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मोहन का डंडा और जनता को मिला अंडा...? :

📅 20 July 2026, 08:53 PM ✍️ paliwalwani ⏱️ 13 मिनट में पढ़ें
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मोहन का डंडा और जनता को मिला अंडा...? :
मोहन का डंडा और जनता को मिला अंडा...? :

राजेंद्र सिंह जादौन

मध्यप्रदेश बड़ा विचित्र प्रदेश है। यहां समस्याएं पुरानी होती हैं, घोषणाएं नई होती हैं और समाधान हमेशा भविष्य में मिलने वाला बताया जाता है। जनता हर पांच साल में उम्मीदों का नया सूट सिलवाती है और सरकारें हर साल उपलब्धियों का नया पोस्टर छपवा लेती हैं। इस बीच यदि कोई स्थायी चीज बचती है तो वह है आम आदमी की परेशानी।

डॉ. मोहन यादव मुख्यमंत्री बने तो लोगों ने सोचा कि अब शायद कुछ नया होगा। नई सोच आएगी, नई ऊर्जा आएगी, प्रशासनिक मशीनरी में नई जान आएगी। लेकिन समय बीतने के साथ जनता के बीच एक अलग ही चर्चा शुरू हो गई। लोग कहने लगे कि सरकार के पास डंडा तो बहुत है, लेकिन जनता की थाली में राहत कम दिखाई दे रही है। तभी शायद यह व्यंग्य जन्मा "मोहन का डंडा और जनता को मिला अंडा।"

प्रदेश में जहां देखो वहां नियमों की सख्ती दिखाई देती है। हेलमेट नहीं पहना तो चालान। कागज पूरे नहीं तो जुर्माना। टैक्स नहीं भरा तो नोटिस। दुकान में कमी तो कार्रवाई। यह सब होना भी चाहिए, क्योंकि कानून का पालन जरूरी है। लेकिन जनता पूछ रही है कि यही सख्ती भ्रष्टाचार, माफियाओं और व्यवस्था को खोखला करने वाले तत्वों पर कब दिखाई देगी?

आम आदमी जब किसी सरकारी दफ्तर में जाता है तो उसे संविधान से पहले व्यवस्था का परिचय मिलता है। फाइल एक टेबल से दूसरी टेबल तक यात्रा करती है। बाबू उसे ऐसे देखता है जैसे वह कोई राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला हो। अधिकारी कहते हैं प्रक्रिया चल रही है। प्रक्रिया इतनी लंबी चलती है कि कई बार आवेदक बूढ़ा हो जाता है लेकिन प्रक्रिया जवान बनी रहती है।

सरकार दावा करती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ उसकी नीति कठोर है। लेकिन जनता का अनुभव अक्सर अलग कहानी सुनाता है। गांव से लेकर मंत्रालय तक लोगों की बातचीत में भ्रष्टाचार सबसे लोकप्रिय विषय बना हुआ है। चाय की दुकान पर बैठा किसान, दुकान चलाने वाला व्यापारी, नौकरी की तलाश में भटकता युवा और पेंशन के लिए भटकता बुजुर्ग सबकी शिकायत लगभग एक जैसी है। उन्हें लगता है कि व्यवस्था का पहिया अभी भी ईमानदारी से ज्यादा प्रभाव और संपर्क से घूमता है।

जनता यह भी देख रही है कि भ्रष्टाचार पर कार्रवाई की खबरें तो खूब आती हैं, लेकिन भ्रष्टाचार समाप्त होने की खबर कभी नहीं आती। जैसे बीमारी का इलाज नहीं हो रहा, केवल तापमान नापा जा रहा है। लेकिन भ्रष्टाचार से भी बड़ा दर्द तब सामने आता है जब किसी परिवार का बच्चा लापता हो जाता है। किसी मां की आंखों में अपने बच्चे की तस्वीर स्थायी रूप से बस जाती है। किसी पिता की जिंदगी थानों और दफ्तरों के चक्कर में गुजरने लगती है। सरकारें आंकड़े गिनती हैं, लेकिन माता-पिता के लिए हर बच्चा एक दुनिया होता है।

मध्यप्रदेश के कई हिस्सों से समय-समय पर बच्चों के लापता होने की खबरें आती रही हैं। कुछ बच्चे मिल जाते हैं, कुछ नहीं मिलते। लेकिन सवाल यह है कि एक भी बच्चा क्यों लापता हो? विकास का असली अर्थ क्या है? ऊंची इमारतें, चौड़ी सड़कें और निवेश सम्मेलन या फिर बच्चों की सुरक्षा? यदि कोई माता-पिता अपने बच्चे को सुरक्षित नहीं मानते तो विकास के सारे दावे उनके लिए महत्व खो देते हैं।

महिला सुरक्षा का विषय भी कुछ ऐसा ही है। मंचों पर बेटियों के सम्मान की बातें होती हैं। पोस्टर लगते हैं। योजनाएं शुरू होती हैं। भाषणों में महिलाओं को शक्ति का प्रतीक बताया जाता है। लेकिन जब अपराधों की खबरें आती हैं तो सारी चमक फीकी पड़ जाती है।

महिलाएं यह नहीं चाहतीं कि हर साल नया नारा दिया जाए। वे चाहती हैं कि कानून का भय अपराधियों में दिखाई दे। वे चाहती हैं कि शिकायत करने वाली महिला को सम्मान मिले, संदेह नहीं। वे चाहती हैं कि न्याय इतना तेज हो कि अपराधी उदाहरण बन जाए। लेकिन व्यवस्था अक्सर इतनी धीमी दिखाई देती है कि पीड़िता का साहस पहले टूटता है और फैसला बाद में आता है। अब बात करते हैं उस शक्ति की जिसका कोई आधिकारिक विभाग नहीं होता लेकिन प्रभाव कई विभागों से ज्यादा होता है माफिया।

मध्यप्रदेश में रेत का विषय वर्षों से चर्चा में है। नदियां कभी संस्कृति की पहचान थीं, अब अक्सर खनन की बहस में दिखाई देती हैं। प्रशासन कार्रवाई करता है, छापे पड़ते हैं, वाहन जब्त होते हैं, लेकिन कुछ दिनों बाद वही चर्चा फिर शुरू हो जाती है। जनता पूछती है कि यदि समस्या खत्म नहीं हो रही तो कहीं न कहीं व्यवस्था कमजोर है या इच्छाशक्ति अधूरी है।

रेत का सवाल केवल आर्थिक नहीं है। यह पर्यावरण, नदी, जलस्तर और भविष्य का सवाल भी है। लेकिन जब वर्तमान का मुनाफा भविष्य की चिंता पर भारी पड़ जाए तो नदी भी असहाय हो जाती है। भू-माफिया का खेल तो और भी रोचक है। किसान अपनी जमीन बचाने में लगा है और कोई दूसरा उस पर भविष्य की कॉलोनी का सपना देख रहा है। सरकारी जमीनों पर विवाद, अवैध कॉलोनियों के मामले, नक्शों की गड़बड़ी, दस्तावेजों का खेल इन सबने आम आदमी को असुरक्षित बना दिया है।

सबसे दुखद बात यह है कि नुकसान अक्सर उसी का होता है जिसने जीवनभर की कमाई निवेश की होती है। बड़े खिलाड़ी रास्ता निकाल लेते हैं, लेकिन छोटा आदमी अदालत और दफ्तरों के बीच फंस जाता है। स्वास्थ्य व्यवस्था की स्थिति भी जनता के धैर्य की परीक्षा ले रही है। सरकारी अस्पतालों में भीड़ है, डॉक्टरों की कमी की शिकायतें हैं, संसाधनों की कमी की चर्चाएं हैं। दूसरी ओर निजी अस्पतालों के खर्च सुनकर कई परिवारों का रक्तचाप बिना इलाज के ही बढ़ जाता है।

एक गंभीर बीमारी कई परिवारों की आर्थिक रीढ़ तोड़ देती है। लोग कर्ज लेते हैं, गहने बेचते हैं, जमीन गिरवी रखते हैं। तब उन्हें महसूस होता है कि बीमारी केवल शारीरिक संकट नहीं, आर्थिक आपदा भी है। जनता चाहती है कि स्वास्थ्य सेवा अधिकार बने, सौदा नहीं। लेकिन जब इलाज की कीमत सुनकर मरीज की हालत और खराब होने लगे तो व्यवस्था पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

शिक्षा की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी की चर्चा वर्षों से होती रही है। कहीं भवन नहीं, कहीं प्रयोगशाला नहीं, कहीं पर्याप्त शिक्षक नहीं। दूसरी तरफ निजी स्कूलों की फीस ऐसी बढ़ती है जैसे महंगाई से उनका कोई निजी समझौता हो।

माता-पिता बच्चों को पढ़ाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे अपने सपनों में कटौती कर लेते हैं, लेकिन फीस भरते हैं। इसके बावजूद उन्हें चिंता रहती है कि पढ़ाई पूरी होने के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं। कॉलेजों की स्थिति भी कई सवाल खड़े करती है। डिग्री बढ़ रही हैं, लेकिन अवसर उसी गति से नहीं बढ़ रहे। लाखों युवा पढ़ रहे हैं, लेकिन रोजगार की तलाश में भटक भी रहे हैं।

युवाओं के सामने सबसे बड़ा संकट बेरोजगारी नहीं, बल्कि अनिश्चितता है। उन्हें समझ नहीं आता कि आखिर भविष्य की दिशा क्या है। इन सबके बीच सरकार लगातार उपलब्धियों का उत्सव मना रही है। नए निवेश, नए समझौते, नई घोषणाएं, नए कार्यक्रम। जनता को भी विकास चाहिए, निवेश चाहिए, उद्योग चाहिए। लेकिन जनता यह भी चाहती है कि उसके रोजमर्रा के जीवन की समस्याएं प्राथमिकता बनें।

  • किसान को फसल का दाम चाहिए।
  • युवा को रोजगार चाहिए।
  • महिला को सुरक्षा चाहिए।
  • बच्चे को सुरक्षित बचपन चाहिए।
  • मरीज को सस्ता इलाज चाहिए।
  • विद्यार्थी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए।
  • आम आदमी को भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था चाहिए।
  • लोकतंत्र में सरकार की असली रिपोर्ट कार्ड यही होती है।
  • जनता अब केवल भाषण नहीं सुनना चाहती। वह परिणाम देखना चाहती है। वह यह जानना चाहती है कि जिन समस्याओं का जिक्र वर्षों से हो रहा है, उनका समाधान कब होगा। वह यह जानना चाहती है कि प्रशासन जनता के लिए है या जनता प्रशासन के लिए। आज मध्यप्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा प्रश्न यही है। क्या विकास का लाभ वास्तव में अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है? क्या व्यवस्था आम आदमी के लिए आसान हुई है? क्या कानून का भय केवल आम नागरिक तक सीमित है या प्रभावशाली लोगों तक भी पहुंचता है?

    यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं तो फिर जनता का यह कहना गलत नहीं लगता कि सत्ता के हाथ में डंडा जरूर मजबूत हुआ है, लेकिन जनता अब भी अपने हिस्से की राहत खोज रही है। लोकतंत्र में जनता बहुत शांत दिखाई देती है, लेकिन वह सब याद रखती है। उसे विज्ञापन याद नहीं रहते, अनुभव याद रहते हैं। उसे भाषण याद नहीं रहते, अपने जीवन की कठिनाइयां याद रहती हैं। उसे नारे याद नहीं रहते, अपने बच्चों का भविष्य याद रहता है। और जब जनता फैसला करती है तो फिर इतिहास बदल जाता है। तब न डंडा काम आता है, न प्रचार। तब केवल जनता का विश्वास काम आता है।

  • फिलहाल मध्यप्रदेश की गलियों, चौपालों और चाय की दुकानों पर यही चर्चा है कि सरकार के पास शक्ति बहुत है, संसाधन बहुत हैं, प्रचार बहुत है, लेकिन जनता अभी भी इंतजार कर रही है उस दिन का जब उसे डंडा नहीं, विकास का वास्तविक फल मिलेगा। तब तक लेखक जिंदा रहेगा, सवाल जिंदा रहेंगे और यह वाक्य भी जिंदा रहेगा"मोहन का डंडा और जनता को मिला अंडा।"
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