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कलम की खुद्दारी, ज़मीन की सच्चाई और बेखौफ़ पत्रकारिता : वरिष्ठ पत्रकार राजू मिश्र जी से एक मुलाकात~ नैवेद्य पुरोहित

📅 27 October 2026, 09:31 PM • ✍️ paliwalwani • ⏱️ 21 मिनट में पढ़ें
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कलम की खुद्दारी, ज़मीन की सच्चाई और बेखौफ़ पत्रकारिता : वरिष्ठ पत्रकार राजू मिश्र जी से एक मुलाकात~ नैवेद्य पुरोहित
कलम की खुद्दारी, ज़मीन की सच्चाई और बेखौफ़ पत्रकारिता : वरिष्ठ पत्रकार राजू मिश्र जी से एक मुलाकात~ नैवेद्य पुरोहित

वरिष्ठ पत्रकार राजू मिश्र जी से एक मुलाकात, जिसने पत्रकारिता को देखने का नज़रिया और गहरा किया

कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो सोचने का नज़रिया बदल देती हैं। बीते इतवार 25 अक्टूबर 2026 को मेरी मुलाकात ऐसे ही एक शख्सियत से हुई जो हिंदी पत्रकारिता में प्रिंट मीडिया के इतिहास में रेड इंक अवॉर्ड जीतने वाले पहले पत्रकार रहे, पूरा नाम है राजनारायण "राजू" मिश्र।

ये जानना बेहद ज़रूरी है कि मुंबई प्रेस क्लब के प्रतिष्ठित रेड इंक अवॉर्ड पर सालों तक अंग्रेजी मीडिया का दबदबा रहा था। हिंदी के बड़े-बड़े नामांकन जाते थे, पर राष्ट्रीय स्तर की इस प्रतिस्पर्धा में जीत अक्सर अंग्रेजी के खाते में ही जाती थी। इस परंपरा को तोड़ा राजू मिश्र जी ने। साल 2017 में बुंदेलखंड के भीषण सूखे पर उनकी 8-भाग की ज़मीनी खोजी रिपोर्ट ने 'पर्यावरण' कैटेगरी में जीत हासिल की और वे हिंदी प्रिंट मीडिया के पहले पत्रकार बने जिन्हें ये सम्मान मिला। ये सम्मान उन्हें तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के हाथों मिला।

पत्रकारिता मेरे लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक विरासत है। मेरे परदादाजी पालीवाल ब्राह्मण समाज इंदौर के प्रथम पत्रकार स्वर्गीय गणेशचन्द्रजी पुरोहित और मेरे परिवार की पत्रकारिता से जुड़ी यात्रा ने बचपन से ही मुझे समाचारों, समाज और सार्वजनिक जीवन को करीब से देखने की प्रेरणा दी है। आज, जब मैं स्वयं पत्रकारिता के साथ पॉलिटिकल कंसल्टिंग के क्षेत्र में सक्रिय हूँ, तब किसी ऐसे पत्रकार से मिलना, जिसने दशकों तक समाचार कक्ष से लेकर समाज के सबसे कठिन सवालों तक अपनी कलम चलाई हो, मेरे लिए विशेष महत्व रखता है।

लखनऊ के मोहाना रोड़ स्थित टिकैत राय सचिवालय कॉलोनी में उनके निवास पर हुई इस मुलाकात में मेरे साथ मेरे सहकर्मी सौरभ सुमन उपाध्याय (Saurabh Suman Upadhayay) भी मौजूद थे। बात पत्रकारिता से शुरू हुई, बुंदेलखंड के सूखे तक पहुँची, आगामी चुनावी राजनीति के भीतर उतरी और अंततः उस सवाल पर आकर ठहर गई, जो शायद हर पत्रकार को समय-समय पर स्वयं से पूछना चाहिए कि आखिर कलम की असली ताकत क्या है ? राजू मिश्रजी के अनुभवों ने इस सवाल के कई जवाब दिए।

समाचारों के पीछे छिपी सच्चाई को खोजने वाला पत्रकार

दैनिक जागरण, लखनऊ में करीब चार दशक तक ईमानदारी से सेवाएं देने वाले राजू मिश्रजी का अनुभव केवल समाचारों को पढ़ने, लिखने या संपादित करने तक सीमित नहीं है। उनका काम वह पत्रकारिता का है, जिसमें किसी घटना की सूचना मिल जाना अंतिम उपलब्धि नहीं होता, अपितु उसके पीछे छिपे कारणों और वास्तविक परिस्थितियों को समझना असली काम होता है।

आज पत्रकारिता के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि खबरें तेजी से पहुँचाने की होड़ में कई बार यह सवाल पीछे छूट जाता है कि खबर के पीछे का सच क्या है। किसी योजना की घोषणा हो, किसी अधिकारी का दावा हो या किसी नेता का बयान इनमें से कोई भी अपने आप में पूरी कहानी नहीं है। पूरी कहानी तब सामने आती है, जब फील्ड में व्यक्ति उतरता है, प्रभावित लोगों से बात करता है और सरकारी दावों की वास्तविकता की जाँच करता है।

राजू मिश्रजी के अनुभव सुनते हुए बार-बार यही महसूस हुआ कि पत्रकारिता की असली पहचान उसकी भाषा की चमक या खबर की सुर्खी से नहीं, बल्कि उसकी पड़ताल की गहराई से बनती है।

क्या पत्रकारिता केवल डिग्री से सीखी जा सकती है ?

पत्रकारिता की पढ़ाई और उसके व्यवहारिक अनुभव के बीच संबंध पर के विचारों का सार यह था कि पत्रकारिता की वास्तविक समझ मैदान में उतरने, लोगों से मिलने और घटनाओं को अपनी आँखों से देखने से विकसित होती है। 

क्लासरूम में हम समाचार लेखन के नियम सीख सकते है। किताबें पत्रकारिता के सिद्धांत समझा सकती हैं। विश्वविद्यालय हमें मीडिया, राजनीति, समाज और संचार की प्रक्रियाओं का अध्ययन करने का अवसर दे सकता है। लेकिन जब किसी गाँव में कोई व्यक्ति अपनी समस्या बताते हुए व्यवस्था की कमियों को सामने रखता है, जब किसी सरकारी दावे की वास्तविक पड़ताल करनी होती है या जब किसी राजनेता के बयान और उसके क्षेत्र की परिस्थितियों में अंतर दिखाई देता है, तब व्यावहारिक अनुभव की भूमिका सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाती है।

मिश्रजी ने अपने संघर्षपूर्ण जीवन के अनुभवों के माध्यम से यह भी समझाया कि पत्रकारिता में आगे बढ़ने का रास्ता हमेशा आसान नहीं होता। कम उम्र से ही अपने खर्चों के लिए स्वयं प्रयास कर, अध्ययन करना और अपने दम पर आगे बढ़ना व्यक्ति को जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराता है। उनके जीवन का यह पक्ष बताता है कि पत्रकारिता केवल लिखने की कला नहीं, बल्कि जीवन को समझने और विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी जिम्मेदारी निभाने का अभ्यास है। मेरे लिए इस बातचीत की सीख यह नहीं थी कि पत्रकारिता की पढ़ाई महत्त्वहीन है, बल्कि यह थी कि डिग्री पत्रकारिता का आधार बन सकती है, लेकिन पत्रकार की पहचान उसके अनुभव, सवाल पूछने की क्षमता और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता से बनती है।

पत्रकार की सबसे बड़ी पूँजी 'खुद्दारी'

इस पूरी बातचीत में पत्रकारिता की स्वतंत्रता और व्यक्ति के स्वाभिमान का सवाल सबसे गहराई से मन में उतरा। एक पत्रकार के सामने कई तरह के  आकर्षण आते हैं। सत्ता के गलियारों तक पहुँच, प्रभावशाली लोगों से परिचय, सुविधाएँ, प्रशंसा और कभी-कभी दबाव भी। ऐसे में यह तय करना आसान नहीं होता कि किस परिस्थिति में समझौता करना है और किस परिस्थिति में अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना है।

मिश्रजी के अनुभवों से जो बात उभरकर सामने आई, वह यह थी कि पत्रकार की असली पूँजी उसका आत्मसंतोष, स्वाभिमान, ईमानदारी और खुद्दार स्वभाव है। दिनभर की मेहनत के बाद रात को चैन की नींद सो पाना एक साधारण बात लग सकती है, लेकिन उस व्यक्ति के लिए इसका अर्थ बहुत बड़ा है, जिसने अपनी कलम को किसी के दबाव में झुकने नहीं दिया।  

हर व्यक्ति से सहमत होना आवश्यक नहीं है। किसी राजनीतिक दल, सरकार या नेता के पक्ष में कही गई हर बात को स्वीकार करना भी पत्रकारिता नहीं है। पत्रकार का दायित्व है कि वह अपने सामने मौजूद तथ्यों की जाँच करे, अलग-अलग पक्षों को सुने और जो सच सामने आए, उसे जिम्मेदारी के साथ प्रस्तुत करे। निष्पक्षता का अर्थ यह नहीं कि पत्रकार के पास कोई दृष्टिकोण ही न हो। इसका अर्थ है कि उसका दृष्टिकोण तथ्यों को दबाने या बदलने का कारण न बने। यही वह बारीक अंतर है, जो पत्रकारिता को पीआर से अलग करता है।

मीडिया की स्वतंत्रता और आज की पत्रकारिता

समकालीन मीडिया परिदृश्य पर चर्चा करते हुए यह प्रश्न भी सामने आया कि क्या आज की पत्रकारिता अपने मूल दायित्वों को पूरी तरह निभा पा रही है। आज समाचारों की गति पहले से कहीं अधिक तेज है। मोबाइल फोन पर कुछ ही क्षणों में देश-दुनिया की खबरें पहुँच जाती हैं। डिजिटल मंचों ने पत्रकारिता के नए अवसर पैदा किए हैं, लेकिन उनके साथ चुनौतियाँ भी आई हैं। तत्काल खबर देने की प्रतिस्पर्धा, टीआरपी और क्लिक की चिंता, राजनीतिक दबाव तथा अधूरी जानकारी के आधार पर राय बनाने की प्रवृत्ति पत्रकारिता के लिए गंभीर सवाल खड़े करती है।

ऐसे वातावरण में स्वतंत्र संपादकीय दृष्टिकोण और तथ्यपरक रिपोर्टिंग का महत्त्व और बढ़ जाता है। बातचीत के दौरान द इंडियन एक्सप्रेस, द टेलीग्राफ, दैनिक भास्कर और आनंदबाजार पत्रिका जैसे समाचार पत्रों का उल्लेख बेबाक रिपोर्टिंग और संपादकीय स्वतंत्रता के संदर्भ में हुआ। किसी भी मीडिया संस्थान का मूल्यांकन अंततः उसके काम, उसकी रिपोर्टिंग और तथ्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता के आधार पर होना चाहिए।

मीडिया के क्षेत्र में आ रहे है युवाओं के लिए इसका अर्थ साफ है किसी खबर को केवल इसलिए सही नहीं मान लेना चाहिए कि वह किसी बड़े संस्थान में प्रकाशित हुई है। उसी तरह किसी खबर को केवल इसलिए खारिज भी नहीं करना चाहिए कि वह किसी छोटे मंच से आई है। तथ्य, प्रमाण और विश्वसनीयता ही पत्रकारिता की कसौटी होने चाहिए। डिजिटल युग में पत्रकारिता के साधन बदल सकते हैं, लेकिन उसके मूल सवाल नहीं बदलने चाहिए।

चुनाव केवल नारों से नहीं जीते जाते

राजनीतिक परामर्श और चुनावी शोध के क्षेत्र में काम करते हुए मेरे लिए राजू मिश्रजी के चुनाव संबंधी अनुभव विशेष रूप से उपयोगी रहे। चुनाव को अक्सर बड़े नेताओं की सभाओं, राजनीतिक नारों, सोशल मीडिया अभियानों और प्रचार के आधार पर समझने की कोशिश की जाती है। लेकिन चुनावी राजनीति की वास्तविक तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल होती है।

किसी विधानसभा क्षेत्र में मतदाता क्या सोच रहा है...? स्थानीय विधायक के प्रति उसका अनुभव कैसा है...? क्षेत्र की प्रमुख समस्याएँ क्या हैं...? उम्मीदवार लोगों के बीच कितना स्वीकार्य है...? सामाजिक एवं जातीय समीकरण क्या कहता है...? पार्टी के स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल है या गुटबाजी...? बूथ स्तर पर संगठन कितना मजबूत है...?

इन सवालों के जवाब चुनावी राजनीति को समझने के लिए जरूरी है कि कोई प्रत्याशी क्यों जीता, उसके प्रतिद्वंद्वी से उसे क्या लाभ मिला, स्थानीय सामाजिक समीकरणों की क्या भूमिका रही और चुनाव के बाद क्षेत्र में लोगों की अपेक्षाएँ किस हद तक पूरी हुईं। इसी तरह किसी सीट पर पिछली हार को भविष्य की हार का स्थायी प्रमाण नहीं माना जा सकता।

स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवार का चयन, संगठन की सक्रियता, गठबंधन, मुद्दे और मतदाताओं का बदलता व्यवहार चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकते हैं। चुनाव का सही आकलन करने के लिए केवल आँकड़ों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है, उन आँकड़ों के पीछे खड़े लोगों की आवाज सुनना भी जरूरी है। एक शोधकर्ता को सर्वेक्षण के निष्कर्षों को वास्तविक परिस्थितियों से मिलाकर देखना चाहिए। बंद कमरे में तैयार किया गया विश्लेषण तभी उपयोगी बनता है, जब उसकी जाँच जमीन पर की जा सके।

गुटबाजी, संगठन और स्थानीय राजनीति की अनकही कहानी

राजनीतिक दलों के भीतर होने वाली गुटबाजी और आपसी खींचतान भी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। किसी पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भले ही एकजुटता का संदेश दे, लेकिन स्थानीय स्तर पर नेताओं के बीच मतभेद हों, कार्यकर्ताओं की उपेक्षा हो या उम्मीदवार के चयन को लेकर असंतोष हो, तो उसका असर चुनावी अभियान पर पड़ सकता है। इसीलिए चुनावी शोध करते समय केवल पार्टी के आधिकारिक बयान या सार्वजनिक सभाओं को देखना पर्याप्त नहीं होता। स्थानीय संगठन की वास्तविक स्थिति को समझना भी आवश्यक है।

कौन-सा नेता क्षेत्र में प्रभाव रखता है...? कौन-सा कार्यकर्ता मतदाताओं के बीच सक्रिय है...? पुराने मतभेद कितने गहरे हैं...? क्या स्थानीय नेतृत्व एक उम्मीदवार के पीछे एकजुट है...? क्या जनता की समस्याओं को उठाने वाला कोई प्रभावशाली स्थानीय चेहरा है...?

ये ऐसे सवाल हैं, जिनके उत्तर हमेशा प्रेस विज्ञप्तियों में नहीं मिलते। एक अच्छे राजनीतिक शोधकर्ता को तथ्यों के साथ-साथ स्थानीय परिस्थितियों की समझ भी विकसित करनी होती है। हालाँकि, किसी भी निष्कर्ष को केवल सुनी-सुनाई बातों पर आधारित नहीं होना चाहिए। प्रत्यक्ष बातचीत, अनेक स्रोतों से पुष्टि और उपलब्ध आँकड़ों का विश्लेषण जरूरी है।

यदि लेखक या पत्रकार केवल किसी शक्तिशाली व्यक्ति को प्रसन्न करने के लिए लिखने लगे, तो उसकी रचना की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसके विपरीत, जब लेखन अपने विवेक और सिद्धांतों के आधार पर किया जाता है, तब वह समय की सीमाओं से आगे जाकर भी महत्त्व बनाए रख सकता है।

पत्रकारिता में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है, क्योंकि यहाँ लिखे गए शब्दों का प्रभाव केवल लेखक तक सीमित नहीं रहता। वे सार्वजनिक राय, लोकतांत्रिक विमर्श और सत्ता की जवाबदेही को भी प्रभावित कर सकते हैं। कलम की ताकत इस बात में नहीं है कि वह कितने शक्तिशाली लोगों तक पहुँच सकती है, बल्कि इस बात में है कि वह सच के पक्ष में कितनी मजबूती से खड़ी रह सकती है। 

चौथी पीढ़ी के पत्रकार के रूप में मेरी अपनी सीख

राजू मिश्रा जी से हुई इस मुलाकात को मैं अपने व्यक्तिगत और व्यावसायिक अनुभव के एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव के रूप में देखता हूँ। मेरे लिए पत्रकारिता की विरासत का अर्थ केवल अपने पूर्वजों के नाम को आगे बढ़ाना नहीं है। इसका अर्थ उस जिम्मेदारी को समझना भी है, जो समाज की वास्तविकताओं को दर्ज करने और सार्वजनिक जीवन से जुड़े सवाल उठाने के साथ आती है।

आज पत्रकारिता का स्वरूप बदल रहा है। समाचार पत्रों के साथ डिजिटल मंच, मोबाइल जर्नलिज़्म, वीडियो रिपोर्टिंग, आँकड़ों पर आधारित विश्लेषण और सामाजिक माध्यमों ने नई संभावनाएँ पैदा की हैं। राजनीतिक शोध और परामर्श के क्षेत्र में काम करने से भी मुझे यह समझने का अवसर मिलता है कि सार्वजनिक मुद्दों, चुनावी व्यवहार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखना कितना जरूरी है। लेकिन माध्यम चाहे कोई भी हो, कुछ बुनियादी प्रश्न हमेशा बने रहेंगे।

क्या हमने खबर के सभी महत्त्वपूर्ण पक्षों की जाँच की...? क्या हमने प्रभावित लोगों की बात सुनी...? क्या हमने किसी दावे को पर्याप्त प्रमाण के बिना स्वीकार कर लिया...? क्या हमारा विश्लेषण तथ्यों पर आधारित है...? और सबसे जरूरी, क्या हम अपने पेशे के प्रति ईमानदार है...?

इन सवालों को स्वयं से पूछते रहना ही शायद पत्रकारिता में सीखते रहने का सबसे अच्छा तरीका है। राजू मिश्रजी जैसे वरिष्ठ पत्रकारों से संवाद करना केवल उनके अतीत के बारे में जानना नहीं है। यह उस अनुभव से सीखने का अवसर है, जिसे किताबों में पूरी तरह समेटना संभव नहीं होता। यह मुलाकात मेरे लिए किसी औपचारिक परिचय या कुछ घंटों की बातचीत से कहीं अधिक रही। इसमें पत्रकारिता का संघर्ष था, बुंदेलखंड की जमीन से उठते सवाल थे, चुनावी राजनीति की जटिलताएँ थीं और सबसे बढ़कर अपनी कलम के प्रति ईमानदार रहने का संदेश था।

सत्ता के दावों और जनता के अनुभवों के बीच की दूरी को समझना, सरकारी योजनाओं के परिणामों की पड़ताल करना, चुनावी नारों के पीछे की वास्तविकता देखना और समाज के उन लोगों की आवाज को जगह देना, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी रह जाती हैं यही पत्रकारिता की सार्थकता है।

राजू मिश्रजी के प्रति उनके अनुभवों और विचारों को साझा करने के लिए हार्दिक आभार। ऐसी मुलाकातें यह भरोसा मजबूत करती हैं कि पत्रकारिता की चुनौतियाँ चाहे कितनी भी बदल जाएँ, ईमानदारी, जमीनी समझ और सवाल पूछने का साहस आज भी इसकी सबसे बड़ी ताकत हैं। 

~ नैवेद्य पुरोहित 

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