श्री परशुराम कुंड मूर्ति प्रकल्प के संबंध में महत्वपूर्ण तथ्य : असत्य अथवा भ्रमपूर्ण जानकारी का प्रसार करना उचित नहीं

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नरेन्द्र पालीवाल

गौरवशाली एवं धर्मसेवा से जुड़े प्रकल्प के संबंध में असत्य अथवा भ्रमपूर्ण जानकारी का प्रसार करना उचित नहीं

सोशल मीडिया पर विप्र फाउंडेशन एवं श्री परशुराम कुंड मूर्ति प्रकल्प के संबंध में कुछ भ्रामक, तथ्यहीन एवं निराधार बातें प्रसारित की जा रही हैं। ऐसे में आवश्यक है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले तथ्यों को जाना जाए और अधिकृत जानकारी पर ही विश्वास किया जाए।

विप्र फाउंडेशन द्वारा जारी पत्र के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश स्थित आदि तीर्थ श्री परशुराम कुंड पर जनसहयोग से विभिन्न महत्वपूर्ण कार्य किए जा रहे हैं, जिनमें—

  • भगवान परशुराम की 54 फीट ऊँची विशाल पंचधातु प्रतिमा का निर्माण, स्थापना एवं रख-रखाव।
  • उत्सव मूर्ति मंडप की स्थापना।
  • देशभर में श्री परशुराम कुंड का व्यापक प्रचार-प्रसार।
  • विभिन्न नगरों में जन-जागरूकता कार्यक्रम।
  • श्री परशुराम कुंड आमंत्रण रथयात्रा का संचालन।
  • मकर संक्रांति मेले के अवसर पर विभिन्न सेवा कार्य।
  • तीर्थयात्रियों की सुविधा के लिए यात्री निवास का संचालन।

पत्र में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन कार्यों पर होने वाला शत-प्रतिशत व्यय जनसहयोग से वहन किया जा रहा है तथा संपूर्ण प्रकल्प एवं संबंधित गतिविधियों के लिए ₹11 करोड़ के व्यय का बजट बनाया गया है। अब तक लगभग ₹7 करोड़ की राशि समर्पित की जा चुकी है। ऐसे विराट, गौरवशाली एवं धर्मसेवा से जुड़े प्रकल्प के संबंध में असत्य अथवा भ्रमपूर्ण जानकारी का प्रसार करना उचित नहीं है। मतभेद हो सकते हैं, प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं, लेकिन प्रश्न तथ्यों के आधार पर हों और उत्तर भी तथ्यात्मक रूप से सामने आएँ।

मेरा स्पष्ट मानना है कि सार्वजनिक जीवन में पारदर्शिता और तथ्य सर्वोपरि हैं। इसलिए किसी भी प्रकार की सोशल मीडिया चर्चा से प्रभावित होने के बजाय संबंधित संस्था द्वारा जारी अधिकृत जानकारी को देखा जाए।

मैं विप्र फाउंडेशन के पदाधिकारियों, सहयोगियों एवं दानदाताओं के इस आग्रह से भी सहमत हूँ कि भ्रमपूर्ण प्रचार से प्रभावित न हों और अधिकृत सूचनाओं पर ही विश्वास करें।

श्री परशुराम कुंड केवल एक निर्माणाधीन प्रतिमा का प्रकल्प नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति, तीर्थ और हमारी सनातन विरासत से जुड़ा विषय है। ऐसे प्रकल्पों के संबंध में संवाद भी तथ्यपूर्ण हो और दृष्टिकोण भी सकारात्मक तथ्य सामने आने चाहिए, भ्रम नहीं। प्रश्न होने चाहिए, लेकिन प्रमाण के साथ, आस्था के विषय में राजनीति नहीं, पारदर्शिता और सत्य आवश्यक है।

  •  धर्मनारायण जोशी

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