूर करा देता है।

उपसंहार : मजदूर दिवस की असली सफलता यही है कि मजदूर अब भी मजदूर है। अगर उसकी हालत सुधर गई, तो इंकलाबी कविताएं कौन लिखेगा? रैलियों में भीड़ कौन जुटाएगा? और बड़े-बड़े पुलों के नीचे अपनी झोपड़ी कौन सजाएगा?

इसलिए, आइए हम सब मिलकर जोर से चिल्लाएं— "मजदूर एकता जिंदाबाद!" (लेकिन कृपया चिल्लाते समय ध्यान रखें कि आपकी आवाज बगल में सो रहे उस थके हुए मजदूर की नींद न खराब कर दे, जिसे कल सुबह फिर आपकी तरक्की के लिए ईंटें ढोनी हैं।)

मजदूरों को सलाम, क्योंकि उनके पास सलाम सुनने का वक्त नहीं है!

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