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महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और चिकित्सा के सवालों पर कब गंभीर होंगे सियासत के सूरमा? : सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की है जिम्मेदारी

📅 21 October 2026, 09:22 PM • ✍️ paliwalwani • ⏱️ 24 मिनट में पढ़ें
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महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और चिकित्सा के सवालों पर कब गंभीर होंगे सियासत के सूरमा? : सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की है जिम्मेदारी
महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और चिकित्सा के सवालों पर कब गंभीर होंगे सियासत के सूरमा? : सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की है जिम्मेदारी

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  • सम्पादकीय
  • जनजीवन से जुड़ी समस्याओं की अनदेखी भी उचित नहीं!

    लोकतंत्र में राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान करना, समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना और नागरिकों को सम्मानजनक जीवन जीने के अवसर उपलब्ध कराना होना चाहिए। लेकिन जब राजनीति का केंद्र जनसमस्याओं के बजाय सत्ता संघर्ष, आरोप-प्रत्यारोप, विरोध-प्रदर्शन और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई बन जाता है, तब आम आदमी के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसकी परेशानियों को दूर करने की जिम्मेदारी आखिर कौन निभाएगा? चुनाव के समय जनता के बीच पहुंचकर बड़े-बड़े वादे करने वाले राजनीतिक दल और उनके नेता चुनाव संपन्न होने के बाद उन बुनियादी सवालों को कितनी गंभीरता से लेते हैं, जिनसे आम नागरिक का प्रतिदिन सामना होता है? यह सवाल आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना पहले था।

    देश में महंगाई, बेरोजगारी, महंगी शिक्षा, चिकित्सा की बढ़ती लागत, मिलावटखोरी, घटतौली, खराब सड़कें और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाल स्थिति जैसी समस्याएं आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करती हैं। इन समस्याओं का सीधा संबंध किसी एक राजनीतिक दल, सरकार या विचारधारा से नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन की जवाबदेही और व्यवस्था की कार्यक्षमता से है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी है कि वे जनता के वास्तविक मुद्दों को प्राथमिकता दें। लोकतंत्र में विरोध का अपना महत्व है, लेकिन विरोध का उद्देश्य केवल राजनीतिक लाभ हासिल करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में सुधार लाना भी होना चाहिए।

    महंगाई की मार से आम आदमी का बजट बेहाल

    महंगाई ऐसी समस्या है, जिसका असर समाज के हर वर्ग पर पड़ता है, लेकिन इसका सबसे अधिक बोझ सीमित आय वाले परिवारों को उठाना पड़ता है। रसोई का बजट हो या बच्चों की पढ़ाई, मकान का किराया हो या बिजली-पानी के बिल, हर तरफ बढ़ते खर्चों के बीच आम परिवार के लिए अपनी आय और आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना चुनौती बन जाता है।

    मध्यमवर्गीय परिवार अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च करने को मजबूर होता है। वहीं, गरीब और निम्न आय वर्ग के सामने कई बार आवश्यक जरूरतों में कटौती करने की नौबत आ जाती है। ऐसे में महंगाई केवल आर्थिक आंकड़ों का विषय नहीं रह जाती, बल्कि यह परिवारों की जीवनशैली, बच्चों के भविष्य और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा सवाल बन जाती है।

    सरकारों की आर्थिक नीतियों का मूल्यांकन केवल विकास दर, निवेश और बाजार की गतिविधियों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखना आवश्यक है कि उन नीतियों का लाभ आम नागरिक तक कितना पहुंच रहा है। आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर निगरानी, बाजार में प्रतिस्पर्धा, जमाखोरी के विरुद्ध कार्रवाई और सार्वजनिक वितरण प्रणाली की प्रभावशीलता जैसे कदम जनता को राहत देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

    सवाल यह है कि आम आदमी को राहत देने के लिए नीतियों और घोषणाओं के साथ जमीन पर कितने प्रभावी कदम उठाए जा रहे हैं? जनता को आश्वासन के साथ ठोस परिणाम भी चाहिए।

    बेरोजगारी और युवाओं की उम्मीदों का सवाल

    देश का युवा वर्ग किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। उसकी ऊर्जा, प्रतिभा और मेहनत से ही विकास की नई संभावनाएं पैदा होती हैं। लेकिन जब पढ़े-लिखे युवाओं को उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार नहीं मिलता, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बीत जाते हैं और भर्ती प्रक्रियाओं में देरी या अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती हैं, तो निराशा बढ़ना स्वाभाविक है।

    रोजगार का प्रश्न केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं है। निजी क्षेत्र में अवसरों का विस्तार, छोटे और मध्यम उद्योगों को प्रोत्साहन, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन, कौशल विकास और स्वरोजगार के लिए अनुकूल वातावरण भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

    सरकारों को चाहिए कि वे रोजगार संबंधी दावों के साथ यह भी स्पष्ट करें कि कितने स्थायी अवसर पैदा हुए, युवाओं को प्रशिक्षण के बाद कितनी नौकरियां मिलीं और छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की संभावनाओं को बढ़ाने के लिए क्या किया गया। वहीं, विपक्ष की जिम्मेदारी है कि वह बेरोजगारी के मुद्दे को केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित न रखे, बल्कि ठोस सुझावों और प्रभावी निगरानी के माध्यम से सरकार को जवाबदेह बनाए।

    युवाओं को केवल आश्वासन नहीं, अवसर चाहिए। उन्हें ऐसे वातावरण की जरूरत है, जहां उनकी योग्यता का सम्मान हो और मेहनत के आधार पर आगे बढ़ने का भरोसा मिले।

    शिक्षा और चिकित्सा: सुविधा नहीं, बुनियादी जरूरतें

    शिक्षा और स्वास्थ्य किसी भी सभ्य समाज की बुनियाद हैं। इन दोनों क्षेत्रों में आम आदमी की आर्थिक स्थिति के आधार पर सुविधाओं की उपलब्धता में बड़ा अंतर नहीं होना चाहिए। लेकिन निजी स्कूलों की फीस, किताबों और अन्य शैक्षिक खर्चों का दबाव अनेक परिवारों के लिए चिंता का कारण बनता है। उच्च शिक्षा की लागत भी कई विद्यार्थियों के सामने आर्थिक बाधाएं खड़ी करती है।

    दूसरी ओर, चिकित्सा का खर्च किसी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त कर सकता है। गंभीर बीमारी, महंगी जांच, दवाओं और अस्पताल में भर्ती होने का खर्च आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कर्ज लेने तक के लिए मजबूर कर सकता है।

    सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सक, प्रशिक्षित कर्मचारी, आवश्यक जांच सुविधाएं और दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना आवश्यक है। इसी तरह सरकारी विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, शिक्षकों की उपलब्धता बढ़ाने और विद्यार्थियों को बेहतर शैक्षिक संसाधन उपलब्ध कराने पर निरंतर ध्यान दिया जाना चाहिए।

    यह भी जरूरी है कि निजी शिक्षण संस्थानों और चिकित्सा प्रतिष्ठानों में नियमों के अनुपालन की प्रभावी निगरानी हो। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर मनमानी वसूली या अनुचित व्यावसायिक व्यवहार की शिकायतों पर निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई होनी चाहिए।

    किसी भी सरकार की संवेदनशीलता का आकलन इस बात से भी किया जा सकता है कि वह आम नागरिक के लिए शिक्षा और इलाज को कितना सुलभ बनाती है।

    मिलावटखोरी और घटतौली पर लगाम कौन लगाएगा?

    खाद्य पदार्थों में मिलावट और दवाओं की गुणवत्ता से जुड़ी अनियमितताएं सीधे लोगों के स्वास्थ्य और जीवन को प्रभावित कर सकती हैं। इसी प्रकार, दुकानों पर कम तौल, वस्तुओं की कीमतों में अनुचित वसूली और उपभोक्ताओं को भ्रामक जानकारी देकर सामान बेचने जैसी शिकायतें भी चिंता का विषय हैं।

    बाजार में उपभोक्ता और विक्रेता के बीच विश्वास बना रहना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई खर्च करके खाद्य सामग्री, दवा या दैनिक उपयोग की वस्तु खरीदता है, तो उसे निर्धारित गुणवत्ता और सही मात्रा मिलने का अधिकार है।

    इसके लिए खाद्य सुरक्षा विभाग, औषधि नियंत्रण विभाग, बाट-माप विभाग और उपभोक्ता संरक्षण से जुड़े अधिकारियों को अपनी जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से निभानी चाहिए। नियमित निरीक्षण, नमूनों की वैज्ञानिक जांच, दोषियों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई और शिकायतों का समयबद्ध निस्तारण जरूरी है।

    केवल त्योहारों के आसपास छापेमारी कर देना या कुछ दुकानों के नमूने लेकर कार्रवाई की औपचारिकता पूरी कर लेना पर्याप्त नहीं है। निगरानी पूरे वर्ष होनी चाहिए और कार्रवाई का उद्देश्य केवल आंकड़े प्रस्तुत करना नहीं, बल्कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए।

    यह भी ध्यान रखना होगा कि बिना प्रमाण किसी व्यापारी या प्रतिष्ठान को दोषी ठहराना उचित नहीं है। कार्रवाई शिकायत, जांच और कानून के आधार पर होनी चाहिए, ताकि ईमानदार कारोबारियों के हित भी सुरक्षित रहें और अनियमितता करने वालों पर प्रभावी अंकुश लगे।

    गड्ढों वाली सड़कें और अमानक गतिरोधक भी गंभीर समस्या

    सड़कों पर बने गड्ढे, क्षतिग्रस्त पुलिया, जलभराव और मानकों के विपरीत बनाए गए गतिरोधक आम नागरिक के लिए परेशानी के साथ दुर्घटनाओं का जोखिम भी बढ़ाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में खराब संपर्क मार्गों के कारण किसानों, विद्यार्थियों, मरीजों और कामकाजी लोगों को विशेष कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

    कई बार सड़क निर्माण के कुछ समय बाद ही उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठने लगते हैं। कहीं सड़क धंस जाती है, कहीं गड्ढे बन जाते हैं और कहीं नालियों का पानी सड़क पर बहने लगता है। ऐसे मामलों में निर्माण एजेंसी, संबंधित विभाग और निगरानी व्यवस्था की जवाबदेही तय होनी चाहिए।

    सड़क निर्माण पर सरकारी धन खर्च होने का अर्थ तभी सार्थक है, जब उसका लाभ जनता को लंबे समय तक मिले। निर्माण की गुणवत्ता की जांच, ठेकेदारों की जवाबदेही और समयबद्ध मरम्मत की व्यवस्था प्रभावी होनी चाहिए।

    इसी तरह गतिरोधक यातायात की गति नियंत्रित करने और दुर्घटनाएं रोकने के लिए बनाए जाते हैं। यदि वे निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हैं या उन पर उचित संकेतक नहीं लगाए गए हैं, तो वे स्वयं दुर्घटना का कारण बन सकते हैं। इसलिए संबंधित विभागों को सड़क सुरक्षा के मानकों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए। जनता को सुरक्षित सड़कें उपलब्ध कराना किसी सरकार का एहसान नहीं, बल्कि उसकी प्रशासनिक जिम्मेदारी है।

    दशहरे का संदेश केवल रावण का पुतला जलाने तक सीमित न रहे

    दशहरा बुराई पर अच्छाई, असत्य पर सत्य और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक है। हर वर्ष देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं। इस अवसर पर जनप्रतिनिधि और राजनीतिक नेता भी रावण के दस सिरों को समाज में व्याप्त बुराइयों का प्रतीक बताते हुए सत्य, न्याय और नैतिकता की स्थापना का संदेश देते हैं।

    लेकिन इस पर्व के वास्तविक संदेश पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। क्या बुराइयों के विरुद्ध हमारी लड़ाई केवल प्रतीकात्मक आयोजनों तक सीमित रहनी चाहिए? क्या भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मिलावटखोरी, शोषण, अन्याय और प्रशासनिक लापरवाही जैसी समस्याओं के विरुद्ध भी उसी दृढ़ता से काम नहीं किया जाना चाहिए?

    रावण का पुतला जलाना एक धार्मिक-सांस्कृतिक परंपरा है, लेकिन समाज की वास्तविक बुराइयों को समाप्त करने के लिए निरंतर प्रयास जरूरी हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई, गरीबों को न्याय, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं को रोजगार और नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना भी अच्छे शासन की कसौटियां हैं।

    यदि सार्वजनिक मंचों से बुराइयों के अंत का संकल्प लिया जाता है, तो उस संकल्प का प्रभाव सरकारी कार्यालयों, बाजारों, अस्पतालों, विद्यालयों और सड़कों पर भी दिखाई देना चाहिए। तभी पर्वों से मिलने वाली प्रेरणा सामाजिक जीवन में सार्थक बदलाव ला सकेगी।

    मतदाता सूची और चुनावी पारदर्शिता का सवाल भी महत्वपूर्ण

    लोकतंत्र में स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनावों का विशेष महत्व है। मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों का नाम सूची में शामिल होना, अपात्र प्रविष्टियों को नियमानुसार हटाना और चुनावी प्रक्रिया पर जनता का विश्वास बनाए रखना निर्वाचन व्यवस्था की बुनियादी आवश्यकताएं हैं।

    यदि मतदाता सूची में गड़बड़ियों के आरोप लगाए जाते हैं या किसी संवैधानिक संस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते हैं, तो उन पर तथ्यों के आधार पर विचार होना चाहिए। शिकायतों की जांच, आवश्यक स्पष्टीकरण और कानून के अनुरूप कार्रवाई लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है।

    विपक्ष को सरकार और संवैधानिक संस्थाओं से सवाल पूछने तथा चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे उठाने का अधिकार है। इसी प्रकार, संबंधित संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि वे नियमों के अनुसार काम करें और उठाए गए सवालों का तथ्यात्मक जवाब दें।

    मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग सहित किसी भी राजनीतिक मांग का मूल्यांकन उसके आधार, उपलब्ध साक्ष्यों और संवैधानिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में होना चाहिए। केवल आरोप लगा देना किसी आरोप को प्रमाणित नहीं करता और न ही किसी सवाल को उठाने मात्र से उसे निराधार माना जा सकता है।

    लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या चुनावी मुद्दों पर होने वाली राजनीतिक बहस के बीच महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और उपभोक्ता सुरक्षा जैसे प्रश्न पर्याप्त प्राथमिकता प्राप्त कर रहे हैं?

    चुनावी पारदर्शिता और जनजीवन से जुड़ी समस्याएं एक-दूसरे की विरोधी नहीं हैं। लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए दोनों पर गंभीरता से काम करना आवश्यक है।

    सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की है जिम्मेदारी

    लोकतंत्र में सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी केवल अपनी उपलब्धियां गिनाना नहीं, बल्कि जनता के सवालों का जवाब देना भी है। सरकार के पास नीतियां बनाने, बजट आवंटित करने और प्रशासनिक तंत्र के माध्यम से योजनाओं को लागू करने की जिम्मेदारी होती है। इसलिए उसे जनसमस्याओं के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिए।

    वहीं, विपक्ष का दायित्व केवल सरकार की आलोचना करना नहीं है। उसे जनसमस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने, सरकारी कामकाज की निगरानी करने, कमियों को प्रमाणों के साथ सामने लाने और वैकल्पिक समाधान प्रस्तुत करने की भूमिका निभानी चाहिए।

    संसद और विधानसभाओं में सार्थक बहस, स्थानीय निकायों में जवाबदेही, जनसुनवाई की प्रभावी व्यवस्था और शिकायतों के निस्तारण की नियमित समीक्षा से जनता को राहत मिल सकती है।

    राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि जनता की समस्याएं किसी एक चुनाव या किसी एक सरकार के कार्यकाल तक सीमित नहीं होतीं। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और स्वच्छ बाजार की जरूरत हर नागरिक को होती है। इसलिए इन विषयों पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का स्वरूप ऐसा होना चाहिए, जिसमें बेहतर समाधान देने की होड़ लगे।

    यदि सत्ता पक्ष कोई जनकल्याणकारी कदम उठाता है, तो उसका उद्देश्य जनता को लाभ पहुंचाना होना चाहिए। यदि विपक्ष किसी योजना या नीति की आलोचना करता है, तो उसके पास बेहतर विकल्प भी होने चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान और जनहित में सहयोग, दोनों आवश्यक हैं।

    जनता भी पूछे अपने प्रतिनिधियों से सवाल

    लोकतंत्र केवल मतदान करने तक सीमित नहीं है। नागरिकों की जागरूकता, जनप्रतिनिधियों से सवाल पूछने की क्षमता और सार्वजनिक संस्थाओं की जवाबदेही भी इसकी मजबूती का आधार हैं।

    मतदाताओं को अपने क्षेत्र के प्रतिनिधियों से यह पूछना चाहिए कि सड़कें कब सुधरेंगी, सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं कब बढ़ेंगी, विद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता कैसे बेहतर होगी, युवाओं के लिए रोजगार के अवसर कैसे पैदा होंगे और स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।

    इसी प्रकार, सरकारी योजनाओं का लाभ पात्र लोगों तक पहुंच रहा है या नहीं, शिकायतों का निस्तारण हो रहा है या नहीं और सार्वजनिक धन का उपयोग निर्धारित उद्देश्यों के लिए हो रहा है या नहीं, इन सवालों पर भी नजर रखनी चाहिए।

    जनता को केवल नारों और भावनात्मक अपीलों के आधार पर नहीं, बल्कि कार्यों, नीतियों और उपलब्धियों के आधार पर जनप्रतिनिधियों का मूल्यांकन करना चाहिए। नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से ही शासन व्यवस्था को अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी बनाया जा सकता है।

    हालांकि, जनजागरूकता के साथ यह भी जरूरी है कि शिकायतें तथ्यों पर आधारित हों और उनका समाधान संवैधानिक एवं कानूनी प्रक्रियाओं के माध्यम से तलाशा जाए।

    राजनीति का केंद्र बने जनकल्याण

    आज देश के सामने अनेक चुनौतियां हैं। चुनावी पारदर्शिता, संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी आम आदमी को महंगाई से राहत, युवाओं को रोजगार, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मरीजों को सुलभ चिकित्सा और उपभोक्ताओं को सुरक्षित बाजार उपलब्ध कराना भी है।

    किसी एक मुद्दे को उठाने के लिए दूसरे मुद्दे को नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि अलग-अलग विचारों और प्राथमिकताओं के बावजूद जनहित के प्रश्नों पर गंभीर संवाद हो तथा समस्याओं के समाधान के लिए ठोस प्रयास किए जाएं।

    दशहरा हमें बुराई पर अच्छाई की विजय का संदेश देता है। इस संदेश को वास्तविक जीवन में उतारने के लिए भ्रष्टाचार, अन्याय, शोषण और प्रशासनिक लापरवाही के विरुद्ध ईमानदार प्रयास जरूरी हैं। इसी तरह चुनावी बहस को भी नागरिकों की रोजमर्रा की जरूरतों से जोड़ना होगा।

    राजनीति की सार्थकता केवल इस बात में नहीं है कि कौन सत्ता में है और कौन विपक्ष में, बल्कि इस बात में है कि आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ। जनता को ऐसी राजनीति चाहिए जो उसके दुख-दर्द को समझे, समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करे और अपने वादों के प्रति जवाबदेह रहे।

    सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी राजनीतिक दलों को यह याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता केवल मतदाता नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था के केंद्र में रहने वाली सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। जनसमस्याओं की अनदेखी करके राजनीतिक संघर्ष को प्राथमिकता देना अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था के प्रति जनता के विश्वास को कमजोर कर सकता है।

    इसलिए समय की मांग है कि राजनीतिक दल आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जनहित के मुद्दों पर ठोस पहल करें। क्योंकि जनता को केवल राजनीतिक भाषण नहीं, अपने जीवन में सकारात्मक बदलाव चाहिए; केवल वादे नहीं, उनके परिणाम चाहिए और केवल आश्वासन नहीं, समस्याओं का समाधान चाहिए। यही जनकल्याणकारी राजनीति की असली पहचान और लोकतंत्र की वास्तविक सफलता होगी।

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