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अजमेर का मेयर पद अनारक्षित यानि सामान्य महिला के आरक्षित : भाजपा का इस वर्ग की राजनीतिक उपेक्षा का इतिहास

📅 13 August 2026, 07:55 PM ✍️ paliwalwani ⏱️ 7 मिनट में पढ़ें
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अजमेर का मेयर पद अनारक्षित यानि सामान्य महिला के आरक्षित : भाजपा का इस वर्ग की राजनीतिक उपेक्षा का इतिहास
अजमेर का मेयर पद अनारक्षित यानि सामान्य महिला के आरक्षित : भाजपा का इस वर्ग की राजनीतिक उपेक्षा का इतिहास

सामान्य वर्ग को मिलना चाहिए उसका अधिकार 

ओम माथुर

अजमेर की मेयर लगातार दूसरी बार ही महिला बनेगी। आरक्षण की लॉटरी में अजमेर निगम का मेयर पद अनारक्षित महिला के लिए आया है। इसका अर्थ ये हुआ कि यहां कोई भी महिला पार्षद मेयर बन सकती है। वैसे अनारक्षित सीट को प्रायः सामान्य वर्ग के लिए माना जाता है,लेकिन निकाय चुनाव में सामान्य वर्ग की सीट (वार्ड) पर एससी, एसटी,ओबीसी के प्रत्याशी भी चुनाव भी लड़ सकते हैं और निकाय प्रमुख भी बन सकते हैं।

लेकिन इसके उलट इन वर्गों के लिए आरक्षित सीट पर सामान्य वर्ग का कोई भी व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ सकता है। लोकसभा एवं विधानसभा में भी सामान्य सीटों पर इन वर्गों के उम्मीदवार चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे में अजमेर में सामान्य वर्ग को क्या इस बार उसका हक मिलेगा,यह सवाल अभी से उठने लगा है। 

सामान्य सीट,लेकिन ओबीसी को पद : इसके पीछे कारण अजमेर नगर परिषद/नगर निगम का इतिहास भी है, जहां सामान्य वर्ग के लिए सभापति/मेयर का पद आरक्षित होने के बावजूद इस पर ओबीसी वर्ग के व्यक्ति को भाजपा ने मेयर बनाया। 2005 में जब अजमेर नगर परिषद थी,तो यहां का सभापति पद सामान्य वर्ग के लिए खुला था।  लेकिन भाजपा ने ओबीसी धर्मेंद्र गहलोत को सभापति बनाया।

फिर 2008 में परिषद को निगम का दर्जा मिला। तो गहलोत सभापति की जगह मेयर हो गए। 2010 में जब पहली बार नगर निगम के चुनाव हुए, तो मेयर पद एससी पुरुष वर्ग के लिए आरक्षित हुआ और पहली बार पार्षदों की बजाय जनता ने सीधे मतदान से मेयर चुना और कमल बाकोलिया पहले निर्वाचित मेयर बने। उसके बाद जब 2015 में वापस मेयर पद की लॉटरी सामान्य वर्ग के लिए खुली, तब भी भाजपा ने गहलोत को ही फिर मेयर बनाया। इससे पहले भी जब 1990 में सभापति का पद जनरल कोटे के लिए था,तब भाजपा ने ओबीसी वर्ग के रतन लाल यादव को सभापति बनाया था।

महज 1995 से 2000 के बीच का कार्यकाल ऐसा रहा,जब सामान्य वर्ग की सीट पर पहले वीर कुमार सभापति बने हुए उनके निधन के बाद कुछ समय के लिए सुरेंद्र सिंह शेखावत सामान्य वर्ग के ही रहे। यानी करीब 25 साल (2000 से 2026) से नगर परिषद / निगम में सामान्य वर्ग का कोई सभापति/मेयर नहीं बना है।

उपेक्षा की भाजपा ज्यादा जिम्मेदार : अजमेर को भाजपा का गढ़ माना जाता है। लेकिन उसी भाजपा ने यहां सामान्य वर्ग की उपेक्षा करने में कोई अजमेर कसर नहीं छोड़ी। अजमेर की दोनों विधानसभा सीटें उत्तर और दक्षिण आरक्षित है। उत्तर अघोषित रूप से और दक्षिण घोषित रूप से। दक्षिण जहां एससी के लिए आरक्षित हैं, वही उत्तर को भाजपा ने सिंधियों के लिए अघोषित रूप से आरक्षित कर रखा है। ऐसे में अजमेर से सामान्य वर्ग के नेता का विधायक बनना सपना बनकर रह गया। भाजपा ने अजमेर उत्तर,जो पहले अजमेर पश्चिम कहलाता था,से आज तक कभी किसी गैर सिंधी दावेदार को टिकट नहीं दिया है। कांग्रेस भी पहले यहां से सिंधी उम्मीदवार ही उतारा करती थी। लेकिन पिछले कुछ चुनावों में उसने गैर सिंधी पर दांव खेलने का प्रयास किया। लेकिन उसके उम्मीदवार डॉक्टर श्रीगोपाल भारती और महेंद्र सिंह रलावत चार चुनावों में नाकाम रहे। फिलहाल उत्तर से विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी 2003 से लगातार पांच बार विधायक चुने जा रहे हैं। जबकि दक्षिण में अनिता भदेल का भी तब से कब्जा है। 

लोकसभा में भी ओबीसी : 2024 में हुए लोकसभा चुनाव में भी अजमेर सीट सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित थी। लेकिन यहां से भाजपा ने ओबीसी वर्ग के भागीरथ चौधरी को टिकट दिया था,जो अभी केंद्रीय मंत्री हैं। यानी ना सांसद और ना विधायक सामान्य वर्ग से बन पा रहा है और जब मेयर बनने का मौका मिलता है ,तो भी भाजपा दूसरे वर्ग के दावेदार को थोप देती है।

देवनानी ने बनवाया था गहलोत को : वैसे ये भी तथ्य है कि जब धर्मेंद्र गहलोत दोनों बार सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित सभापति और मेयर की सीट पर काबिज हुए, तो उसके पीछे विधायक वासुदेव देवनानी की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी। तब गहलोत को देवनानी का सबसे विश्वस्त माना जाता था। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में इन दोनों के बीच ऐसी दरार पड़ी की अब दोनों एक दूसरे के विरोध में खड़े हैं। अपने राजनीतिक प्रभाव से देवनानी ने गहलोत को शहर भाजपा की राजनीति में हाशिए  पर ला दिया है।

इस बार चाहिए भरोसा : ऐसे में ये सवाल वाजिब है कि क्या अब मेयर पद पर सामान्य वर्ग की महिला को ही बैठाया जाएगा या भाजपा और कांग्रेस में से जो भी निगम में बहुमत पाएगा, वह किसी और वर्ग की महिला को थोप देगा। सामान्य वर्ग के मतदाताओं को भी दोनों दलों के नेताओं से यह भरोसा लेना एकदूसरे चाहिए कि सामान्य सीट पर इसी वर्ग की महिला को बैठाया जाएगा। वरना एक बार फिर अजमेर का सामान्य वर्ग ठग लिया जाएगा।

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