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आत्ममीमांसा : वह कटुसत्य तो है पर इतना कड़वा है कि...

📅 18 December 2025, 01:18 AM • ✍️ सतीश जोशी • ⏱️ 5 मिनट में पढ़ें
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आत्ममीमांसा : वह कटुसत्य तो है पर इतना कड़वा है कि...
आत्ममीमांसा : वह कटुसत्य तो है पर इतना कड़वा है कि...

आत्ममीमांसा (117)

-सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

आत्ममीमांसा की यह कड़ी अंततः मैंने आज लिखना शुरु की है तो पूरी भी कर दी। यकीन मानिए इसके पहले एक दर्जन बार कोशिश की और मेरे अंतः में कई-कई सवाल उठे और निरुत्तर लौट गए।

यह कटुसत्य

क्या यह कटु सत्य नई दुनिया के पाठकों, शुभचिंतकों और मेरे अपनों तक पहुंचाना चाहिए या नहीं? मेरे भीतर महाभारत चल रही थी, कभी मैं धर्मयुद्ध लड़ता सा लगता और कभी नमक की कीमत मुझे मेरा कौरवी आचरण करती लगती। अंततः महाभारत तो होनी ही है, मैं तैयार हू्ँ और कटुसत्य पढ़कर आप पर छोड़ता हू्ँ कि मैं किस भूमिका में हू्ँ?

कड़वा है, पर ज्यों का त्यों है

मेरी कोशिश यह है कि जो सत्य आपके सामने रख रहा हू्ँ, वह कड़वा तो है पर उसका भाव  ज्यों का त्यों ही रख रहा  हू्ँ। निंदा मेरा उद्देश्य भी नहीं है और उससे दूर रहकर यह मीमांसा खूबियों के साथ आलोचना का स्वर लिए है। 

जब राहुलजी नहीं रहे...

बात तब की है जब राहुल बारपुतेजी का दुखद अवसान हो गया था। जब उन्होंने अंतिम सांस ली तब वे नई दुनिया के सम्पादकीय सलाहकार थे। उसी सम्मान से अखबार ने उनको दुनिया से बिदा किया....। वे चले गए... दुनिया किसी के लिए नहीं रुकती, समय है चलता रहता है। 

विभूतियां समय की आहूति बनी

उनके पहले भी विभूतियां समय की आहूति बनी और राहुलजी भी। सम्पादकीय सलाहकार के साथ वे नई दुनिया की कुल पूंजी के एक प्रतिशत या उससे कम के भागीदार थे। याने उनके बाद उत्तराधिकार के तहत परिवार भी भागीदार हुआ। 

राहुलजी के परिवार को सुविधाएं जारी रही...

बताते हैं कि उसी अधिकार से प्रबंधन के कलपुर्जों ने मालिकों से सहमति लिए बगैर राहुलजी के परिवार के लोधीपुरा स्थित निवास पर टेलिफोन, अखबारों की प्रतियाँ तथा संस्थान की रिक्शा परिवारजनों को आने-जाने के लिए उपलब्ध कराते रहे। सब कुछ चल रहा था। श्रीमती बारपुतेजी, पुत्र श्री राजीव बारपुते भी इनका सदुपयोग करते रहे।

और कुछ समय बाद....

 छः महीने साल भर में मालिकों के सामने जब खर्च का खाता-बही पहुंचा तो वे आगबबूला हो गए। अकांटेंट का नाम मेरे स्मरण से औझल हो रहा है, सरनेम था पाटीदार..., जो खजराना में निवास करते थे, खूब डांट खाई और उनकी नौकरी भी चली गई। सोचिए यह सत्य कटु है या सामान्य घटना है। 

जिसने अखबार को संवारा...उसके....

जिस महापुरुष कलमकार के एक-एक शब्द ने अखबार को सजाया, संवारा और लोकप्रिय बनाया, साहूकार की तराजू ने उसको भी तोल लिया। सम्पादकीय सलाहकार, प्रबंधन का हिस्सा रहे व्यक्तित्व के प्रति आदरभाव क्या सिर्फ व्यक्ति की सांसों तक ही था। 

वह नई दुनिया अपनी मौत....

इसलिए कई बार सोचता हू्ँ कि वह नई दुनिया अपनी मौत नहीं मरा, उसका गला उसी के हाथों घोंटा गया है। आज के कार्पोरेट दौर से निकले महारथी मेरे इस लेख पर हंसेंगे और सोचेंगे कि व्यापार भावना का खेल नहीं है। क्या नई दुनिया परचून की दुकान थी, किसी ब्रांडेड कार का शोरुम थी। 

मंदिर थी नई दुनिया

नहीं.... एक रुपया पारिश्रमिक लेकर पांच रुपया श्रम करने वाले मालिकों, परिवारजनों का मंदिर थी नई दुनिया। हम सब पुजारी नहीं भक्तों की तरह मंत्र पढ़ते, मंत्रशक्ति को जगाकर उसकी ऊर्जा से नई दुनिया को महकाते थे। हम सबकी अपनी क्षमता और योग्यता थी। यज्ञ में आहूति थी हम सबका श्रम। इसलिए राहुलजी के बाद जो कुछ व्यवहार मालिकों ने किया वह कटु सत्य तो है पर इतना कड़वा है कि.....बस..!

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