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उम्र के साथ अधिकार भी ज़रूरी

📅 21 October 2026, 08:29 PM • ✍️ paliwalwani • ⏱️ 15 मिनट में पढ़ें
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उम्र के साथ अधिकार भी ज़रूरी
उम्र के साथ अधिकार भी ज़रूरी

शोभा शुक्ला - सीएनएस

दुनिया की आबादी तेज़ी से उम्रदराज़ हो रही है, लेकिन क्या अधिक उम्र के लोगों को गरिमा, समानता, सुरक्षा और बेहतर स्वास्थ्य के साथ जीने का अधिकार वास्तव में मिल रहा है? गरीबी, सामाजिक बहिष्कार और स्वास्थ्य सेवाओं व न्याय तक के लिए उनको क्यों जूझना पड़ता है? अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार व्यवस्थाओं में प्रगति के बावजूद, बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक समर्पित, कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय संधि की ज़रूरत बनी हुई है।

यह मांग नई नहीं है। वर्ष 1948 में ही अर्जेंटीना ने मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा तैयार किए जाने के दौरान "बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों की घोषणा" का प्रस्ताव रखा था। अब, लगभग आठ दशक बाद, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद ने बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों पर ऐसी संधि का मसौदा तैयार करने के लिए एक अंतर-सरकारी कार्यसमूह गठित किया है, जो उम्रवाद पूर्वाग्रह और भेदभाव की गहराई से जमी समस्याओं को संबोधित कर सके।

नीतियों और आँकड़ों में बढ़ती उम्र के लोग कहाँ हैं?

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के कार्यालय में अंतर-सरकारी कार्यसमूह के सचिव खालिद हसीन ने कहा कि मौजूदा मानवाधिकार व्यवस्था में बढ़ती उम्र के लोगों की ज़रूरतों और अनुभवों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती। उम्र के आधार पर भेदभाव और उम्रवाद पूर्वाग्रहों से जुड़ी रूढ़ धारणाओं, अन्य पूर्वाग्रहों तथा बहिष्कार-कारी व्यवहार को अब भी गंभीरता से नहीं लिया जाता।

उन्होंने स्पष्ट किया कि उम्र बढ़ने का अनुभव केवल वर्षों की संख्या से तय नहीं होता। व्यक्ति की सामाजिक, आर्थिक और व्यक्तिगत परिस्थितियाँ भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं। जब सरकारी आँकड़ों और मानवाधिकार रिपोर्टों में बढ़ती उम्र के लोगों का प्रतिनिधित्व कम होता है, तो नीतियों और सेवाओं में उनकी ज़रूरतें भी पीछे छूट जाती हैं।

हसीन ने ये विचार बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों पर अंतरसरकारी बैठक से पहले आयोजित शी एंड राइट्स सत्र में रखे। इस सत्र का आयोजन ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इन्क्लूज़न और सीएनएस ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय नागरिक समाज संगठनों के सहयोग से किया।

प्रखर नारीवादी कार्यकर्ता और शी एंड राइट्स का नेत्री शोभा शुक्ला ने कहा कि अधिक उम्र के लोगों का बहिष्कार हमेशा 'अनजाने' में नहीं होता। व्यवस्थागत बाधाएँ, पूर्वाग्रह और पितृसत्तात्मक सोच उन्हें नीतिगत चर्चाओं और संरक्षण के दायरे से बाहर रख सकती हैं।

शोभा शुक्ला ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद की सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (यूपीआर) के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2008 से अब तक 1,24,539 से अधिक सिफारिशों में से केवल 681 बढ़ती उम्र के लोगों से संबंधित थीं—यानी मात्र 0.5 प्रतिशत। यह आँकड़ा दिखाता है कि मानवाधिकारों पर वैश्विक विमर्श में बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकार अब भी कितने हाशिये पर हैं।

स्वास्थ्य के अधिकार पर भी सीमित ध्यान

जिनेवा स्थित ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न की डेटा मैनेजर रैचेल रिएल ने स्वास्थ्य एवं अधिकार वेधशाला का उल्लेख किया। यह एक निःशुल्क, सार्वजनिक और संवादात्मक मंच है, जो यूपीआर की सिफारिशों को स्वास्थ्य संकेतकों से जोड़ता है।

उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य से संबंधित लगभग 29,000 सिफारिशों में से केवल 144 विशेष रूप से बढ़ती उम्र के लोगों के स्वास्थ्य पर केंद्रित थीं। इनमें से लगभग 92 प्रतिशत सिफारिशों को सरकारों का समर्थन मिलने के बावजूद, इस मुद्दे को पर्याप्त प्राथमिकता नहीं मिली।

जब बढ़ती उम्र के लोग आँकड़ों और रिपोर्टों से गायब रहते हैं, तो वे नीतिगत प्राथमिकताओं से भी बाहर हो जाते हैं। स्वास्थ्य एवं अधिकार वेधशाला जैसे मंच सरकारी प्रतिबद्धताओं की निगरानी करने, कमियों की पहचान करने और जवाबदेही बढ़ाने में मदद कर सकते हैं।

बाध्यकारी संधि क्यों ज़रूरी है?

ग्लोबल अलायंस फॉर द राइट्स ऑफ ओल्डर पीपल की सह-अध्यक्ष रोज़ गाहिरे के अनुसार, एक कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि बढ़ती उम्र के लोगों के संरक्षण में मौजूद कमियों को दूर करने, सरकारों के दायित्व स्पष्ट करने और जवाबदेही सुनिश्चित करने का अवसर है।

उन्होंने कहा, “उम्र बढ़ना सार्वभौमिक है, लेकिन गरिमा, सुरक्षा और सम्मान के साथ उम्रदराज़ होना अभी हर किसी की वास्तविकता नहीं है।”संधि में उम्रवाद पूर्वाग्रह और ऐसे भेदभाव को संबोधित किया जाना चाहिए, जो बढ़ती उम्र के लोगों की स्वतंत्रता, रोज़गार, नीतिगत निर्णयों में भागीदारी और संघर्षों तथा प्राकृतिक आपदाओं के दौरान सुरक्षा को कु-प्रभावित करता है।

साथ ही, यह समझना ज़रूरी है कि सभी बढ़ती उम्र के लोगों के अनुभव एक जैसे नहीं होते। लिंग, दिव्यांगता, गरीबी, जातीयता, प्रवासन और भौगोलिक स्थिति जैसे कारक उनके जीवन और अधिकारों को अलग-अलग ढंग से प्रभावित करते हैं।

अफ्रीका में बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों से संबंधित और क़ानूनी रूप से बाध्य क्षेत्रीय प्रोटोकॉल, जो 2024 में लागू हुआ, इस दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करता है। रोज़ गाहिरे ने ज़ोर दिया कि वैश्विक संधि को ऐसी मौजूदा व्यवस्थाओं को मज़बूत करना चाहिए। मूल सिद्धांत स्पष्ट होना चाहिए: बढ़ती उम्र के लोगों के बारे में कोई भी निर्णय उनकी भागीदारी के बिना नहीं लिया जाना चाहिए।

उम्र, लिंग और दिव्यांगता: भेदभाव के कई स्तर

बढ़ती उम्र की महिलाओं को गरीबी, आर्थिक निर्भरता, संपत्ति पर असमान अधिकार और लैंगिक हिंसा का सामना करना पड़ सकता है। दिव्यांग बुज़ुर्गों को सुलभ सेवाएँ नहीं मिलतीं, जबकि एचआईवी के साथ जी रहे अधिक उम्र के लोग सामाजिक कलंक, स्वास्थ्य सेवाओं में बिखराव और अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा से जूझते हैं। ग्रामीण अलगाव, प्रवासन और जेंडर पहचान भी उनकी मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।

नारीवादी विशेषज्ञ डॉ पाम राजपूत ने नागरिक समाज से संधि निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की। उन्होंने कहा कि नई संधि को मौजूदा अंतरराष्ट्रीय मानकों पर आगे बढ़ना चाहिए और भेदभाव के परस्पर जुड़े रूपों को स्पष्ट रूप से मान्यता देनी चाहिए।

उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि बढ़ती उम्र के लोग केवल देखभाल पाने वाले लोग नहीं हैं। उनका ज्ञान, अनुभव और समाज में योगदान अत्यंत मूल्यवान है। उन्हें अपने अधिकारों का दावा करने और निर्णय लेने की प्रक्रिया में भागीदारी का पूरा अवसर मिलना चाहिए।

  • एचआईवी के साथ उम्रदराज़ होना : जीवित रहने से आगे, गरिमा के साथ जीना
  • एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के अनुभव बताते हैं कि स्वास्थ्य का अधिकार केवल दवाओं और चिकित्सकीय उपचार तक सीमित नहीं है। पिछले 42 वर्षों से एचआईवी के साथ जी रहीं प्रिज्मा की सह-संस्थापक और निदेशक निकोलेटा पुलिसेक ने कहा कि एचआईवी के साथ उम्रदराज़ होना अधिकारों, संसाधनों और निर्णय लेने की शक्ति से जुड़ा मुद्दा है। अधिक उम्र तक जीवित रहना चिकित्सा विज्ञान और सामुदायिक प्रयासों की उपलब्धि है, लेकिन भेदभाव, गोपनीयता का उल्लंघन और सामाजिक सुरक्षा की कमी अब भी गंभीर समस्याएँ हैं।

    उन्होंने समुदाय के नेतृत्व में जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर नीतियाँ बनाने और सरकारों को जवाबदेह ठहराने की ज़रूरत बताई। एचआईवी के साथ जी रहे लोग जो अब अधिक उम्र के हो रहे हैं, उनको सेवाओं के मूल्यांकन और अपनी प्राथमिकताएँ तय करने में शामिल किया जाना चाहिए।

    निकोलेटा ने कहा, “अधिक समय तक जीवित रहने का अर्थ यह भी होना चाहिए कि हम अधिकारों, गरिमा और अपने जीवन को स्वयं दिशा देने की शक्ति के साथ जी सकें।”

    ज़िम्बाब्वे और भारत के सामुदायिक प्रतिनिधियों तारिरो कुताद्ज़ा और दक्षा पटेल ने एचआईवी के साथ जी रहे उम्रदराज़ लोगों की स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों, सामाजिक कलंक और अकेलेपन पर ध्यान दिलाया। उन्होंने सहकर्मी सहायता नेटवर्क, बेहतर सामाजिक सुरक्षा, एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं और व्यक्ति-केंद्रित देखभाल को मज़बूत करने की अपील की।

    नेपाल की सीनियर सिटिज़न्स वेलफेयर एसोसिएशन की संस्थापक-अध्यक्ष ईश्वरी स्वर ने बताया कि युवाओं के पलायन से दूरदराज़ के ग्रामीण इलाकों में अनेक अधिक उम्र के लोग परिवार के सहयोग और आवश्यक सेवाओं से वंचित रह जाते हैं। कमज़ोर क्रियान्वयन, अपर्याप्त बजट और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच उनके अधिकारों को और कमज़ोर करती है।

    इसके विपरीत, इंडोनेशिया के स्वास्थ्य मंत्रालय के डॉ. इमरान पंबुडी ने एकीकृत प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, निःशुल्क स्वास्थ्य जाँच, समुदाय-आधारित दीर्घकालिक देखभाल और दिव्यांगों के अनुकूल सेवाओं के उदाहरण प्रस्तुत किए। उन्होंने टिकाऊ वित्तपोषण, देखभाल करने वालों को सहयोग और मज़बूत स्वास्थ्य प्रणालियों की ज़रूरत पर बल दिया।

    उनके शब्दों में, “उम्रदराज़ होना मानव विकास की उपलब्धि है; हमारी ज़िम्मेदारी है कि हर व्यक्ति इसका अनुभव गरिमा, स्वास्थ्य और सार्थकता के साथ कर सके।”

    गरिमा की कोई समाप्ति तिथि नहीं

    संयुक्त राष्ट्र की सार्वभौमिक आवधिक समीक्षा (यूपीआर) और ग्लोबल सेंटर फॉर हेल्थ डिप्लोमेसी एंड इंक्लूज़न जिनेवा की स्वास्थ्य एवं अधिकार वेधशाला जैसे मंच, बढ़ती उम्र के लोगों के अधिकारों से जुड़ी कमियों को उजागर करने और सरकारों को जवाबदेह बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन प्रभावी निगरानी के साथ-साथ ऐसी कानूनी व्यवस्था भी आवश्यक है, जो सरकारों के दायित्व स्पष्ट करे और उम्रदराज़ लोगों के अधिकारों को वास्तविक सुरक्षा दे।

  • मानवाधिकारों का अर्थ तभी पूरा होता है, जब उम्र किसी व्यक्ति के साथ भेदभाव करने, उसे अदृश्य बनाने या समाज से बाहर रखने का बहाना न बने।
  • रोज़ गाहिरे के शब्दों में, “उम्र बढ़ने के साथ मानवाधिकार कम नहीं होते। गरिमा की कोई समाप्ति तिथि नहीं होती।”
    1. शोभा शुक्ला, नारीवादी चिंतक, स्वास्थ्य एवं विकास न्याय की प्रखर पैरोकार तथा पुरस्कृत लेखिका एवं संपादिका हैं। वे सीएनएस (सिटीज़न न्यूज़ सर्विस) की संस्थापक-संपादक हैं और सेवा-निवृत्त होने तक, लोरेटो कॉलेज में 3 दशक तक भौतिक विज्ञान की वरिष्ठ शिक्षिका रही हैं। वे 2026 में प्रकाशित पुस्तक, “जस्टिस अनबाउंड” की लेखिका हैं एवं 2025 में संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी उच्च-स्तरीय राजनीतिक फोरम में एसडीजी-3 की प्रमुख चर्चकर्ता रही हैं। उन्हें एक्स पर पढ़ें: @shobha1shukla

    2. "परवाह मत करो कि कोई क्या कहता है,...तुम्हारे घर के खर्चे तुम्हें उठाने हैं लोगों को नहीं"...!!
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