वाणी साहित्य उत्सव में डॉ. मनमोहन वैद्य ने रखा भारतीय ‘स्व’ और वैश्विक कल्याण का दृष्टिकोण
इंदौर. वाणी साहित्य उत्सव के मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य एवं पूर्व सह-सरकार्यवाह तथा चर्चित पुस्तक ‘वी द वर्ल्ड अराउंड’ के लेखक डॉ. मनमोहन वैद्य के साथ प्रख्यात साहित्यकार एवं संवादकर्ता अदिति माहेश्वरी ने सारगर्भित संवाद किया। इस अवसर पर डॉ. वैद्य ने भारतीय ‘स्व’, शिक्षा के उद्देश्य, भारतीय कालगणना, सांस्कृतिक चेतना, वैश्विक मानवता और भारत की सार्वभौमिक दृष्टि पर अपने विचार साझा किए।
संवाद के दौरान डॉ. वैद्य ने कहा कि भारतीय समाज धीरे-धीरे अपनी कालगणना और सांस्कृतिक परंपराओं से दूर होता जा रहा है। उन्होंने संकेत किया कि अधिकांश लोग अपनी जन्मतिथि अंग्रेज़ी कैलेंडर के अनुसार बताते हैं, जबकि भारतीय पंचांग वैज्ञानिक खगोलशास्त्रीय सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होंने आग्रह किया कि रामनवमी, जन्माष्टमी, शिवरात्रि और विजयादशमी जैसे पर्वों की तरह जन्मदिन एवं वैवाहिक वर्षगांठ भी तिथि के अनुसार मनाने की परंपरा को पुनर्जीवित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि आधी रात को केक काटने की परंपरा के स्थान पर ब्रह्ममुहूर्त में जागकर बड़ों का आशीर्वाद लेना और जीवन के लिए श्रेष्ठ संकल्प करना भारतीय सांस्कृतिक स्वत्व को सुदृढ़ करता है।
शिक्षा और जीवन के उद्देश्य पर अपने विचार रखते हुए डॉ. वैद्य ने कहा कि यदि शिक्षा केवल आजीविका अर्जित करने तक सीमित रह जाए तो जीवन ठहरे हुए जल की भांति हो जाता है। वास्तविक शिक्षा व्यक्ति को उद्देश्य प्रदान करती है और उसे निरंतर प्रवाहमान बनाती है। उन्होंने कहा कि पढ़ने का ध्येय केवल आर्थिक उन्नति नहीं, बल्कि भारत के मर्म को समझना, उसके मूल्यों को आत्मसात करना और राष्ट्र निर्माण में योगदान देना होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वाधीनता, स्वतंत्रता और स्वराज्य की अवधारणा के केंद्र में भारतीय ‘स्व’ निहित है, जिसकी आधारशिला अध्यात्म और उदात्त जीवन-दृष्टि है।
भारत की आध्यात्मिक परंपरा की चर्चा करते हुए डॉ. वैद्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति का मूल स्वभाव समावेशी है। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय चिंतन में ‘बहिष्कार’ की संकीर्ण मानसिकता नहीं, बल्कि समस्त मानवता के कल्याण का भाव है। उन्होंने मंदिरों में होने वाले उद्घोष "धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भाव हो, विश्व का कल्याण हो" का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय दृष्टि किसी विशेष समुदाय तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि के मंगल की कामना करती है। इसी कारण भारत ने इतिहास में कभी ‘हम और वे’ की विभाजनकारी सोच को स्वीकार नहीं किया।
भारत की ऐतिहासिक समृद्धि और वैश्विक योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि विश्व पर भारत का प्रभाव कभी शक्ति, विस्तारवाद या शोषण पर आधारित नहीं रहा। उन्होंने अर्थशास्त्री एंगस मैडिसन के शोधों का संदर्भ देते हुए बताया कि पहली से सत्रहवीं शताब्दी तक वैश्विक व्यापार में भारत की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी थी। वस्त्र, धातु, इत्र तथा चर्म उद्योग जैसे क्षेत्रों में भारत अग्रणी था। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज में परिवार उत्पादन की मूल इकाई था, जहाँ पुरुष व्यापारिक यात्राएं करते थे और महिलाएँ उत्पादन व गृह-प्रबंधन की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं।
यही कारण है कि भारतीय लोकजीवन और लोकगीतों में अपनत्व, प्रतीक्षा और संवेदनशीलता की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। डॉ. वैद्य ने इस बात पर विशेष बल दिया कि भारत ने कभी अन्य देशों को लूटने, उपनिवेश बनाने या धर्मांतरण के माध्यम से अपने प्रभाव का विस्तार नहीं किया। भारत ने सदैव ज्ञान, कृषि, व्यापार और जीवन-दर्शन को दुनिया के साथ साझा करने का मार्ग अपनाया।
कोविड-19 महामारी के दौरान भारतीय समाज की सेवा-भावना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जब लाखों प्रवासी श्रमिक अपने घरों की ओर लौट रहे थे और संक्रमण का भय चरम पर था, तब देशभर में नागरिकों, परिवारों और समाज ने स्वस्फूर्त रूप से भोजन, पानी और आश्रय उपलब्ध कराने का कार्य किया। उन्होंने कहा कि यह सेवा-भाव किसी कानून या दंड के भय से नहीं, बल्कि भारतीय संस्कारों से प्रेरित है। भारतीय दृष्टि भाषा, क्षेत्र और परिस्थिति की सीमाओं से ऊपर उठकर समस्त मानवता में एक ही चेतना का दर्शन करती है।
डॉ. वैद्य ने कहा कि भारत का वास्तविक ‘स्व’ उसकी आध्यात्मिक एकात्मता, समावेशी दृष्टि और विश्व-कल्याण की भावना में निहित है। इसी चेतना को समझना और जीवन में उतारना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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