चंदा सहयोग है, मजबूरी नहीं...त्योहार हमारी आस्था, संस्कृति और एकता के प्रतीक
व्यापारी को केवल चंदे के समय याद करना भी उचित नहीं। जब व्यापार बढ़ाने, ग्राहक बढ़ाने या किसी परेशानी में सहयोग की जरूरत होती है, तब भी समाज और स्थानीय संगठन आगे आएँ—सहयोग दोतरफा होना चाहिए।
और एक महत्वपूर्ण बात—
जनता से लिया गया चंदा जनता के प्रति जवाबदेह भी होना चाहिए।
कितना चंदा प्राप्त हुआ, कहाँ से प्राप्त हुआ और आयोजन के बाद कितना व कहाँ खर्च हुआ—इसका स्पष्ट एवं पारदर्शी विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
आज हर गली-मोहल्ले में अनेक आयोजन और बड़े-बड़े पंडाल होते हैं।
ऐसे में नागरिक और दुकानदार के मन में एक स्वाभाविक सवाल उठता है—
“सालभर में कितनी बार चंदा दें और हर बार कितना दें?”
आइए, त्योहारों की खुशी को बनाए रखें और ऐसी व्यवस्था बनाएं जिसमें—
चंदा स्वैच्छिक हो,
रकम सामर्थ्य के अनुसार हो,
कोई दबाव न हो,
और हिसाब पूरी तरह पारदर्शी हो।
जागरूक नागरिक • जिम्मेदार आयोजन • पारदर्शी व्यवस्था
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