Saturday, 21 February 2026

आपकी कलम

आत्ममीमांसा : बच्चों की दुनिया से बच्चों, अभिभावकों में भी लोकप्रिय हुआ नई दुनिया....

paliwalwani
आत्ममीमांसा : बच्चों की दुनिया से बच्चों, अभिभावकों में भी लोकप्रिय हुआ नई दुनिया....
आत्ममीमांसा : बच्चों की दुनिया से बच्चों, अभिभावकों में भी लोकप्रिय हुआ नई दुनिया....

आत्ममीमांसा (113)

सतीश जोशी, वरिष्ठ पत्रकार

नई दुनिया में काम करना प्रतिष्ठा की बात थी, खुद के लिए और बाहरी दुनिया के लिए भी। गोपीकृष्ण जी गुप्ता के जलवे देखकर तो जो भर्ती होता, उसकी तमन्ना ही रिपोर्टर बनने की होने लगती। सभी पर यह बात लागू नहीं होती थी। 

मौन साधक रहे सुरेश भैया

हमारे पूरे सम्पादकीय विभाग में मौन साधक थे, भैया सुरेशजी ताम्रकर। वे समय के पाबंद रहे और आज भी उनकी दिनचर्या नियत है। अध्ययन, लेखन, होम्योपैथी तथा परिवार के लिए रोजमर्रा के काम, सब एक अनुशासन की फ्रेम में होते हैं। 

एक तरह से वे स्टेपनी रहे...

 ताम्रकरजी ऐसे व्यक्तित्व हैं जो उस समय जो भी न आए उसका काम सहज कर देते थे। नई दुनिया प्रबंधन को उन पर विश्वास भी था। वे विश्वस्त थे लेकिन चापलूसी से हमेशा दूर रहे। संतोष उनका मूलमंत्र रहा, कभी प्रबंधन से कुछ नहीं मांगा। 

हर फन के माहिर

वे सम्पादकीय विभाग में लगभग सभी विधाओं पर काम कर लेते थे। जो न आए उसके काम को भी अपने काम के साथ निपटा लेते और कोई शिकवा-शिकायत किए बिना। इसलिए स्वयं वे ही मजाक- मजाक में अपने आपको स्टेपनी कहा करते। तो मैं बात कर रहा था कि वे बच्चों की दुनिया का सम्पादन भी साथ-साथ करते थे। 

बच्चों की दुनिया.. प्रयोगों ने बनाया लोकप्रिय

उन्होंने इस पृष्ठ पर भी खूब प्रयोग किए और सफल भी हुए। एक प्रयोग तो ऐसा कि पत्नी, बच्चों को भी हाथ बंटाना पड़ा। प्रयोगों से बच्चों की दुनिया के कारण भी अखबार की घर-घर में खासकर बच्चों में बड़ी मांग और चाह थी। नई दुनिया जैसे माडेस्टी ब्लेज़ के कारण लोकप्रिय थी, पीएचडी अवार्ड के फोटो नाममात्र शुल्क पर छापने की परंपरा भी शुरू की गई थी, जिससे लोकप्रियता बढ़ी। 

बच्चों के नाम और कूपन....

बच्चों की दुनिया में बच्चों के नाम छापते थे। इसके लिए अखबार में समय-समय पर एक कूपन छपता था, जिसे भरकर भेजने वाले बच्चों का नाम छपता था। जब यह कूपन छपता तो इतनी डाक आती कि बच्चों की दुनिया का बाक्स लबालब भर जाता।

खुद, पत्नी बच्चे सब करते मेहनत

सारी डाक सुरेशजी घर लाते, उनकी श्रीमती जी  और बच्चे उसे खोलते। सिलसिले से जमाते और बच्चों के नाम की सूची बनाते थे। फिल्म पहेली की भी बहुत डाक आती थी। संपादक के नाम पत्र स्तंभ भी बेहद लोकप्रिय था। सौ दो सौ पत्र रोज आते रहे।

जब माथुर साहब भी सहमत हुए...

ठाकुर जयसिंह जी कम्युनिस्ट विचारधारा वाले व्यक्ति थे। बात समाजवाद और पूंजीवाद पर छिड़ी ठाकुर साहब ने कहा पूंजीवाद में बहुत शोषण होता है कामगारों का। माथुर साहब ने कहा विकास के लिए थोड़ा शोषण भी जरूरी है। सुरेश जी ने कहा -हम भी संस्थान की तन मन और धन से सेवा करते हैं।

माथुर साहब बोले तन-मन से तो ठीक है धन से नहीं। तब सुरेश जी ने कहा हम ओवर टाइम करते हैं और उसका पारिश्रमिक नहीं लेते यह धन सेवा ही तो है। माथुर साहब ने कहा करेक्ट और मुस्कुराते हुए चले गए।

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