आप जीवित हैं या नहीं, इस सवाल का जवाब जानना बहुत आसान है। अगर आपकी सांस चल रही है, अगर आपका दिल धड़क रहा है, आपकी नव्ज सामान्य है तो निश्चित रूप से ये सभी संकेत इस बात की पुष्टि करते हैं कि शारीरिक रूप से आप जीवित हैं। लेकिन ये सभी संकेत केवल आपके शरीर तक ही सीमित हैं, यह सिर्फ आपकी शारीरिक मृत्यु की ही बात करते हैं।
जो लोग अध्यात्म की जरा भी समझ रखते हैं वे ये इस बात को भी जानते हैं कि आपका शरीर आपकी उस आत्मा का घर है जिसे न तो मिटाया जा सकता है और ही जिसके अस्तित्व को समाप्त किया जा सकता है। आत्मा की कोई उम्र नहीं है, वह ना तो कभी मरती है और ना ही कभी बूढ़ी होती है। जब धरती पर उसका पूर्व निर्धारित समय समाप्त हो जाता है तब वह अपनी उस अनंत यात्रा पर निकल पड़ती है जिसकी नीयति उस परमात्मा के साथ मिलना है जहां से उसका उद्भव हुआ है।
सामान्य व्यक्ति केवल इस शरीर की मृत्यु से ही परिचित है, लेकिन आध्यात्मिक मृत्यु की समझ बहुत ही कम लोगों में होती है। यह वो स्थिति है जब व्यक्ति का शरीर तो जीवित रहता है लेकिन उसकी आत्मा का परमात्मा के साथ संबंध पूरी तरह समाप्त हो जाता है। शारीरिक मृत्यु का अर्थ यही है जब आत्मा अपने मौजूदा शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करने की तलाश में निकाल पड़ती है जबकि आध्यात्मिक मृत्यु का महत्व इससे कहीं ज्यादा है। क्या आपको भी अपने भीतर अकेलेपन या खालीपन का एहसास होता है, क्या आपका विश्वास भी उस परमात्मा आमें कम होता जा रहा है? संभवतः आप भी आध्यात्मिक मृत्यु की स्थिति से गुजर रहे हैं। आगामी स्लाइड्स में कुछ ऐसे संकेतों का वर्णन किया जा रहा है जो इस बात की पुष्टि कर रहे हैं।
आपकी तरफ से किसी प्रकार का कोई प्रयास, किसी प्रकार की कोई चेष्टा न रहना। जब आप अपने भीतर के सुधार पर ध्यान नहीं देते और अपनी मौजूदा स्थिति को ही अपनी नीयति मान लेते हैं तो यह इस बात का संकेत है कि आप आध्यात्मिक मृत्यु का सामना कर रहे हैं, जहां आपकी सभी उम्मीदें और ईश्वर के प्रति आपकी आस्था समाप्त हो चुकी है। जब आप अपने पापों को स्थायी मान लेते हैं, अपने उद्देश्यों को पूरा करना अब आपको संभाव नहीं लगता तो यह इस बात का संकेत है कि स्वयं ईश्वर आपकी मदद नहीं करना चाहते। आपकी आत्मा का परमात्मा के साथ जो संबंध था वह अब टूट चुका है।
जब आपके भीतर किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए दया और सहानुभूति का भाव समाप्त हो जाये तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आपके दिल में बहुत पीड़ा और पाप भरा हुआ है, जब व्यक्ति की स्थिति इस तरह की हो जाती है तब उसका ईश्वर के साथ किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं रहता। जब आपके दिल में इतनी पीड़ा होती है, दूसरों के दर्द समझने की काबीलियत समाप्त हो जाती है तो यह स्थिति आपके आध्यात्मिक रूप से मृत होने की बाद कहती है।
जैसा कि हमने आपको पहले ही बताया है आध्यात्मिक मृत्यु का सटीक अर्थ यही है जब व्यक्ति ईश्वर के साथ अपने संबंध तोड़ लेता है या अपने कर्मों की वजह से उसकी आत्मा का पारमात्मा के साथ रिश्ता समाप्त हो चुका है। जब ऐसी स्थिति आती है तब व्यक्ति ईश्वर से जुड़े किसी भी तथ्य को समझ नहीं पाता, उसे अपने अस्तित्व के विषय में कुछ समझना नहीं होता और ना ही वह परमात्मा की उपस्थिती को लेकर गंभी होता है। ऐसे व्यक्ति का ईश्वर से जुड़े किसी भी प्रमाण पर विश्वास नहीं होता और ना ही उनसे जुड़ी बातों से कुछ सीखना चाहता है।
ये दुनिया पाप और पुण्य जैसी बातों में विभाजित है और जब व्यक्ति इन दोनों की अवधारणा से ऊपर उठ जाता है तो कहीं न कहीं वह स्वयं अपने पतन का मार्ग तैयार कर रहा होता है। अपने द्वारा की गई किसी गलती या पाप का पश्चाताप करने का विचार भी मन में ना आए तो यह आध्यात्मिक मृत्यु की ओर इशारा करता है। जब व्यक्ति बिना किसी दर के, बिना किसी ग्लानि भाव के और बिना किसी के अच्छे-बुरे की परवाह किए पाप कर्म करता रहता है तो उसके भीतर की गुणवत्ता पूरी तरह समाप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति का शरीर भले ही जीवित हो लेकिन उसकी आत्मा पूरी तरह मर चुकी होती है, जिसे अध्यात्म की दुनिया में "आध्यात्मिक मृत्यु" कहा जाता है।