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शक्कर महंगी हुई तो चाय की मिठास ही नहीं, जनता का भरोसा भी घटेगा

📅 20 August 2026, 10:28 AM ✍️ paliwalwani ⏱️ 4 मिनट में पढ़ें
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शक्कर महंगी हुई तो चाय की मिठास ही नहीं, जनता का भरोसा भी घटेगा
शक्कर महंगी हुई तो चाय की मिठास ही नहीं, जनता का भरोसा भी घटेगा

 अक्षय जैन

महंगाई की मार हमेशा किसी बड़ी वस्तु से महसूस नहीं होती। कई बार रसोई की छोटी-सी चीज ही घर के पूरे बजट का गणित बिगाड़ देती है। शक्कर भी ऐसी ही जरूरत है। सुबह की चाय से लेकर बच्चों के दूध, घर की मिठाई और त्योहारों की तैयारी तक शक्कर हर परिवार की रोजमर्रा की जरूरत है। ऐसे में इसके दाम बढ़ना सिर्फ बाजार की खबर नहीं, बल्कि आम आदमी की रसोई का सवाल बन जाता है।

पहले से ही महंगाई के दबाव में परिवार अपनी आय और खर्च के बीच तालमेल बैठाने में जुटे हैं। दूध, सब्जी, दाल, तेल और अन्य जरूरी सामान के बाद यदि शक्कर भी महंगी होती है तो बचत का दायरा और छोटा हो जाता है। मध्यमवर्गीय परिवार के लिए बढ़ती कीमत का हर रुपया किसी दूसरी जरूरत में कटौती करवाता है।

मामला सिर्फ शक्कर का नहीं, महंगाई की मनोवृत्ति का है। जब रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ते हैं तो जनता बाजार के आंकड़े नहीं देखती, वह अपनी जेब देखती है। सरकार के लिए महंगाई का मूल्यांकन आंकड़ों से हो सकता है, लेकिन आम परिवार के लिए उसका पैमाना रसोई का खर्च है।

त्योहारों के समय इसका असर और व्यापक दिखाई देता है। मिठाई बनाने वाले हलवाई से लेकर छोटे दुकानदार तक लागत बढ़ने का दबाव महसूस करते हैं। अंततः यह बढ़ी हुई लागत ग्राहक तक पहुंचती है। यानी शक्कर की कीमत बढ़ने का असर एक पूरी आर्थिक श्रृंखला में दिखाई देता है।

सरकार को इस स्थिति को केवल मांग और आपूर्ति का सामान्य उतार-चढ़ाव मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उत्पादन, भंडारण, थोक कारोबार और खुदरा बाजार हर स्तर पर निगरानी जरूरी है। जहां जमाखोरी या अनावश्यक मुनाफाखोरी हो, वहां कार्रवाई भी दिखाई देनी चाहिए।

जनता को राहत भाषणों से नहीं, बाजार में दिखाई देने वाली कीमतों से मिलती है...

सरकार के सामने चुनौती यही है कि वह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए समय रहते प्रभावी कदम उठाए। क्योंकि रसोई में बढ़ती कीमतें धीरे-धीरे घर की बातचीत का विषय बनती हैं और फिर यही बातचीत बाजार से निकलकर समाज और राजनीति तक पहुंचती है।

कहावत है मिठास से रिश्ते बनते हैं और कड़वाहट से रिश्ते बिगड़ते हैं। सरकार और जनता के रिश्ते में भी यही बात लागू होती है। यदि जरूरी वस्तुओं की कीमतें लगातार आम आदमी की पहुंच से दूर होती गईं, तो जनता के मन में पैदा होने वाली कड़वाहट सरकार के लिए राजनीतिक रूप से भी भारी पड़ सकती है।

इसलिए समय रहते शक्कर की कीमतों पर लगाम जरूरी है। आखिर सवाल सिर्फ एक किलो शक्कर का नहीं है। सवाल उस परिवार का है, जो महीने का बजट बनाकर बाजार जाता है और हर बार लौटते समय अपनी सूची में कुछ जरूरतें काटने को मजबूर हो जाता है।

जनता के मुंह से मिठास दूर होगी तो सवालों में कड़वाहट आना स्वाभाविक है। सरकार के लिए चेतावनी साफ है रसोई में मिठास बचाइए, क्योंकि जनता का भरोसा भी उसी से जुड़ा है।

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